रविवार, 2 अगस्त 2020

Lamtera : loudly soul generated voice of spiritual person..

बुंदेली लोक गायन में 3 गायन शैलीयाँ  मुझे बहुत भावुक कर देती है जिनको #बम्बूलियाँ, #देवीजस और  #लमटेरा के नाम से जानते हैं । यूं तो बुंदेली लोक गायन में ढिमरयाई, फाग, राई, बरेदी, बधाई,  भी हैं । पर ये तीन आध्यात्मिक चिंतन से सराबोर होने के कारण मोहित करतीं हैं । इन से मेरा बचपन से रिश्ता बन गया था । #बाबूजी रेलवे में स्टेशन मास्टर हुआ करते थे तब मैंने इनकी ध्वनियों को सुना था । 
*गांव के रेलवे स्टेशन के पास से गुज़रते क़ाफ़िले से उभरती मधुर समवेत आवाज़ें जो बैलों की गले की लकड़ी और पीतल की घंटियों , पहियों की खड़ख़ड़ाहट, के साथ सम्मिश्रित ( synchronise ) होकर कुछ इस तरह बन जाती थीं...गोया गंधर्वों के झुंड के झुंड सपरिवार धरा पर उतर आए हों शिव को तलाशने वह भी बेटी शांकरी के अंचल में*
मां नर्मदा के भक्त बुंदेलखंड में कुछ इसी तरह का दृश्य बनाया करते थे ।
ऐसे दृश्य अक्सर मैंने सुबह-सुबह देखे-सुने हैं । तब जब बहुत कम उम्र थी मन में संगीत के प्रति अनुराग पैदा हो गया । शनै: शनै: जब नर्मदा के महत्व को समझा तो जाना कि पूरे नर्मदा तट ही नहीं आध्यात्मिक चिंतन के वे तट हैं जहां गुरुवर शंकराचार्य साधना स्थल के रूप में चिन्हित कर गए थे।
इन्हीं तटों के इर्दगिर्द पनपी मालवी, निमाड़ी, भुवाणी, बुंदेली, बोलियां । 
   बुंदेलखंड महाकौशल के आसपास बचपन रहने के कारण मुझे बम्बुलिया, एवम  लमटेरा, ढिमरयाई, फाग, राई, जैसी गायन-शैलियों ने खूब लुभाया है। पर सबसे अधिक बम्बूलियाँ एवम लमटेरा ने । 
बंबुलिया और लमटेरा शैली में जिस तरह से लोक गायक आत्मा से निकली हुई आवाज में शिव और नर्मदा की आराधना करते हैं, उसे केवल एक आध्यात्मिक संगीत ही कह सकता हूँ । इससे अलग कुछ भी मानने को तैयार नहीं । 
बम्बूलियाँ एवम लमटेरा शैली में जिस आवाज़ का प्रयोग होता है वो आवाज़ *loudly soul generated voice of spiritual person..* ही है । 
कुछ उद्धरण देखिए
दरस की तो बेरा भई रे...!
पट खोलो छ्बीले भैरो लाल रे..!
लगन मोरी तुमसे तो लगी रे...!
महादेव बाबा बड़े रसिया रे...!!
फ़ोटो Mukul Yadav ji

सोमवार, 27 जुलाई 2020

पड़ जाए है फफूंद भी, खुले अचार में


ग़ज़ल
गुमशुदा हैं हम, ख़ुद अपने बाज़ार में ।
ये हादसा हुआ है, किसी ऐतबार में ।।
कुछ मर्तबान हैं, तुम रखना सम्हाल के -
पड़ जाए है फफूंद भी, खुले अचार में ।।
रोटियों पे साग थी , खुश्बू थी हर तरफ -
गूँथा है गोया आटा, तुमने अश्रुधार में ।।
अय माँ तुम्हारे हाथ की रोटियाँ कमाल थीं-
बिन घी की मगर तर थीं तुम्हारे ही प्यार में ।।
हाथों पे हाथ, सर पे दूध की पट्टियाँ-
जाती न थी माँ जो हम हों बुखार में ।।

