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प्रेम का सन्देश देता ब्लॉग

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शुक्रवार, 14 जून 2024

दाम्पत्य जीवन में यौन संबंधों का महत्व

 


मनुष्य के जीवन में बुद्धि एक ऐसा तत्व है जो  मनुष्य को विश्लेषण करने की क्षमता प्रदान करती है।
  बुद्धि का अधिकांश कार्य मनुष्य प्रजाति और व्यवस्था के विश्लेषण के लिए सर्वाधिक सक्रिय होती है।
बुद्धि भावात्मकता को भी विश्लेषित कर देती है। बुद्धि उसे शरीर के प्रति कंफर्ट जोन तैयार करने की जुगत में रहती है जिस शरीर में वह स्थित है।
       बुद्धि निष्काम और सकाम प्रेम , के साथ-साथ अन्य भावों पर साम्राज्य स्थापित करने की कोशिश करती है । बुद्धि अपने साम्राज्य में तर्क  के सहारे लाभ का कैलकुलेशन करती है। फिर मन और शरीर को यह सलाह देती है कि उसे क्या करना चाहिए।  
   परंतु मन और शरीर की अपनी-आप की परिस्थितियों है। शरीर की जरूरतों  की पूर्ति के लिए मन बुद्धि पर निर्भर करता है।
   बुद्धि संसाधन की उपलब्धता के अनुसार अधिकतम लाभ की अपेक्षा के साथ शरीर को जरूरतों की पूर्ति के लिए उपक्रम करता है।
     मां के साथ-साथ बुद्धि पर अंकुश  आवश्यक है,  जिसकी व्याख्या भारतीय जीवन दर्शन में भली प्रकार की गई है।   आचार्य रजनीश ने पश्चिम और पूर्व के बीच सांस्कृतिक सामाजिक संबंधों को वर्गीकृत किया है। मेरे हिसाब से उन्होंने पश्चिम को कुछ ऐसा बताया जो पूर्व के लिए वर्जनों के विरुद्ध था। वे उन्मुक्तता का प्रबोधन करते थे। विचार मौलिक थे तथापि भारतीय संदर्भ में न केवल अनुचित थे बल्कि कुछ मायने में अश्लील भी।
आचार्य से हटकर मेरा मानना अलग है। यह जरूरी नहीं कि हम आचार्य को पूरी तरह से स्वीकार लें। हम एक सीमा तक और अपनी अनुकूलता तक उनके मंतव्य को स्वीकार सकते हैं। भारत में विवाह एक संस्था है। जो पवित्रता पर केंद्रित है। जबकि पश्चिम तथा अन्य संस्कृतियों हमारे चिंतन से अलग हैं।
रजनीश ने अपने आश्रमों में कम्युन व्यवस्था को स्थापित किया जो शारीरिक एवं मन की स्वतंत्रता के लिए नए-नए अवसर प्रदान करते थे।
इससे उलट उनके समकालीन एक युवा संन्यासी ने प्रपंच अध्यात्म योग की अवधारणा को स्थापित करने का प्रयास किया। वे अपने विचारों के प्रसार के लिए किसी भी प्रकार के भौतिक संसाधनों से स्वयं को दूर रखते थे। यह थे स्वामी शुद्धानंद नाथ , जिन्होंने मध्यवर्गी परिवारों के नैतिक नैष्ठिक एवं पूर्व से निर्धारित आध्यात्मिक मूल्य पर आधारित पारिवारिक विकास पर कार्य किया था। आपको स्वीकार करना होगा कि भारत में किसी के भी जीवन में आध्यात्मिकता का समावेशन तय किया है, परंतु बदलते परिवेश में व्यवहारिक तौर पर ऐसा नहीं है.  
जो लोग अपने जीवन के लिए आध्यात्मिक तौर पर निश्चित मापदंडों अपना  रहें हैं , उनका जीवन अद्भुत एवं मणिकांचन योग का आभास देता है।
  प्रपंच अध्यात्म के प्रबोधक स्वामी जी ने दैहिक आकांक्षाओं को नकारा नहीं बल्कि उसके निर्धारित मापदंडों को अपनाने की सलाहदी है। वे कहते हैं की प्रेम ही संसार की नींव है !
  इसका आशय है कि स्वामी शुद्धानंद नाथ प्राकृतिक स्थिति के विरुद्ध किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ से सहमत नहीं थे। वे चाहते थे कि प्रत्येक परिवार अपने जीवन को इतना अच्छा तैयार करें ताकि संपूर्ण समाज बेहतर हो सके।
  भारत में आध्यात्मिक दर्शन के तात्विक विश्लेषण से   सर्वे जना सुखिनो भवंतु बीज मंत्र उभरा है  यही बीज मंत्र संपूर्ण समष्टि के लिए महत्वपूर्ण एवं आवश्यक  है।   
  अब जबकि  मनुष्य प्रजाति आध्यात्मिकता  की तुलना में अपनी  वासना अर्थात lust को सर्वोच्च स्थान पर रखती है तो लगता है कि अब स्थिति नियंत्रण से बाहर जा सकती है ।
    आप रजनीश के कम्युन सिस्टम को लांछित करें, यह अलग बात है परंतु वर्तमान में ऐसे सिस्टम की जरूरत ही नहीं है। शारीरिक जरूरतें 25 वर्ष की उम्र से पूर्व ही तीव्रता से उभर आती हैं।

