सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

दाम्पत्य जीवन में यौन संबंधों का महत्व

  फोटो साभार : पत्रिका  मनुष्य के जीवन में बुद्धि एक ऐसा तत्व है जो कि विश्लेषण करने में सक्षम है। बुद्धि अक्सर मानवता और व्यवस्था के विरुद्ध ही सर्वाधिक सक्रिय होती है।        बुद्धि निष्काम और सकाम प्रेम के साथ-साथ मानवीय आवश्यक भावों पर साम्राज्य स्थापित करने की कोशिश करती है।      भारतीय दर्शन को मुख्यतः दो भागों में महसूस किया जाता है... 1.   भारतीय जीवन दर्शन 2.   भारतीय अध्यात्मिक दर्शन            जीवन दर्शन में आध्यात्मिकता का समावेशन तय किया जाना चाहिए . जो लोग ऐसा कर पाते हैं उनका जीवन अद्भुत एवं मणिकांचन योग का आभास देता है। इसी तरह अध्यात्मिक दर्शन में भी सर्वे जना सुखिनो भवंतु का जीवन दर्शन से उभरा तत्व महत्वपूर्ण एवं आवश्यक होता है।       परंतु बुद्धि ऐसा करने से रोकती है। बहुत से ऐसे अवसर होते हैं जब मनुष्य प्रजाति आध्यात्मिकता और अपनी वर्तमान कुंठित जीवन परिस्थितियों को समझ ही नहीं पाती। परिणाम परिवारिक विखंडन श्रेष्ठता की दौड़ और कार्य करने का अहंकार मस्तिष्क को दूषित कर देता है।     अर्थ धर्म काम जीवन के दर्शन को आध्यात्मिकता से जोड़कर अद्वितीय व्यक्तित्
हाल की पोस्ट

विधवा नारी के सांस्कृतिक सामाजिक अधिकारों के हनन पर मार्मिक कथा -"हरे मंडप की तपन"

       वैभव की देह देहरी पे लाकर रखी गई फिर उठाकर ले गए आमतौर पर ऐसा ही तो होता है. चौखट के भीतर सामाजिक नियंत्रण रेखा के बीच एक नारी रह जाती है . जो अबला बेचारी विधवा, जिसके अधिकार तय हो जाते. उसे कैसे अपने आचरण से कौटोम्बिक यश को बरकरार रखना हैं सब कुछ ठूंस ठूंस के सिखाया जाता है . चार लोगों का भय दिखाकर .      चेतना दर्द और स्तब्धता के सैलाब से अपेक्षाकृत कम समय में उबर गई . भूलना बायोलाजिकल प्रक्रिया है . न भूलना एक बीमारी कही जा सकती है . चेतना पच्चीस बरस पहले की नारी अब एक परिपक्व प्रौढावस्था को जी रही है . खुद के जॉब के साथ साथ संयम को संयुक्ता को पढ़ाना लिखाना उसके लिए प्रारम्भ में ज़रा कठिन था . कहते हैं न संघर्ष से आत्मविश्वास की सृजन होता है . वही कुछ हुआ चेतना में . एक सुदृढ़ नारी बन पडी थी . चेतना ने आत्मबल बढाने के हर प्रयोग किये किस दबंगियत से लम्पट जीवों से मुकाबला करना है बेहतर तरीके से सीख चुकी थी . बच्चों का इंतज़ार करते करते बालकनी में बैठी आकाश पर निहारती चेतना ने एक पल अपने फ्लेट को निहारा फिर सोचने लगी 15 साल तक ब्याज और किश्तें चुका कर अपना हुआ फ़्लैट एक संघर

गर्मी वाली यादों का गीत

        फोटो मुकुल यादव भूले नहीं भूलता कोई कच्ची कैरी वाला गांव । एसी कूलर पंखे से शीतल मिट्टी के घर वाला गांव।।   टप टप गिरतीं पकी निंबोली पके बेल की मदिर सुगंध . दरभजिया में कच्ची कैरी- खाते सब रोटी के संग .. गर्म दुपहरी अमराई में.... किस्सागोई वाला गांव ।।   यहां पड़ोसी अनजाने से वहां सभी थे पहचाने से। हर घर से, हरेक का नाता   यहां के नाते मुस्काने के ।। याद बहुत आता है मुझको सबको गुथने वाला गांव ।।   चिलम तंबाकू चौपतिये अरु चोपड़ ताश की बाज़ी सजती  । खबरें सुनते ट्रांज़िस्टर  पर- कहीं रामधुन , ढोलक बजती।। रात नौ तक सब सो जाते- जल्दी उठने वाला गांव ।।   * गीतकार:गिरीश बिल्लोरे मुकुल*

महान कूटनीतिज्ञ एस जयशंकर भारत के विदेश मंत्री

 

दिल की बातें....!