सोमवार, 13 अप्रैल 2020

प्रणय पिपासा प्रेम नहीं प्रिय

*सुप्रभात शब्द साधक-साधिकाओं को*
*यह रचना भोर काल के सात्विक चिंतन की परिणीति है..! आप इसे किस दृष्टिकोण से स्वीकारेंगे यह आपकी टिप्पणियों से संसूचित होगा*
🙏🏻🙏🏻🙏🏻

प्रणय पिपासा प्रेम नहीं प्रिय
प्रेम को अब विस्तार तो दे दो ।

प्रेम के पथ के पथचारी को
भय कैसा कैसी अभिलाषा ।
न तो पाने की लालच ही 
खोने की जाने परिभाषा ।।
साहस कर आया है जो द्वारे -
प्रीत-दृष्टि एक बार तो दे दो ।।

गीत लिखो या ग्रंथ लिखो
सबके सब ही अर्थहीन से ।
मादक रूप चपल यौवन के
सन्मुख तुम क्यों दीनहीन से।।
प्रीत पराजित-रुदन कहां है-
मुखर निमंत्रण इस बार तो दे दो ।।

जो दुर्बल हो वह प्रेमी कैसा 
जो प्रेमी वो ही बलशाली ।
प्रेम वाटिका तक जाके देखो
मन-मानस है जिसका माली ।।
अमरबेल से शोषित तरुओं को
कर संरक्षित अरु प्यार भी दे दो ।।
*गिरीश बिल्लोरे मुकुल*

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020

प्रिया, तुम तो हो रँगरेजन


छाया :- मुकुल यादव
मन में आकर तुम ने मेरे पीर भरा जोड़ा क्यों नाता . अपनी अनुबंधित शामों से क्यों कर तोड़ा तुमने नाता …………………………………..!! 
मैं न जानूं रीत प्रीत की, 
 तुम ने लजा लजा सिखाई.. 
इक अनबोली कहन कही 
 राह प्रीत की मुझे दिखाई 
इक तो मन मेरा मस्ताना- 
यूँ मंद मंद तेरा मुस्काना .. 
भले दूर हो फ़िर तुमसे.. 
 बहुत गहन है मेरा नाता..!! मन में आकर तुम …………………………………..!!
 मन आंगन में स्वप्न सलोने, 
 खेलें जैसे भोला बचपन । 
कैसे करूँ अभिव्यक्त स्वयं को 
मन का भी तो है अनुशासन . ..
प्रिया हो तुम तो रंगरेजन .
तुमको पत्थर रंगना  है आता !! 
मन में आकर तुम ……………………………..!! 
 छायाचित्र :- Mukul Yadav 
शब्द संयो.:- Girish Billore Mukul