परंतु भटके हुए दंपत्ति अपने कर्म को अहंकार की विषय वस्तु बना देते हैं। वास्तविकता यह है कि व्यक्ति भावात्मक रूप से ऐसा नहीं करता बल्कि व्यक्ति अक्सर बुद्धि का प्रयोग करके वातावरण को दूषित कर देते हैं।
    हमारी शिक्षा प्रणाली में नैतिक शिक्षा की शिक्षण सामग्री हटा दी गई  है।
    कई घटनाओं को देखकर लगता है कि वर्तमान में दांपत्य केवल किसी नाटक है । जिस्मानी जरूरत  को प्राथमिकता के क्रम में रखने वाले लोग अपनी वर्जनों को भूल जाते हैं।
जिसे देखे वह यह कहता है कि हम अपने बच्चों के विचारों को दबा नहीं सकते।
पति  पत्नी हम आपस में एक दूसरे की स्वतंत्रता पर अंकुश नहीं लगा सकते।
  ये बिंदु परिवारिक विखंडन एवं स्वछंदता का का मार्ग हैं।
   अधिकार अधिकारों की व्याख्या अधिकार जताना यह बुद्धि ही सिखाती है।
  जो कि मन ऐसा नहीं करता मन सदैव प्रेम और विश्वास के पतले पतले धागों से बना हुआ होता है।
परंतु जब आप नित्य अनावश्यक आरोप मानसिक हिंसा के शिकार होते हैं और दैनिक दैहिक एवं सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए स्वयं को असफल पाते हैं तब मानस विद्रोही हो जाता है।
    ऐसी घटनाएं अक्सर घटा करती हैं। अब तो पति पत्नी का एक साथ रहना भी केवल दिखावे जैसा एक सोशल इवेंट बन चुका है।
  यह सब बुद्धि के अत्यधिक प्रयोग से होता है।
   बुद्धि अक्सर तुलना करती है और बुद्धि साबित कर देती है कि आपने जो आज तक किया है वह त्याग की पराकाष्ठा है।
    यही भ्रम जीवन को दुर्भाग्य की ओर ले जाता है।
  हम अक्सर सुनते रहते हैं... "मैंने आपके लिए यह किया मैंने आपके लिए वो किया !"
  ऐसा कहने वाला कोई भी हो सकता है पत्नी पति भाई-बहन मित्र सहयोगी कोई भी यह वास्तव में वह नहीं कह रहा होता है बल्कि उसकी बुद्धि के विश्लेषण का परिणाम है।
  इस विश्लेषण के फलस्वरुप परिवार और संबंधों में धीरे-धीरे दूरियां पनपने लगती है।
    भारत के मध्य एवं उच्च वर्गीय परिवारों में नारी स्वातंत्र्य एक महत्वपूर्ण घटक बन चुका है। मेरे एक मित्र कहते हैं वास्तव में अब विवाह संस्था 6 माह तक भी चल जाए तो बड़ी बात है। बेशक ऐसा दौर बहुत नजदीक नजर आता है। कारण जो भी हो.... नारी स्वातंत्र्य की उत्कंठा समाज को अब एकल परिवारों से भी वंचित करने में  पीछे नहीं रहेगी। नारी की मुक्ति गाथा और मुक्ति गीत अब सर्वोपरि है। नारी स्वातंत्र्य और नारी सशक्तिकरण में जमीन आसमान का फर्क है।
     मेरे मित्र ने बताया कि वह बेहद परेशान है। क्योंकि उसकी पत्नी जब मन चाहता है तभी यौन संबंध स्थापित करती है, अन्यथा कोई न कोई बहाना बनाकर उसे उपेक्षित करती है। यदि पति  या पत्नि ने दबाव डाल कर संबंध स्थापित कर लिया तो वादी इसे बलात्कार तक मान लेते हैं।
  विवाह संस्था में यौन संबंध अत्यावश्यक घटक होते हैं। पर अति सर्वत्र वर्जित के सिद्धांत को भी समझना चाहिए।
   दाम्पत्य जीवन में यौन संबंधों का महत्व भी अनदेखा नहीं किया जा सकता ।
अब यौन सुख के लिए नित नए प्रयोग सामने आ रहे हैं विवाह की आयु का निर्धारण तो कानूनी रूप से सुनिश्चित  है, पर यौनिकता से संबंधित कंटेंट की अधिकता होने से आयु सीमा नीचे आ गई है। अर्थात अब उम्र की न्यूनतम अवस्था 25 वर्ष से कम की सीमाएं टूटती नजर आती है। क्रश, बॉय  फ्रैंड गर्ल फ्रेंड, लिव इन, पैच अप, ब्रेक अप, स्वैपिंग, एक्स, और जाने कितने नए-नए शब्द जन्म ले चुके हैं।       
       बजट के परिवेश में और क्या देखना होगा यह तो भविष्य ही बताया परंतु वर्तमान यह अवश्य बता रहा है कि स्थिति विचित्र एवं नियंत्रण से बाहर होती नजर आ रही है।
  
