संदेश

बारूद के ढेर पर बैठा पाकिस्तान

चित्र
  पाकिस्तान की ग्ले की फांस बने दो आंदोलन उसकी अस्थिरता का सबसे मुख्य कारण है इन दिनों । जब से सोशल मीडिया पर आवाज़ बुलंद करने का अवसर मिला है आम आदमी को तबसे वैचारिक आंदोलनों को बल मिला है ।  सिंधु स्वतंत्रता की लहर 1967 में  जी एम सैयद की कल्पना से उभरी है। यह आंदोलन एक साहित्यिक भाषाई आंदोलन था जब पाकिस्तान में उर्दू भाषा राष्ट्रभाषा बनाने का निर्णय लिया गया, इस आंदोलन में आगे चलकर पीर अली मोहम्मद राशिद का भी बहुत अधिक योगदान जीएम सैयद के साथ देखा गया था। वर्तमान में इस आंदोलन का नेतृत्व अल्ताफ हुसैन के हाथों में है ।    सिंधी देश जिसे सिंधु देश के रूप में वहां के लोग समर्थन दे रही है उनकी आबादी 7 करोड़ है। नक्शे में आप ध्यान दें तो पाएंगे कि उसकी पूर्वी एक सीमा भारत से मिलती है। इस आंदोलन की एक और वजह थी औद्योगिक एवं व्यापारिक रूप से पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था का 70% हिस्सा सिंध प्रांत से पाकिस्तान को हासिल होता है। परंतु इसके विपरीत उनका महत्व ओम भागीदारी पाकिस्तान की राजनीतिक गतिविधियों में लगभग नगण्य है। इसके विपरीत सत्ता का पाकिस्तान की प्रो आर्मी डेमोक्रेसी में पाकिस्तानी पंजाब

Husband is the creator of his own future..! viral video on social media

चित्र
पत्नियों को सी सी टी वी  से कमजोर समझने वाले पति सावधान शामत आ सकती है । 

ये दाग़ तोहमतों के, छुपाए नहीं जाते

चित्र
ग़ज़ल  एहसास मोहब्बत के, भुलाए नहीं जाते ये दाग़ तोहमतों के,  छुपाए नहीं जाते ।। मैं जानता हूं उनके ख्वाबों में बसा हूं लम्हे किसी के ख़्वाब से, चुराए नहीं जाते ।। चर्चा है खुल चुकीं हैं, मज़हब की दुकानें- ऐसे बाज़ार में हम कभी, आते नहीं जाते ।। क्या ख़ूब नशीली हैं साक़ी की निगाहें - क़तरे, मय के सुराही से, उठाये नहीं जाते ।। अपनी तो आशिक़ी बस उस सनम से है- जिसके लिए सर तन से हटाए नहीं जाते ।। घर आएगा मुकुल के, कोई अपना ही आएगा- आँगन में बबूल हमसे, लगाए नहीं जाते ।।                      गिरीश बिल्लोरे मुकुल

Rejection and Acceptance

चित्र
    तुम्हें उस  माउंट एवरेस्ट पर देखना चाहता था ,शिखर पर चढ़ने के दायित्व को  बोझ समझने की चुगली तुम्हारा चेहरा और बर्ताव कर देता है।      इस चोटी पर चढ़ना है  रास्ता आसान नहीं है और तो और अवरोधों से भी अटा पड़ा है । कभी किसी पर्वतारोही से पूछो..... वह बताएगा कि  बेस कैंप से बाहर निकलो और पूछो कि मैं तुम्हारी चोटी पर आना चाहता हूं । तो पर्वत बताता है कि नहीं लौट जाओ यह आसान नहीं है। पर्वतारोही बताता है कि - दशरथ मांझी ने तो ऐसे घमंडी पर्वत को बीच से चीर दिया था याद है ना...!    दशरथ मांझी को कोई कंफ्यूजन नहीं था एवरेस्ट पर चढ़ने वालों को कोई कंफ्यूजन नहीं होता। और जो कंफ्यूज होते हैं उनके संकल्प नहीं होते बल्कि वे खुद से मजाक करते नजर आते हैं।    जो लोग दुनिया को फेस करना जानते हैं वही सफलता का शिखर पा सकते हैं। *एक्सेप्टेंस और रिजेक्शन* में ही सफलता के राज छिपे हुए हैं । रिजेक्शन सबसे पहला पार्ट है। सबसे पहले हम खुद को रिजेक्ट करते हैं फिर दो चार लोग फिर एक लंबी भी आपको रिजेक्ट करती है। तब कहीं जाकर भीड़ से कोई आकर कहता है - "*वाह क्या बात है..!*"     आइए मैं