रविवार, 29 दिसंबर 2019

असहमति या यह सिद्ध नहीं करती कि कोई आपका विरोधी ही है


                  जी हां मैं यही सब को समझाता हूं और समझता भी हूं कि अगर कोई मुझसे सहमत है तो वह मेरा विरोधी है ऐसा सोचना गलत है । सामान्यतः ऐसा नहीं हो रहा है.... वैचारिक विपन्नता बौद्धिक दिवालियापन और आत्ममुग्धता का अतिरेक तीन ऐसे मुद्दे हैं जिनकी वजह से मानव संकीर्ण हो जाता है । इन तीनों कारणों से लोग अनुयायी और किसी के भी पिछलग्गू  बन जाते हैं । सबके पिछलग्गू बनने की जरूरत क्या है क्यों हम किसी के भी झंडे के पीछे दौड़ते हैं वास्तव में हमारे पास विचार पुंज की कमी होती है और हम विचार धारा के प्रवाह में कमजोर होने की वजह से दौड़ने लगते हैं । वैचारिक विपन्नता बौद्धिक दिवालियापन आत्ममुग्धता का अतिरेक किसी भी मनुष्य को पथभ्रष्ट करने वाली त्रिवेणी है ।
    जब आप किसी चर्चित लेखक के लेखन में मैं शब्द का प्रयोग देखें तो समझ जाइए कि वह आत्ममुग्ध है आत्ममुग्धता के अतिरेक में संलिप्त है और यह संलिप्तता अधोगामी रास्ते की ओर ले जाती है । क्योंकि जैसे ही आप अपने लेखन और चिंतन में स्वयं को प्रतिष्ठित करने की जुगत भुलाएंगे तो तुरंत एक्सपोज हो जाते हैं । लघु चिंतन की परिणीति स्वरूप जब बड़े-बड़े लेख लिखे जाते हैं तो कुछ लोग उसमें अपनी मौजूदगी का एहसास दिलाते हैं और जो मौजूद नहीं होता वह लोग कल्याण का भाव । वैचारिक विद्रूप चाहे आत्ममुग्धता से प्रारंभ होती है और मनुष्य को अधोपतन की ओर ले जाती है.... !
    एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को यह कन्वेंस कराने की कोशिश करता है कि उसका मार्ग श्रेष्ठ है...! ऐसा लगता है वह सेल्फ एडवोकेसी के सारे हथकंडे अपना रहा है । यह जरूरी नहीं है कि मैं गांधीजी से शत-प्रतिशत सहमत रहूं यह भी जरूरी नहीं है कि नेशनल मंडेला के प्रति मेरी अंधभक्ति हो तो यह भी जरूरी नहीं है कि लियो टॉलस्टॉय को हूबहू स्वीकार लिया जाए रजनीश यानी आज का ओशो कैसे स्वीकार्य होगा स्वीकार्य तो जग्गी भी नहीं होंगे । जब कोई कार्ल मार्क्स को अपने अंदाज में कोई पोट्रेट करता है .... तो जरूरी नहीं कि आप सभी सहमत हो जाएं !
     क्योंकि देश काल परिस्थिति के अनुसार ही कोई व्यक्ति अनुकूल होता है अतः कालांतर में अस्वीकृति भी संभव है असहमति भी संभव है... इसका यह मतलब नहीं की कार्ल मार्क्स को सिरे से खारिज कर दिया जाए टॉलस्टॉय भी सिरे से खारिज करने योग्य नहीं है नाही महात्मा जी परंतु सदियों से एक व्यवस्था रही है जो हमने स्वयं स्वीकार्य की है कि अगर हम बहुसंख्यक समर्थकों के विरुद्ध जाते हैं तो लोग हमें दुश्मन समझने लगते हैं अब देखिए ना आयातित विचारधारा में बह रहे लोगों ने कितने हथकंडे नहीं अपना लिए पर क्या संभव है कि पूरा विश्व साम्य में में शामिल रहे या मूर्ति पूजा का विरोध मूर्ति पूजक को क्षति पहुंचा कर या मूर्ति को तोड़कर किया जाए आपका अधिकार केवल असहमति तक हो सकता है मूर्ति तोड़कर आप ना तो उसकी आस्था को खत्म कर सकते और ना ही अमूर्त ईस्ट को स्थापित ही कर सकते हैं । दुश्मन यही करता है लेकिन भारतीय प्रजातांत्रिक व्यवस्था में असहमति को दुश्मनी का पर्याय नहीं माना गया है यहां तक कि अगर हम हजारों साल पुराना सोशल सिस्टम ध्यान से देखें तो हमें लगता है कि हर काल में असहमतियों को अभिव्यक्त किया  गया । परंतु अभिव्यक्ति करने वाले को शत्रु नहीं माना ऐसे हजारों उदाहरण है परंतु समकालीन परिस्थितियों में अधोपतित होती मानसिकता के कारण असहमति को गंभीरता से लिया जा रहा है और असहमति की अभिव्यक्ति करने वाले को शत्रु की संज्ञा दी जा रही है ऐसा नहीं है हमारी आपकी वैचारिक असहमति हमारी शत्रुता की वजह नहीं हो सकती.... फिर हम शत्रुता को मूर्त स्वरूप क्यों देते फिर रहे हैं ?
    इस प्रश्न की जब पतासाज़ी की तो पता चला- " मनुष्य संकीर्णता का शिकार है क्योंकि वह अत्यधिक आत्ममुग्ध है...! भयभीत भी है कि कहीं उसकी पहचान ना खो जाए....!