   हाल ही में एक प्रतिष्ठित गायक के साथ यही घटनाक्रम हुआ। एक क्रिकेट प्लेयर भी इस समस्या से जूझ रहा है।
   आलेख का आशय यह नहीं कि केवल महिला ही दोषी है बल्कि यह बताना है कि बुद्धि के अतिशय प्रयोग एवं वासना  भारतीय पारिवारिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर रही है चाहे विक्टिम पति हो अथवा पत्नी ।
अधिकांश मामलों में दोष प्रमुखता से महिलाओं का ही सामने आया है जो दांपत्य जीवन के महत्वपूर्ण बिंदु यौन संबंध के प्रति विरक्त होती है । वास्तव में यह स्थिति पर निर्भर है इसमें किसी पुरुष या महिला को दोषी करार देना गलत होगा। सुखद दांपत्य जीवन के लिए जीवन में आध्यात्मिकता के समावेशन और सिंक्रोनाइजेशन की जरूरत है।

   

शुक्रवार, 7 जून 2024

विधवा नारी के सांस्कृतिक सामाजिक अधिकारों के हनन पर मार्मिक कथा -"हरे मंडप की तपन"


 

    वैभव की देह देहरी पे लाकर रखी गई फिर उठाकर ले गए आमतौर पर ऐसा ही तो होता है. चौखट के भीतर सामाजिक नियंत्रण रेखा के बीच एक नारी रह जाती है . जो अबला बेचारी विधवा, जिसके अधिकार तय हो जाते. उसे कैसे अपने आचरण से कौटोम्बिक यश को बरकरार रखना हैं सब कुछ ठूंस ठूंस के सिखाया जाता है . चार लोगों का भय दिखाकर .
    चेतना दर्द और स्तब्धता के सैलाब से अपेक्षाकृत कम समय में उबर गई . भूलना बायोलाजिकल प्रक्रिया है . न भूलना एक बीमारी कही जा सकती है . चेतना पच्चीस बरस पहले की नारी अब एक परिपक्व प्रौढावस्था को जी रही है . खुद के जॉब के साथ साथ संयम को संयुक्ता को पढ़ाना लिखाना उसके लिए प्रारम्भ में ज़रा कठिन था . कहते हैं न संघर्ष से आत्मविश्वास की सृजन होता है . वही कुछ हुआ चेतना में . एक सुदृढ़ नारी बन पडी थी . चेतना ने आत्मबल बढाने के हर प्रयोग किये किस दबंगियत से लम्पट जीवों से मुकाबला करना है बेहतर तरीके से सीख चुकी थी .
बच्चों का इंतज़ार करते करते बालकनी में बैठी आकाश पर निहारती चेतना ने एक पल अपने फ्लेट को निहारा फिर सोचने लगी 15 साल तक ब्याज और किश्तें चुका कर अपना हुआ फ़्लैट एक संघर्ष की कहानी है वैभव के साथ खुद की कमाई के आशियाने की कसम खाई थी पर वैभव के जाने के बाद कसम को पूरा करना कितना मुश्किल सा था. किराए के मकान में रहना उसे अक्सर भारी पड़ता था . इस फ़्लैट का डाउनपेमेंट के इंतज़ाम की गरज से भावुकता और विश्वास के साथ भाई के घर गई थी भाई ने कहा – चेतना देखो दस-बीस हज़ार उधार दिला सकता हूँ पर एक लाख मेरे लिए मुश्किल है . बहन बुरा मत मानना मेरी भी ज़िम्मेदारियाँ हैं भाई की बात सुन कर चेतना को याद आ रहा था पिता जी के नि:धन पर वैभव के साथ वो पहुंची थी तीसरे ही दिन अस्थि संचय के बाद भैया ने बड़े शातिराना तरीके से मकान जमीन के लिए किसी पेपर पर दस्तखत कराए थे तब भैया ने कहा था – “बहन , तेरा भाई हर पल तेरे लिए बाबूजी की तरह मुस्तैद है .” सभी जानते हैं बाबूजी के श्राद्ध को फिजूल खर्ची बताकर लेशमात्र खर्च न किया. पारिवारिक अर्थशास्त्र तो दस्तखत वाले दिन ही समझ चुकी थी . परन्तु वादा-खिलाफी का परीक्षण भी हो गया . खैर युक्तियों से मुक्तिमार्ग खोजती चेतना ने वैभव के साथ ली कसम को पूरा किया.
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संयुक्ता के जॉब में आने के बाद संयुक्ता की पसंद के लडके से शादी की रस्म पूरी होनी है . दो दिन बाद बरात आएगी आज खल-माटी की रस्म है . भाभी ने कहा- बहन आप न जा पाओगी ...... मंगल कार्य में सधवा जातीं हैं . ..!
चेतना :- और, बाक़ी रस्मों को कौन कराएगा ?
भाभी :- मैं हूँ न , आप चिंता मत करो,
चेतना :- पर क्यूं..?
भाभी :- सामाजिक रीत के मुताबिक़ विधवाएं हरे मंडप में भी नहीं आतीं थीं वो तो अब बदलाव का दौर है .
चेतना की आत्मा चीखने को बेताब थी पर बेटी की माँ वो भी वैभव सदेह साथ नहीं . जाने क्या सोच चुप रही.
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चेतना :- भैया पंडित का इंतज़ाम हो गया है न
भाई :- हाँ, बिहारी लाल जी के पुत्र हैं ... बताया था न कि अभिमन्यु शुकुल की पत्नी नहीं रहीं ......
चेतना :- अच्छा, तो ये विधुर हैं ..
भाई :- हाँ, बहन, बहुत बुरा हुआ इनके साथ
चेतना ( भाभी की तरफ देखकर ) :- विधवा को हरे मंडप में जाने का अधिकार नहीं और पंडित विधुर चलेगा क्यों भाभी ....... ?
सम्पूर्ण वातावरण में एक सन्नाटा पसर गया . भाई-भावज अवाक चेतना को निहारते चुपचाप अपराधी से नज़र आ रहे थे. और अचानक एक ताज़ा हवा बालकनी में लगे हरे मंडप की तपन को दूर करती हुई कमरे में आती है
फिर क्या था ........ हर रस्म में चेतना थी हर चेतना में उत्सवी रस्में .. ये अलग बात है कि चेतना अपनी आँखें भीगते ही पौंछ लेती इसके पहले कि कोई देखे.
कोई कला हो सकती है
Yogeshwe Yogi

सोमवार, 27 मई 2024

आने भी दो देख लेंगें, फसले-बहार को.