[  ] "दिल में....!"* पंख कमज़ोर हैं, उड़ान बेशक़ ऊंची तो नहीं- बनके सागर  आकाश उतार दिया दिल में । मुझको अपनी पीढा पे रोने से रोकते क्यों हो ? ज़हर से तेज़ ज़हर है क्या  समाया  दिल में । न जाने मुझको अब रोज यही लगता  है - बुतशिकन, बुत बनाने का इरादा आया दिल में । अपने निज़ाम ओ' खूँ पे , जो इतराते हैं लोगों- उनका चेहरा पहले से ही है, नुमाया दिल में ।। वो जो अतफाल को गुमराह किया करतें हैं- जानके फिर कभी न, उनको बसाया दिल में ।। [  ] * हम सबको सीखा देते हैं..!* जिन समंदर मुक़ाबिल हैं ये दुनिया वाले- ऐसे सागर को अपने दिल में जगह देतें है ।। रिंद हूँ सागरो-मीना से मुहब्बत है मुझको, साक़ी, ये बात हम तुमको भी बता देतें हैं ।। कोई पूजा करे करने दे, बुतशिकन न बन अपनी बस्ती को क्यों आप जला लेते हैं ? जो सिखा पाए न उनको ग़ालिब ओ' रहीम "मुकुल" स्कूल में वो सब भी सिखा देते हैं । *गिरीश बिल्लोरे मुकुल*

भारतीय नजरिए से भारत को देखिए जीडी बक्शी और मेरी पुस्तकों के माध्यम से

   भारत के इतिहास को काल्पनिक साबित करने का क्रम आज से नहीं बल्कि वर्षों से चल रहा है। विगत 70 वर्षों से तो यह बहुत तेजी से चला है। वामपंथी विचारक और लेखक भारत के अस्तित्व को ही न करते हैं।  वामपंथी इतिहासकारों ने तो हद ही कर दी भारतीय महानायक श्रीराम और श्रीकृष्ण को मिथक चरित्र बता दिया। मित्रों जैनिज्म के प्रथम महापुरुष नेमिनाथ तक को इन साजिश करने वालों ने कृष्ण के समकालीन होते हुए व्याख्या और चर्चा से बाहर कर दिया ताकि कृष्ण को कल्पनिक घोषित किया जा सके। साहित्यकार अक्सर कल्पना में लेखन करते हैं। मेरा हमेशा से एक ही उद्देश्य रहा है कि जो लिखो यथार्थ लिखो लोकोपयोगी लिखो राष्ट्र के अस्तित्व को स्थापित करने वाला कंटेंट लिखो। परंतु दुर्भाग्य है इस देश का रामधारी सिंह दिनकर ने राम को लोक कथाओं का नायक निरूपित कर दिया। लोक साहित्य में भारतीय वैदिक साहित्य में  विदेशी यात्रियों द्वारा लिखे गए साहित्य में भारत के यथार्थ को चित्रित किया है। फिर भी हम अपने प्रमाद वश तथाकथित प्रगतिशील साहित्यकारों के प्रश्नों का जवाब नहीं दे पाते। हम पढ़ते नहीं हैं इसलिए हम जवाब नहीं दे पाते। रामधारी

अधरों ने अथक प्रयास किए...!

अधरों ने अथक प्रयास किए पर कह न सके मन की बातें। हमसे न हुई थी मुखर प्रीत संग बोझिल दिन बेबस रातें ।। अधरों......! कुछ प्रतिबंधों का भय था तब कुछ अनुबंधों की कस्में थीं । "न" से डर लगता था मन को कुछ अनबोली सी रस्में थीं ।। छोड़ो जाने भी दो, उनको- थीं वो बीते पल की बातें ।। अधरों.......! दुनिया भर की जिन रीतों से मेरा मन तन अब तक रीता है। इस दोराहे पर फिर से मिल मन भरम के सावन जीता है।। पर प्रीत के पहले पल को हम हैं कि भूल नहीं पाते ।। अधरों......!