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नर्मदा गीत

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स्वजनों को नर्मदा जयंती पर हार्दिक बधाई के साथ      सेठानी घाट होसंगाबाद मंथर प्रबल प्रवाहनी माँ रेवा मक्र-वाहिनी माँ ।।  प्रिय का पथ तज भई बिरागिनि युग की पीर निवारिनी माँ ।।  निर्मलजल कल कल अविरल बिंदु बिंदु अमृत का मिसरन । तट हरियाए हुलस हुलस के- सकल धरा पहने आभूषन ।। बनी प्रकृति सवारनी  माँ ।।  कोल भील वनचर पथचारी तेरे तट बहु तीरथ माई । कलकल जल कलरव के संग कंठ कंठ ने कथा सुनाई ।। पंथ प्रबल मन भावनी मां ।। *गिरीश बिल्लोरे मुकुल*

भारत में कृषि एवम कृषकों की समस्याओं पर एक नज़र

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भारत में कृषि एवम कृषकों की समस्याओं पर एक नज़र             गिरीश बिल्लोरे मुकुल भारत का कुल क्षेत्रफल 3287000 वर्ग किलोमीटर है। और इसमें सर्वाधिक हिस्सा 51% कृषि योग्य भूमि का है जबकि वन भूमि 21% चरोखर 4% और 26% ऐसी भूमि है जिस पर कोई भी उत्पादन संभव नहीं है। भारत में 2019 से 2020 तक 295.65 मिलियन मीट्रिक टन खाद्यान्न का उत्पादन किया गया जबकि विगत वर्ष दो हजार अट्ठारह उन्नीस में 285.21 मिलियन मीठी संथाल अर्थात लगभग 10.46 मिलियन मीट्रिक टन अधिक। भारत की जनसंख्या 1.35 बिलियन रही है जबकि इसी अवधि में यूनाइटेड स्टेट ऑफ अमेरिका की जनसंख्या केवल 327.2 मिलियन रही है जनसंख्या के मामले में चीन 1.39 अरब जनसंख्या के साथ सबसे आगे है .  भारत के कुल आर्थिक विकास में  कोविड19 के पूर्व की कृषि विकास दर 18.2 % थी जो इस वर्ष 16.5% हो चुकी है।   भारत में प्रति व्यक्ति आय ₹11254 का अनुमान भारत सरकार ने लगाया है यह आय  विगत वर्ष ₹10534 प्रति व्यक्ति आंकी गई थी । अमेरिका में प्रति व्यक्ति आय लगभग $60000 प्रति वर्ष और चीन में यही आए $10000 प्रति वर्ष आंकी की गई । अर्थात अमेरिका में ₹ 4800000 

वासंती कविता

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शीतल भई बयार पंथ सब नीके लागैं । ऋतु बसंत जब छाय, सबई रंग फीके लागैं ।। लखै मुकुल कविराय प्रेमरंग नयनन भावै- वासंती उत्साह पल पल नाच नचावै ।। शारद करे सहाय सामवेद मन भाया - पोर पोर हम आपके ये ऋतुराज़ समाया ।। शिव तापस रंग त्याग के, देखो भये कुमार संभव हो जावे यहां, प्रीत-मिलन-श्रृंगार ।। जागै कवि मन चेतना, शेष कछुक नै भाय । माधव मास सु आगमन, सुख हर मन महुँ छाय ।। 💐💐💐💐 वसंत पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएं माँ शारदा सदा सहाय करें 💐💐💐💐💐💐💐💐💐 *गिरीश बिल्लोरे मुकुल*

उम्र दराज़ बुज़ुर्ग

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उम्र के साथ  बढ़ जाती है उम्मीदें..! सपने हैं कि झुंड के झुंड चले आते हैं चुलबुली चहकतीं चिड़ियों की तरह उम्र के साथ चहकते हैं...! सपने अपने कमजोर  हो जाने वाले एहसासों को ... अपनी पीठ पर बैठा कर बहुत ऊंचे ले जाते हैं  ये सपनों के पंछी । और फिर उम्र के साथ बढ़  जातीं हैं उम्मीदें 