 *ग़ज़ल*

*आने भी दो देख लेंगें, फसले-बहार को.*

*क्योंकर कहो यूं, आप भी बेक़रार हो..!*

*आया जो यहाँ हमसे वो लेके ही गया,*

*रुसवाई ही मिली थी, इस खाक़सार को..*

*ज़ख्मों को साथ रखता हूँ ये वफादार हैं-*

*क्यों साथ रखूँ अपने, किसी रसूखदार को-*

*रिश्तों को सिक्कों से जब कोई तौलने लगे*

*न जाना उसके आंगन भाई हो या यार हो.*

*“माँ..! तेरे नाम के सिवा विरासत में कुछ नहीं*

*जबसे कहा है मुझको मुकुल, कर्ज़दार हो..*

*गिरीश बिल्लोरे मुकुल*

तुम चुप क्यों हो कारण क्या है ?

 

तुम चुप क्यों हो कारण क्या है ?
गुमसुम क्यों हो  कारण क्या है ?

जलते देख रहे हो तुम भी, प्रश्न व्यवस्था के परवत पर ।

क्यों कर तापस वेश बना के, जा बैठै बरगद या छत  पर ॥  
हां मंथन का अवसर है ये  स्थिर क्यों हो कारण क्या है ?

अस्ताचल ने भोर प्रसूती, उदयाचल से उभरी शाम ।
निशा-आचरी संस्कृति में, नित उदघोष वयंरक्षाम ॥
रावण युग से ये युग आगे रक्ष पितामह रावण क्या है ?

एक दिवंगत सा चिंतन ले, चेहरों पे ले बेबस भाव ।

व्यवसायिक नकली मुस्कानें , मानस पे है गहन दबाव ॥

समझौतों के तानेबाने क्यों बुनते हो कारण क्या है ?

भीड़ तुम्हारा धरम बताओ-क्या है, क्या गिरगिट जैसा है ।

किस किताब से निकला है ये- धर्म तुम्हारा किस जैसा है ॥

हिंसा बो  विद्वेष उगाते, फ़िरते हो क्यों, कारण क्या है ?

बीता बरस एक युद्ध में,  कोने-कोने जलता देश ।

शान्ति कपोत उड़ाने को,जगह नहीं गगन में शेष ॥

लिखो कलम के वीरो जागो, सोये क्यों हो, कारण क्या है ?

शुक्रवार, 29 सितंबर 2023

गुजरात का गरबा वैश्विक हो गया

 



जबलपुर का गरबा फोटो अरविंद यादव जबलपुर
जबलपुर का गरबा फोटो अरविंद यादव जबलपुर

गुजरात के व्यापारियों एवं प्रवासियों  ने सम्पूर्ण भारत ही नहीं बल्कि  विश्व को अपनी संस्कृति से परिचित कराया इतना ही नहीं  उसे  सर्व प्रिय भी बना दिया.

गरबा गुजरात से निकल कर भारत के सुदूर प्रान्तों तथा विश्व के उन देशों तक जा पहुंचा है जहाँ भी गुजराती परिवार जा बसे हैं , एक  महिला मित्र प्रीती गुजरात सूरत से हैं उनको मैंने कभी न तो देखा किंतु मेरे कला रुझान को परख कर पहले आरकुट फिर फेसबुक पर  मित्र बन गयीं हैं ,जो मुझसे अक्सर गुजरात के  सूरत, गांधीनगर, भरूच, आदि के बारे में अच्छी जानकारियाँ देतीं है . मेरे आज विशेष आग्रह पर मुझे सूरत में आज हुए गरबे का फोटो सहजता से भेज दिए .  

 लेखिका  गायत्री शर्मा बतातीं हैं कि  "गरबों की शान पारंपरिक पोशाकों से  चार-गुनी हो जाती है. इनमें महिलाओं के लिए चणिया-चोली और पुरुषों के लिए  केडि़या" गरबा आयोजनों में देखी जा सकती  है।
आवारा बंजारा ब्लॉग  पर प्रकाशित  पोस्ट गरबा का जलवा  में लेखक ने स्पष्ट किया है :-" गुजरात नौवीं शताब्दी में चार भागों में बंटा हुआ था, सौराष्ट्र, कच्छ, आनर्ता (उत्तरी गुजरात) और लाट ( दक्षिणी गुजरात)। इन सभी हिस्सों के अलग अलग लोकनृत्य लोक नृत्यों  गरबा, लास्या, रासलीला, डाँडिया रास, दीपक नृत्य, पणिहारी, टिप्पनी और झकोलिया की मौजूदगी गुजरात के सांस्कृतिक वैभव को मज़बूती प्रदान करती है ।