    और यह सब होता है  वैचारिक विपन्नता के कारण जिसका सीधा रिश्ता है अध्ययन और चिंतन में पारस्परिक सिंक्रोनाइजेशन का अभाव...!
     यह बहुत रहस्यवादी बात नहीं है यह मानसिक स्थिति है अगर स्वयं को पतन से बचाना है तो असहमति को एक तथ्य के रूप में स्वीकार थे चाहिए अहंकार के भाव को नर्मदा की तेज धारा में प्रवाहित कर आइए । असहमति यों को फेस करने की क्षमता को विकसित करना ही होगा ।
        आयातित विचारधारा में वर्ग और वर्ग संघर्ष दो महत्वपूर्ण तथ्य उभर कर आते हैं जो वर्तमान में नैसर्गिक नहीं है वर्तमान में वर्ग निर्मित किए जा रहे हैं ताकि वर्ग संघर्ष कराया जा सके । वर्ग संघर्ष होते ही आप नेतृत्व के शीर्ष पर होंगे । जिसके लिए आपको हल्के और संकीर्ण विचारधारा दे अनुयायियों की जरूरत होगी जैसा हाल में नजर आता है अब जबकि जाति वर्ग संप्रदाय यहां तक कि धर्म भी गौड़ हो चुके हैं तब लोग अपने हित के लिए इतिहास को पुनर्जीवित करते हैं और किसी को विक्टिम बताकर किसी दूसरे से उलझा देते हैं जिसका किसी से कोई लेना देना नहीं । आए दिन हम ब्राह्मणों के खिलाफ वक्तव्य देते हैं एक विचारक ने को भीड़ को इतना उकसाया है कि वह मनुस्मृति की प्रतियां खरीदते हैं और जला देते हैं मनुस्मृति मुद्रक को इससे बहुत लाभ होता है लेकिन देश को देश को वर्ग संघर्ष हासिल होता है परंतु उस कथित विद्वान को नेतृत्व चमकाने का मौका मिल जाता है । यह एक ऐसा उदाहरण है जोकि सर्वदा अशोभनीय और चिंताजनक है । अगर आप ऐसा करेंगे तो उसकी प्रतिक्रिया होगी बहुत दिनों तक इग्नोर नहीं किया जा सकता आखिर दूसरा पक्ष भी बावजूद इसके कि वह संवैधानिक व्यवस्था का अनुयाई है अपने ऊपर लगे आरोप और अनाधिकृत अपमानजनक उल्लेख के खिलाफ कभी ना कभी तो संघर्ष के लिए उतारू होगा । यहां बौद्धिक होने का दावा करने वाले लोगों को चाहिए कि वे कैसे भी हो सामाजिक समरसता को ध्यान में रखें और वर्तमान परिस्थितियों को जितनी सरल है उससे भी सरल सहज और सर्वप्रिय बनाएं परंतु ऐसा नहीं होगा क्योंकि वर्गीकरण कर वर्ग बना देना और युद्ध कराना वैमनस्यता पैदा करना सामान्य जीवन क्रम में शामिल हो गया है । सतर्क रहें वे लोग जो किसी के अंधानुकरण में पागल हुए जा रहे हैं साफ तौर पर बताना जरूरी है कि वे पतन की ओर जा रहे हैं । जीवन का उद्देश्य यह नहीं है कि आप अपनी बात मनवाने के लिए देश को समाज को विश्व को होली में दहन करने की कोशिश करें एक कोशिश की थी मोहम्मद अली जिन्ना ने असहमत हूं कि वे कायदे आजम कहलाए यह खिताब महात्मा ने दिया था इसका अर्थ यह नहीं कि मैं महात्मा को प्रेम नहीं करता महात्मा मेरे लिए उतने ही पूज्य हैं बावजूद इसके कि मैं उनके कुछ प्रयोगों को असफल मानता हूं तो कुछ प्रयोगों को मैं श्रेष्ठ कहता हूं जो महात्मा के हर प्रयोग को श्रेष्ठ मानते हैं वह मुझे अपना दुश्मन समझेंगे लेकिन ऐसा नहीं है अहिंसा का सर्वोत्तम पाठ उनसे ही सीखा है तो जाति धर्म और आर्थिक विषमता के आधार पर मनुष्य का मूल्यांकन करने की कोशिश को रोकने का आधार भी महात्मा गांधी के चिंतन ने मुझे दिया है । गांधीजी कुटीर उद्योगों को श्रेष्ठ मानते थे ओशो ने गांधी जी के इस विचार पर असहमति व्यक्त की तो अब आप तय कर लीजिए कि क्या गांधीजी के विरोध में थे ओशो ऐसा नहीं है जो जब अंकुर होता है वह तब स्थापित करने योग्य होता है ओशो ने यही किया उन्होंने गांधीजी को खारिज नहीं किया परिस्थिति बदलते ही कुछ परिवर्तन आने चाहिए और आए भी भारत ने ओशो के सुविचार को स्वीकारा । यानी हमें कुल मिलाकर मतों विचारों विचारधाराओं धर्मों संस्कारों का यथारूप सम्मान करना चाहिए और उसके अनुपालन को के खिलाफ वर्गीकरण नहीं करना चाहिए वर्गीकरण से वर्ग पैदा होते हैं और वर्ग संघर्ष का कारण बनते हैं क्योंकि बौद्धिक रूप से सब सक्षम है ऐसा संभव कहां ? अस्तु अपना विचार लेख यहीं समाप्त करने की अनुमति दीजिए मुझे मालूम है इतना बड़ा लेख बहुत कम लोग पढ़ेंगे फर्क नहीं पड़ता क्योंकि लिखा उनके लिए गया है जो इसे विस्तारित कर सकते हैं ।
सर्वे जना सुखिनो भवंतु
 ॐ राम कृष्ण हरी
पुछल्ला

