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मन के मनके साझा करतीं

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न ही तुम हो स्वर्ण-मुद्रिका-  जिसे तपा के जांचा जाए. ********** जितनी बार रूमानी होकर   स्वप्निल होने को मन कहता उतनी बार मीत तुम्हारा  भोला मुख सन्मुख है रहता. ********************** सच तो है अखबार नहीं तुम, जिसको को कुछ पल बांचा जाये. न ही तुम हो स्वर्ण-मुद्रिका- जिसे तपा के जांचा जाए. मनपथ की तुम दीप शिखा हो यही बात हर गीत है कहता । ************************ सुनो प्रिया मन के सागर का जब जब मंथन मैं करता हूं तब तब हैं नवरत्न उभरते अरु मैं अवलोकन करता हूँ हरेक रतन तुम्हारे जैसा..! तुम ही हो , मन  है कहता. ************************ मन के मनके साझा करतीं पीर अगर तो मुस्कातीं तुम । पर्व दिवस के आने से पहले कोना कोना चमकाती तुम ! दुविधा अरु संकट के पल में मातृ रूप , तुम में मन लखता ।। ************************