अब सवाल यह उठता है कि करीब करीब मिलती जुलती शैली के बावजूद  सिर्फ़ गरबा या डांडिया की ही नेशनल या इंटरनेशनल छवि क्यों बनी। शायद इसके पीछे इसका – गरबे के आकर्षक परिधान एवं नवरात्री पूजा-पर्व है।"

एक दूसरा  सच यह भी है कि- व्यवसायिता का तत्व गरबा को प्रसिद्द कर रहा है. फिल्मों में गरबे को , एवं चणिया-चोली केडि़या के आकर्षक उत्सवी परिधान की मार्केटिंग रणनीति ने गरबे  को वैश्विक बना दिया है.  "

दूसरी ओर अंधाधुंध व्यवसायिकता से नाराज  ब्लॉग लेखक संजीत भाई की पोस्ट में गरबे की व्यावसायिकता से दूर रखने की वकालत की गई है. ,इस पर भाई संजय पटेल की  टिप्पणी उल्लेखनीय है कि  "संजीत भाई;गरबा अपनी गरिमा और लोक-संवेदना खो चुका है । मैने तक़रीबन बीस बरस तक मेरे शहर के दो प्रीमियम आयोजनो में बतौर एंकर शिरक़त की . अब दिल खट्टा हो गया है. सारा तामझाम कमर्शियल दायरों में है. पैसे का बोलबाला है इस पूरे खेल में और धंधे साधे जा रहे हैं.''

संजय जी की टिप्पणी एक हद तक सही किंतु मैं थोडा सा अलग  सोच रहा हूँ कि व्यवसायिकता में बुराई क्या अगर गुजराती परिधान लोकप्रिय हो रहें है , और यदि सोचा जाए तो गरबा ही नहीं गिद्दा,भांगडा,बिहू,लावनी,सभी को सम्पूर्ण भारत ने सामूहिक रूप से स्वीकारा है केवल गरबा ही नहीं ये अलग बात है कि गरबा व्यवसायिक प्रतिष्ठानों के सहारे सबसे आगे हो गया ।
इन दिनों अखबार  समूहों  ने भी  गरबे को गुजरात से बाहर अन्य प्रान्तों तक ले जाने की सफल-कोशिश की हैं । 

इंदौर का गरबा दल , मस्कट में 2008 छा गया था. अब कनाडा, बेल्जियम, यूएसए, सहित विश्व के कई देशों में लोकप्रिय हुआ  तो यह भारत के लिए गर्व की बात है ।

ये अलग बात है कि गरबे के लिए महिला साथी भी किराए उपलब्ध होने जैसे समाचार आने लगे हैं ।
संजय पटेल जी की शिकायत जायज है. वे गुजराती हैं पर गरबे के बदले  स्वरुप से नाराज हैं क्योंकि - "चौराहों पर लगे प्लास्टिक के बेतहाशा फ़्लैक्स, गर्ल फ़्रैण्डस को चणिया-चोली की ख़रीददारी करवाते नौजवान,  देर रात को गरबे के बाद (तक़रीबन एक से दो बजे के बीच) मोटरसायकलों की आवाज़ोंके साथ जुगलबंदी करते चिल्लाते नौजवान, घर में माँ-बाप से गरबे में जाने की ज़िद करती जवान बेटियाँ और के नाम पर लाखों रूपयों की चंदा वसूली, इवेंट मैनेजमेंट के चोचले रोज़ अख़बारों में छपती गरबा कर रही लड़के-लड़कियों की रंगीन तस्वीरें, देर रात गरबे से लौटी नौजवान पीढी न कॉलेज जा रही,न दफ़्तर, उस पर  डीजे की  कानफ़ोडू आवाज़ें जिनमें से  गुजराती लोकगीतों की मधुरता गुम है. मुम्बईया  फ़िल्मी स्टाइल का संगीत,  बेसुरा संगीत संजय पटेल जी की नाराज़गी की मूल वज़ह है.