मेहमान से मेज़बान ने पूछा:
क्या लेंगे आप, हलवा लाऊं या खीर? 🤔
मेहमान: घर में कटोरी एक ही है क्या?
😂😂

गुरुवार, 26 दिसंबर 2019

इंतज़ार

इंतज़ार
गूगल से साभार
दरख्तों को
पंछियों का
पंछियों को शाम का
शाम को मेरा
मुझे बस
तुम्हारा
इंतज़ार होता है...!!
तब तुम चौखट पर
सर टिकाए नुक्कड़ तक
देख लेती हो यकबयक
फिर उदास सी
पीछे वाली परछी में
सुलगती अधबुझी आंच को
समझा आती हो...!!
तब तक आँगन वाले
पेड़ पर
कोटर में तोते का बच्चा
तोती से चोंच लड़ा
चुग्गा चुन ही लेता है
कागा काँव काँव कर
सेट हो जाता है
मेरे आने से पहले
तुम कितनी देर
ताकती होगी नुक्कड़ तक
आते ही बस एक सवाल
आज देर हो गई
जबकि जानती हो
मेरे आने का यही वक्त है
पर हर इंतज़ार
कितना लंबा होता है
ये समझाने की कोशिश
वर्षों से जारी है..

गुरुवार, 5 सितंबर 2019

ये इश्क पारस से कम कहां है

तुम्हारे जैसी ग़ज़ल मिले तो, 
मैं दिल में उसको उतार लूंगा
अभी तलक हूँ मैं बिखरा बिखरा .. 
मिलो जो खुद को संवार लूंगा !!

गलत कहाँ है जहाँ में बोलो
इज़हार करना मोहब्बतों का ।
ये इश्क पारस से कम कहां है
करूंगा जिसको निखार दूंगा ।।

तुम्हारे हाथों में जाने कितनी
मेरे लिए हैं दुआ ख़ुदा से-
क़ुबूल अगरचे हुई ज़रा भी
तो उम्र पूरी गुज़ार लूंगा ।।

ये तख़्ते-ताउस ये ताज़पोशी
ये हाकिमों की बड़ी क़तारें ।
नज़र मिली ग़र नाज़नीं से-
वक़ार अपना उभार दूंगा ।।
*गिरीश बिल्लोरे मुकुल*


रविवार, 23 जून 2019

वस्ल के चर्चे गली गली...!