"जिसने श्रीकृष्ण को जिया, चखा,और पिया - वह ओशो थे" - डॉ आनंद राणा

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"जिसने श्रीकृष्ण को जिया, चखा,और पिया - वह ओशो थे" "ओशो का न कभी जन्म हुआ न मृत्यु। वे केवल इस वसुंधरा पर 11 दिसंबर 1931 से 19 जनवरी 1990 तक भ्रमण करने आये थे"..अवतरण दिवस की अनंत कोटि शुभकामनायें..त्वदीय पाद पंकजम् नमामि देवी नर्मदे.. माँ नर्मदा के पवित्र जल और संस्कारधानी की पवित्र मिट्टी से..धर्म +अध्यात्म +दर्शन सहित विविध विधाओं के दुर्लभ रंग बिरंगे खूबसूरत और सुगंधित अमर पुष्प 🌸 विकसित हुए..कभी महर्षि गौतम के रूप में,कभी जाबालि ऋषि के रुप में ,तो कभी भृगु मुनि के रूप में,कभी महर्षि महेश योगी के रूप में, तो कभी आचार्य रजनीश के रूप में.. इनमें ओशो पारिजात (हरसिंगार) पुष्प 🌸हैं.. यह निर्विवाद सत्य है कि संसार के रंगमंच पर समय समय पर महान आत्माएं अवतरित होती हैं, जो अपनी दिव्य छवि का प्रकाश बिखेर कर अपने चरण चिन्ह, आने वाली पीढ़ियों के लिए छोड़ जाती हैं, जिससे भविष्य में भी उनका मार्गदर्शन होता रहे.. ऐंसी युगांतकारी आत्माओं में आचार्य रजनीश का नाम सदैव अमर रहेगा...संस्कारधानी में 21 वर्ष बीते और यहीं मौलश्री वृक्ष 🌳 के नीचे दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ..

बातूनी होतीं हैं किताबें..!

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*बातूनी होतीं हैं किताबें...!* मुखर कर देतीं है  कभी सोचते हो ? सोचो...!  कैसे पढ़ना हैं ? मैं उनको पढ़ता नहीं कभी भी  बस बतियाता हूँ / सवाल करता हूँ  हर सवाल का उत्तर देतीं हैं ! माँगती कुछ नहीं  समय इसका मूल्य है  चुका दो और बात करो इनसे समय जो तुम  चुगलियों निंदा फ़िज़ूल बातों  पर खर्चते हो इनको दे...दो ..!  ये सब कुछ बता देंगी  किताबें जो मौन रहकर चीख चीख कर कहतीं हैं.. मत लड़ो टूट जाओगे  उसके इसके इनके उनके  आँसू पौंछते रहो..! तुम जान लोगे  खुद को  पहचान लोगे ।। चलो एक किताब  रखलो न अपने सिरहाने । चिंताओं को पैताने..!! बात करो इनसे  ये आखिरी डाकिया नहीं  इनका अनन्त तक साथ मिलेगा । ये अनादि हैं अनंत भी । ये भोगिनी लावण्या हैं  ये योगिनी संत भी !  *गिरीश बिल्लोरे मुकुल* कल रात लिखी इस कविता को आज जबलपुर एक्सप्रेस के 7 दिसम्बर 2020 के अंक ने प्रकाशित भी कर दी   

मन के मनके साझा करतीं

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न ही तुम हो स्वर्ण-मुद्रिका-  जिसे तपा के जांचा जाए. ********** जितनी बार रूमानी होकर   स्वप्निल होने को मन कहता उतनी बार मीत तुम्हारा  भोला मुख सन्मुख है रहता. ********************** सच तो है अखबार नहीं तुम, जिसको को कुछ पल बांचा जाये. न ही तुम हो स्वर्ण-मुद्रिका- जिसे तपा के जांचा जाए. मनपथ की तुम दीप शिखा हो यही बात हर गीत है कहता । ************************ सुनो प्रिया मन के सागर का जब जब मंथन मैं करता हूं तब तब हैं नवरत्न उभरते अरु मैं अवलोकन करता हूँ हरेक रतन तुम्हारे जैसा..! तुम ही हो , मन  है कहता. ************************ मन के मनके साझा करतीं पीर अगर तो मुस्कातीं तुम । पर्व दिवस के आने से पहले कोना कोना चमकाती तुम ! दुविधा अरु संकट के पल में मातृ रूप , तुम में मन लखता ।। ************************