आयोजनों के नाम पर बेतहाशा भीड़...शरीफ़ आदमी की दुर्दशारिहायशी इलाक़ों के मजमें धूल,ध्वनि और प्रकाश का प्रदूषण बीमारों, शिशुओं,नव-प्रसूताओं को तकलीफ़ देता है. उस पर नेतागिरी के जलवे ।

मानों जनसमर्थन जुटाने  के लिये एक राह  खुल गई हो

नवरात्रों में देवी की आराधना ...वह भक्ति जिसके लिये गरबा पर्व गुजरात से चल कर पूरे देश में अपनी पहचान बना रहा है गायब है ।

देवी माँ उदास हैं कि उसके बच्चों को ये क्या हो गया है....गुम हो रही है गरिमा,मर्यादा,अपनापन,लोक-संगीत।माँ तुम ही कुछ करो तो करो...बाक़ी हम सब तो बेबस हैं !  

 

न्यूयार्क के ब्लॉगर भाई चंद्रेश जी ने इसे अपने ब्लॉग Chandresh's IACAW Blog (The Original Chandresh), गरबा शीर्षक से पोष्ट छापी है जो देखने लायक है कि न्यूयार्क के भारत वंशी गरबा के लिए कितने उत्साही हैं

सोमवार, 11 सितंबर 2023

Connection कनैक्शन Dr Salil Samadhiya

कुछ लोगों के साथ आप सहज अनुभव करते हैं. उनका होना आप में कुछ खलल नहीं डालता, उल्टे उनसे मिलकर आप कुछ खाली ही हो जाते हैं.
वहीं कुछ लोग ऐसे होते हैं कि उनका अगर फोन भी आ जाए, तो नाम देखकर उठाने का जी नहीं करता.
उनसे दो मिनट बात करना भी बड़ा भारी गुजरता है.
मुझे सहज, अनौपचारिक और लपड़ धपड़ बात करने वाले ही भाते हैं.
वे लोग, जो जैसे हैं..वैसे हैं.
किसी पर किसी प्रकार का प्रभाव नहीं डालना चाहते, ऎसे लोगों के साथ मैं, पानी में पानी की तरह मिल जाता हूं.
वहीं ख़ुदनुमाई और खुदपरस्ती से भरे लोग मुझमें विकर्षण पैदा करते हैं.
वे लोग भी, जो अतिरिक्त गुरु-गंभीर हैं और औपचारिक बातें करते हैं मुझे पसंद नहीं आते. 
किसी लोकाचार वश मैं उनसे मिल भले लूं, पर उनसे मेरा कनेक्शन नहीं बनता.

इसी तरह कुछ स्थान भी होते हैं.
मसलन, मैं किसी कन्वेंशन, सेमिनार, समारोह जैसे स्थान पर कंफर्टेबल अनुभव नहीं करता.
वे सभी जगहें जहां अतिरिक्त दिखावे और औपचारिकता ओढ़े रहने की दरकार हो, मुझ में अरुचि पैदा करती हैं.
सच कहूं तो मुझे वही जगहें भाती हैं जहां मैं, अभी जैसा हूं उन्हीं कपड़ों में जा सकूं, और जैसा मित्रों या घर के लोगों से बात करता हूं उसी बे-तकल्लुफ़ी से बतिया सकूं.
जब छोटी वय का था तब जरूर कभी-कभार बाहरी आडंबर से प्रभावित हुआ होऊँ, 
मगर अब ऐसा हो गया है कि पैकेजिंग का मुझ पर कोई असर नहीं पड़ता.
वह चाहे इंटेलेक्चुअल का स्वांग धरा कोई खुरदुरा नास्तिक हो कि निहलिस्ट,
रहस्य और तसव्वुफ बघारने वाली कवियित्री हो कि,
मिठास की पुड़िया बना, जटाजूट, चोगाधारी आध्यात्मिक साधु,..मेरे नासापुट नकलीपन की गंध बहुत जल्दी भाँप जाते हैं.
इसके उलट, मौलिक व्यक्ति से मेरा कनेक्शन तुरंत बन जाता है. क्योंकि वह जैसा है उससे कुछ इतर दिखाने की कोशिश नहीं कर रहा होता.
उसमें सच्चाई होती है और सच से बड़ा कोई कनेक्शन नहीं.

लेकिन इधर अनेक वर्षों से देख रहा हूं कि मेरा किसी से कोई गहरा कनेक्शन नहीं बन पा रहा.
लोग बहुत आडंबरी हो गए हैं. 
सूचना और ज्ञान की इतनी बंबारडिंग हो रखी है कि जीवन से मौलिकता नष्ट हो गई है.
व्यक्ति उधार ज्ञान में ही पूरा जीवन जी जाता है और अपनी आत्मा के मूल स्वर से उसकी कोई सम-स्वरता नहीं बन पाती.
फिर जिसका स्वयं से ही नाता न बन सका उसका किसी और से क्या नाता बन सकेगा  !!