प्रेम का विद्रोही प्रमेय : लेखिका डॉ छाया खले

चित्र
        [ छवि :कंगना, गूगल से साभार ] वो स्त्री ,जो सचमुच तुमसे प्रेम करती है तुमसे दूर जाने का फैसला एक पल में नहीं करती महीनों वो खुद को समझाती है और जिस दिन वो तुम्हारे बिना खुद को संभालना और समझाना सीख जाती है ,ठीक उसी पल वो तुमको छोड़कर सिर्फ़ ख़ुद की हो जाती है तुमको उस दिन से डरना चाहिए जिस दिन स्त्री प्रेम और स्वाभिमान में से ,  स्वाभिमान को चुनती है क्योंकि उसी दिन स्त्री तुमसे मिले प्रेम को हीरे की तरह दिल में रख लेती है औऱ सारी दुनिया के लिए दिल के दरवाज़े सदा के लिए बंद कर लेती है ये उसका अंतिम फैसला होता है तुमको छोड़ कर जाने का ...स्त्री सहज विद्रोही नहीं होती ,विद्रोह करने से पहले वो बार-बार तुमको एहसास कराती है कि "अब पहले जैसा प्रेम महसूस नहीं हो रहा है प्रेम को कुछ वक्त दिया करो "तुम उसे और उसकी बातों को लापरवाही से टाल देते हो ,और एक दिन वो तमाम यादें और प्रेम समेट कर तुमसे दूर चली जाती है एक बार प्रेम तज कर और प्रेम समेट कर जा चुकी स्त्री कभी पहली सी नहीं रह जाती तुम्हारे जिस प्रेम ने उसे कोमल और संतुलित बनाया था ,तुम्हारा वही प्रेम उसे जीवन भर के ल

मेरा अनाभिव्यक्त प्रेम और तुम

चित्र
       33 साल पहले निक्की से प्रेम की अभिव्यक्ति ना कर पाया सुयश अपने आप में अपराध बोध लेकर जी रहा था। ऐसा नहीं कि सुयश ने कोशिश नहीं की घर तक भी गया। परंतु दरवाजा खटखटाया बिना लौटना ही उचित समझा। सोचता रहा कि जॉब लग जाए फिर बात करूंगा ! और फिर दूसरा मसला यह भी था कि पता नहीं निक्की मुझे स्वीकार की कि नहीं। स्वीकारती ना स्वीकारती यह प्रमुख समस्या नहीं समस्या थी पता नहीं जॉब कब तक लगेगी अगर जॉब ना लगी तो। मध्यवर्ग के परिवारों में प्रेम कुछ यूं ही आकार लेता है और फिर किसी ना किसी कारण से प्रेमी अचानक ऐसे पथ पर खो जाता है जहां से प्रेम पथ पर वापस लौटना नामुमकिन होता है। फिर एक दिन अप्वाइंटमेंट लेटर मिलने पर सुयश इस बात को लेकर खुश था कि आज मैं अपने प्रेम की अभिव्यक्ति अवश्य कर दूंगा। इससे पहले कि वह अपनी बात रखता पता चला  निक्की की शादी होने वाली है। नियति के निर्णय के सामने सुयश ने घुटने टेक दिए। एक जबरदस्त अपराध बोध और हताशा लेकर सुयश जीवन से लगभग असंतुष्ट हो गया था। अपने आप को अपना ही अपराधी समझने वाला सुयश समझ चुका था कि अब जब वह अपने प्रेम को व्यक्त नहीं कर सका तो वह इस क

फागुन के गुन प्रेमी जाने, बेसुध तन अरु मन बौराना

चित्र
**होली पर हार्दिक शुभकामनाएं* फागुन के गुन प्रेमी जाने,  बेसुध तन अरु मन बौराना । या जोगी पहचाने फागुन,  हर गोपी संग दिखते कान्हा ।।  रात गये नजदीक जुनहैया,  दूर प्रिया इत मन अकुलाना । सोचे जोगीरा शशिधर आए,  भक्ति - भांग पिये मस्ताना ।।  प्रेम रसीला, भक्ति अमिय सी,  लख टेसू न फूला समाना । डाल झुकीं तरुणी के तन सी,  आम का बाग गया बौराना ।।  जीवन के दो पंथ निराले,  कृष्ण भक्ति अरु प्रिय को पाना । दोनों ही मस्ती के पथ हैं,  नित होवे है आना जाना...!!  चैत बैसाख की गर्म दोपहरिया –  सोच के मन लागा घबराना । छोर मिले न ओर मिले,  चिंतितमन किस पथ पे जाना ?  मन से व्याकुल तन से आकुल राधारमण का कौन ठिकाना । बेसुध बैठ गई सखि मैं तो- देख मेरा सखि तापस बाना ।। गोकुल छोड़ गए जब से तुम छूटा हमारा भी पानी-दाना । प्राण की राधा झुलसी झुलसी तुरतई अब किसन को होगा आना ।। 💐💐💐💐💐💐 *गिरीश बिल्लोरे मुकुल*