 *हिज़्र का कोई जिक्र नहीं*

वस्ल के चर्चे गली गली
हिज़्र का कोई ज़िक्र नहीं ।
इस बस्ती की फितरत है ग़ज़ब
मेरी तो किसी को फ़िक्र नहीं ।।

कोई ख्वाब नूरानी आएगा
ग़र तुम न हुए वो ख्वाब ही क्या ?
ये किस्से कैसे किस्से हैं
जिसमें रहबर का ज़िक्र नहीं ।।

तुम सबसे सुंदर सबसे हंसी
हूरों से क्या लेनादेना ।
दिल मेरा ज़न्नत से कमतर क्या
ज़न्नत की मुझे कोई फ़िक्र नहीं ।।

सब पूछा किये हम से अक्सर-
अहवाल तुम्हारा नुक्कड़ पे ।
क्या बात हुई मुकुल बोलो -
क्यों आप लगाते इत्र नहीं ।।
💐💐💐💐💐💐💐
*वस्ल-मिलन, हिज़्र-वियोग*
******************
*गिरीश बिल्लोरे मुकुल*

शुक्रवार, 17 अगस्त 2018

मस्तैला अलबेला कवि था

*अटलजी को समर्पित कविता*
मस्तैला अलबेला कवि था
प्रखर मुखर नवयुग का रवि था
^^^^^^^^
नवचिंतन , अध्ययन के दिन थे
तबसे तुमसे है मिलना जारी ।
मस्ताने वक्ता तबसे ही अपनी
चली आ रही तुमसे यारी ।।
रिश्ता जाने क्या दुनियाँ वाले
इक कविता का अपने कवि का ।।
*****
न देखा छूकर ही है तुमको
न ही सनमुख संवाद किया है ।।
जितना अब तक बोला है मैंने -
तेरा सब कुछ हुआ दिया है ।।
दुश्मन से भी रार न पाली
असर पड़ा तुमसे प्रखर कवि का ।।
*******
वर्ष सतहत्तर याद है सबको
विश्व मंच पर अभिव्यक्ति का ।
लोहा मनवाया था तुमने तब
इस भारत की शक्ति का ।।
मुस्काए जब बुद्ध विश्व हतप्रभ
मरुथल में हुआ उदय नए रवि का
^^^^^^
संख्याबल को सम्मानित कर
तेरह दिन में दिल जीत लिए ।
दुश्मन के द्वारे जा पहुंचे-
साथ सनेही गीत लिए ।।
कुलघाती ने वार पीठ पर किया
छलनी हुआ मानस कवि का ।।
*******
बाँया हाथ उठाया बोले
अब हार नहीं मानूँगा मैं।
पथ पे छल बो दो कितने भी
अब रार नहीं पालूंगा मैं ।।
जिससे मेरा मन आलोकित
ये प्रकाश है अटल रवि का
*******
मृत्यु को औक़ात बताना
जीवन का संवाद सुनाना ।
तुमसे बेहतर किससे सम्भव
देशराग का बेहतर गाना ।।
कूच किया अब कब आओगे
क्या उत्तर है बोलो तुम कवि का ।।
*********
*गिरीश बिल्लोरे मुकुल*

रविवार, 22 जुलाई 2018

बाल विकास भविष्य के आदर्श भारत की आधारशिला है : पूर्व महाप्रबंधक भारतीय रेल सेवा डॉ आलोक दवे



          "बच्चों में सदाचार वृत्तियों का बीजारोपण करने का दायित्व माता-पिता का ही है । बदलते परिवेश में अब अधिक सजगता एवम सतर्कता की ज़रूरत है ।आज संचार माध्यमों के ज़रिए जो कुछ भी हासिल हो रहा है उससे बच्चों पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव को लेकर हर अभिभावकों में चिंता व्याप्त है । अब ज़रूरत है 5 से 10 वर्ष की आयु तक के बच्चों से सतत संवाद करते रहने की क्योंकि हर बच्चा अनमोल है" - तदाशय के विचार पूर्व महाप्रबंधक भारतीय रेल सेवा डॉ आलोक दवे ने बालभवन में आयोजित *बदलते सामाजिक परिवेश में अभिभावकों के दायित्व* विषय पर आयोजित आमंत्रित  अभिभावकों के सम्मेलन में बोल रहे थे । श्री दवे सेवा निवृत्ति के उपरांत सत्य साईं सेवा समिति में बालविकास की गतिविधियों के लिए मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ के प्रभारी भी हैं ।