एक प्रश्न मेरे मन में हमेशा उठता था कि ऐसा क्यों होता है कि, जिस व्यक्ति से बहुत सारे लोग प्रभावित होते हैं उससे मैं प्रभावित नहीं हो पाता.
बाद में पाया कि मैं मौलिकता से ही प्रभावित होता हूं जो अब इधर ढूंढे नहीं मिलती .
कभी किसी अमृता प्रीतम ने अपनी तरह से जिया और लिखा, वह उनकी मौलिकता थी. मगर बाद की कवियित्रियां उनकी छाया बनकर रह गई. 
किसी मुक्तिबोध ने अलग ढंग से लिखा था क्योंकि जीवन को देखने, अनुभव करने और बयान करने की उसकी अपनी दृष्टि और वाणी थी. 
मगर फिर नकलचीं आए और साहित्य जगत में,छोटे-छोटे मुक्तिबोध,सब ओर फैल गए .
किसी ओशो ने अपनी तरह से जिया और कहा मगर फिर उनके मिमिक्री आर्टिस्ट जगह जगह उग आए.
सब ओर दोहराव ही दोहराव है, मौलिकता का ताज़ा झोंका कहीं से नहीं आता.
दोहराव से ऊब उठती है.
एक बार पकी तरकारी को चौथी या पांचवी बार नहीं खाया जा सकता. 

फिर मनुष्य से कनेक्शन तो छोड़िये, इधर मैं देखता हूं कि,
टूरिज्म पर निकले लोग भी, अपना अधिक वक्त लग्जरी कार, होटल, रेस्टोरेंट या मॉल में गुजारते हैं, न कि खुले आकाश, पहाड़ या समंदर के तट पर.
गोया प्रकृति से उनका कोई कनेक्शन ही नहीं बनता.
शायद यही कारण है कि हर व्यक्ति भीतर से बहुत अकेलापन और विषाद अनुभव करता है.

जल में जल की धारा मिलने से जल का परिमाण बढ़ जाता है.
अलकनंदा और भागीरथी मिलकर गंगा बन जाती हैं.
तब ही वह विशाल जल राशि,यात्रा पथ पर आगे बढ़ पाती है.
हर नदी में कितनी ही सहायक नदियों का मिलन होता है.
मगर मनुष्य, पानी में पानी की तरह नहीं मिलता.
उसने अपने चारों तरफ इतनी सीमाएं बना ली हैं कि, दूसरे मनुष्य की उसके भीतर कोई पहुंच ही नहीं है.
यही कारण है कि उसके जीवन में रस और प्राण की बढ़ोतरी न हो पा रही.
वह उतना वॉल्यूम और वेग नहीं जुटा पा रहा कि चेतना के किसी महासागर की ओर उसकी यात्रा संपन्न हो सके.

##सलिल##

सोमवार, 7 अगस्त 2023

Points to consider for a prosperous nation


[  ] To make any nation effective and ideal, it is necessary to be a fighter like Napoleon Bonaparte.
[  ] There are millions of good things in democracy but polarization is one of the most negative factor which makes democracy Unfair.
[  ] By the prosperity of any country, you can identify its soft power.It is the moral responsibility of every citizen to work on the concept of nation first.
[  ] Most of the countries in Asia and Africa have been colonies of one or the other European country. These countries have to revive their cultural continuity.
[  ] One should not consider oneself great and superior by comparing with weak nations, but comparison should be made with strong nations.
[  ] Pakistan is such a nation where the rulers are always ahead in weakening the mental level of the subjects.
[  ] The limit of freedom of expression should be limited to the honor of the nation. If your expression destroys the honor of the nation then you are a criminal.
[  ] The meaning of India is not only a nation but it is related to the cultural and spiritual consciousness of that nation.
[  ] Keeping someone calm does not prove that he is a coward.Only the brave can keep the peace forever,

दाम्पत्य जीवन में यौन संबंधों का महत्व

  फोटो साभार : पत्रिका  मनुष्य के जीवन में बुद्धि एक ऐसा तत्व है जो  मनुष्य को विश्लेषण करने की क्षमता प्रदान करती है।   बुद्धि का अधिकांश ...