सम्मेलन का शुभारंभ करते हुये संस्कार शिक्षा प्रशिक्षक (मानसेवी) डॉ. अपर्णा तिवारी, ने बालभवन में 2010 से संचालित संस्कार कक्षाओं का संक्षिप्त विवरण देते हुए सम्पूर्ण बाल विकास में बच्चों के लिए संस्कार शिक्षा की उपयोगिता एवम औचित्य पर विस्तार से विचार रखे । श्रीमती पुनीता उपाध्याय ने विजुअल माध्यम से पॉवर-प्वाइंट प्रजेंटेशन के ज़रिये बच्चों के लिए के दायित्वों का तथ्यात्मक विश्लेषण करते हुए बच्चों के प्रति जागरूक किया ।

आयोजन के दौरान प्रशिक्षण खेलों का अभ्यास भी कराया गया । इस एक दिवसीय कार्यक्रम में प्रशिक्षण सहभागिता श्रीमती सीमा इसरानी , श्रीमती ज्योति नायडू, श्रीमती भारती , श्रीमती कुंदा, विरुढ़कर सुश्री प्रियंका मौज़ूद थीं ।
अतिथियों का सम्मान डॉ शिप्रा सुल्लेरे, श्री देवेंद्र यादव, श्री सोमनाथ सोनी द्वारा तिलक लगाकर एवम श्रीफल भेंट कर किया गया । आयोजन के लिए सहायक संचालक बालभवन गिरीश बिल्लोरे द्वारा आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम के आयोजन में श्री टी आर डेहरिया एवम श्री धर्मेंद्र, श्रीमती सीता ठाकुर  का विशेष योगदान उल्लेखनीय रहा ।



शनिवार, 21 जुलाई 2018

विष का प्यासा होता गिरीश


जब जब कुमुदनी  मुस्कुराए तो याद तुम्हें  कर  लेता हूँ
आँखों से बहते धारे से- मन का मैं सिंचन  कर  लेता  हूँ ..

इस भीड़ भाड़ में क्या रक्खा, सब कुछ एकाकी की रातों में -
तब बिना भेद के इस उसके, नातों पे चिंतन कर  लेता  हूँ !!

कहतें हैं सागर मंथन से नवरत्न मिला करता ही करतें हैं...?
विष का प्यासा होता गिरीश , मन का मंथन कर लेता हूँ..!!




सोमवार, 16 जुलाई 2018

पशेमाँ हूँ तुझसे तुझको बचाना चाहता हूँ मैं ।


पशेमाँ हूँ तुझी से, तुझको बचाना चाहता हूँ   ।
बिखर के टूट के तुझको सजाना चाहता हूँ  ।।
ज़िंदगी मुझसे छीनने को बज़िद हैं बहुत से लोग
ऐसी नज़रों से तुझको, छिपाना चाहता हूँ  ।।
बला की खूबसूरत हो, नज़र में सबकी हो जानम
चीखकर लोगों की नजरें हटाना चाहता हूँ  ।।
गिन के मुझको भी मिलीं हैं, औरों की तरह -
वादे साँसों से किये सब निभाना चाहता हूँ ।।
ख़ुशी बेची खरीदी जाए मोहब्बत की तिजारत हो
अमन की बस्तियाँ ज़मी पर  बसाना चाहता हूँ  ।।
कोई मासूम हँस के भर दे  झोली मेरी ख़ज़ानो से
बस ऐसे ही ख़ज़ानों  को  पाना चाहता हूँ ।।
*ज़िन्दगी* मुश्किलों से बना ताबूत है माना  -
मौत के द्वारे तलक मुस्कुराना चाहता हूँ  ।।


मंगलवार, 13 फ़रवरी 2018

प्रेम के तिनकों पर लपकतीं संस्कृति की लपटें


प्रेम संसार की नींव है जिसे किसी को नकारने में शर्म नहीं आती क्योंकि उसके पीछे फ्रायड है । फ्रायड एक भयानक सोच को चाहे अनचाहे रोप गया । जबकि प्रेम ऐसा नहीं जैसा फ्रायड ने सोचा है । प्रेम के अंकुरण से विश्व में सृष्टि के सृजन की अनुभूति होती है । प्रेम पाखण्ड नहीं हैं प्रेम दुर्वाशा भी नहीं प्रेम जीवन के उदयाचल से अस्ताचल तक का स्नेह कवच है ।
प्रेम किसी को भी कभी भी कहीं भी हो सकता है फ्रायड सुनो ये विपरीत लिंगी के बीच हो ऐसा नहीं ये समलिंगिंयों यहां तक कि जड़ से भी होता है ।
बूढ़े लोग अपना शहर छोड़ने में कतरातें हैं तो आपका पालतू भी आपके बिना बेचैन रहता है ।
बहुत बरसों से  मुझे हरि न मिला ।  हरि रेलवे में गैंगमेन था शाम को आता था बालपन में हरि मुझे बहुत प्यार करता था कुछ दिनों तक न दिखा माँ बतातीं थी मुझे तेज़ बुखार आ  गया था तेज़ तीन चार दिन तक । बिना रोगाणु बुखार का अर्थ क्या था । हरि के गांव से लौटते बुखार गायब ?
प्रेम की वज़ह प्रेम है तो समाधान भी प्रेम ही है । कहाँ राम कहाँ हनुमान कोई योग नहीं एक वनचर दूजा कुलीन क्षत्री राजकुल का बेटा ? प्रेम के सूत्र में बंधे दौनों इतिहास में दर्ज हैं ।
            एक बार तीन माह ट्रेनिंग में रहने के कारण भतीजे को न मिल सका घर लौटा तो घर के दरवाजे पर भतीजा मेरी गोद में आया कुछ देर थ अपलक मुझे देख अचानक ताबड़तोड़ मुझ पर झापड़ बरसाने लगा मानो पूछ रहा हो तो कहाँ था  ।
         फिर इतना ज़ोर से सीने से चिपक गया मानों उसने दुनियाँ का सब कुछ हासिल कर लिया हो । 9 से 10 माह की उम्र में चिन्मय का प्रेम और कैसे व्यक्त हो सकता था ? आप ही सोचिये ... अगर प्रेम संसारी बुनियाद नहीं तो क्या है ।
प्रेम उन्मादी होता है तो संवादी भी क्योंकि वो उन कणों का संग्रह है जो एकीकृत होकर ऊपर से नीचे की ओर बहता है सरिता सरीखा मिलता है तो पर्वत को भी चीर देता है जैसे धुआंधार तब वो उन्मादी है पर अवसर पर रोक न हो तो कछार में सबको सुख देता है ।
प्रेम का आधार वाक्य *सर्वे जना सुखिनः भवन्तु* है । वरना सूफी इसे स्वीकार कैसे करते । प्रेम दैहिक ही है तो साधु इसका जगह जगह ज़िक्र न करते । प्रेम मेरे और ईश्वर के बीच का मार्ग है उसमें अवरोध पैदा मत करना संस्कृति के नाम पर मूर्ख हो जब तुम सारी कायनात को एक ब्रह्म की उत्पत्ति मानते हो तो संत वैलेंटाइन बुरा क्यों ?
मैं प्रेमी हूँ मैं प्रेमिका हूँ इतना सोच के ईश्वर के करीब हो जाता हूँ । तुम संस्कृति के नाम पर राक्षसों सा बर्ताव न करो मुझे प्रेम करने दो खुले आम करने दो पूजा है भाई ये प्रेम और पूजा छिप के कौन करता है भला ?
*गिरीश बिल्लोरे मुकुल*