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प्रेम का सन्देश देता ब्लॉग

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रविवार, 25 दिसंबर 2022

आने भी दो देख लेंगें, फसले-बहार को.

 *ग़ज़ल*

*आने भी दो देख लेंगें, फसले-बहार को.*

*क्योंकर कहो यूं, आप भी बेक़रार हो..!*

*आया जो यहाँ हमसे वो लेके ही गया,*

*रुसवाई ही मिली थी, इस खाक़सार को..*

*ज़ख्मों को साथ रखता हूँ ये वफादार हैं-*

*क्यों साथ रखूँ अपने, किसी रसूखदार को-*

*रिश्तों को सिक्कों से जब कोई तौलने लगे*

*न जाना उसके आंगन भाई हो या यार हो.*

*“माँ..! तेरे नाम के सिवा विरासत में कुछ नहीं*

*जबसे कहा है मुझको मुकुल, कर्ज़दार हो..*

*गिरीश बिल्लोरे मुकुल*

गुरुवार, 20 अक्तूबर 2022

बनके अंबर ऐसी छतों पर छाना चाहता हूं ....!


##गिरीश_की_ग़ज़ल 
इज़ाजत दे तेरी सोहबत से जाना चाहता हूं .
हक़ीकत-तेरी, दुनिया को बताना चाहता हूं .
सिंहासन से सवालों का हश्र मालूम है मुझको-
अपनी आवाज़ का असर देखना चाहता हूं .
सियासत जी-हुजूरी और ताक़त से मुझे क्या ? 
हां अपने गीत, अपनी धुन में गाना चाहता हूं. 
कसीदे पढ़ने वाले और होंगे तेरी महफिल के-
मैं अपनी खुद को ही सुनाना चाहता हूं.
तेरी छत घर तेरा रसूख तेरा ही आशियाना है-
बनके अंबर ऐसी छतों पर छाना चाहता हूं. 
*गिरीश बिल्लोरे मुकुल*


रविवार, 16 अक्तूबर 2022

इक पैर का जलवा तुझको दिखाना होगा


 

घुप अंधेरा है कोई दीपक जलाना होगा ।

इन अंधेरों से अब आंख  मिलाना होगा।।

मेरे वज़ूद की वज़ह मैं ही हूं तू नहीं -

तेरा ऐलान हर दीवार से मिटाना होगा ।।

रश्क़ न कर,चल साथ मेरे कुछ दूर तलक

इक पैर का जलवा तुझको दिखाना होगा।।

बिन सिक्कों के तेरा जादू , जादू कहां ?

तेरी बाजीगरी पे अब सिक्के लुटाना होगा ।।

तू टपकती हुई छत है किसे मालूम नहीं?

अबके बरसात के पहले, चूने से भराना होगा ।।

जहां देखो वहां कांटों के सिवा कुछ भी नहीं-

जलेगी आग तो, इन्हें खाक में जाना होगा।।

                          गिरीश बिल्लोरे मुकुल


सोमवार, 12 सितंबर 2022

द्विपीठाधीश्वर जगतगुरु शंकराचार्य परम पूज्य 1008 स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती को शत शत नमन



 राष्ट्रीय संत स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी सनातन धर्म के सर्वोच्च धर्मसम्राट ज्योतिषपीठाधीश्वर एवं द्वारकाशारदा पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती का 99 वर्ष की आयु पूर्ण 100 वें वर्ष में प्रवेश करने के पश्चात् आज उनका तपस्या स्थली परमहंसी गंगाआश्रम में देवलोकगमन् हो गया। शंकराचार्य जी का जन्म 24 सितम्बर 1924 को सिवनी जिले के ग्राम दिघोरी में हुआ था। सनातन हिन्दू परम्परा के कुलीन ब्राह्मण परिवार में  पिता श्रीधनपति उपाध्याय एवं माता गिरिजा देवी के यहां जन्मे स्वामी जी का नाम माता पिता ने पोथीराम रखा था। पोथी अर्थात् शास्त्र मानो शास्त्रावतार हों। ऐसे संस्कारशील परिवार में महाराजश्री के संस्कारों को जागृत होते देर न लगी और वे 9 वर्ष के कोमलवय में गृह त्याग कर भारत के प्रत्येक प्रसिद्ध तीर्थस्थान और संतों के दर्शन करते हुए आप काशी पहुंचे। वहां आपने ब्रह्मलीन स्वामी करपात्रीजी महाराज एवं स्वामी महेश्वरानन्द जी जैसे विद्वानों से वेद-वेदान्त, शास्त्र-पुराणेतिहास सहित स्मृति एवं न्याय ग्रन्थों का विधिवत् अनुशीलन किया।
यह वह काल था, जब भारत को अंग्रेजों से मुक्त करवाने की लड़ाई चल रही थी। महाराजश्री भी इस पक्ष के थे, इसलिए जब सन् 1942 में ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का घोष मुखरित हुआ, तो महाराज श्री भी स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े और मात्र 19 वर्ष की अवस्था में ‘क्रान्तिकारी साधु’ के रूप में प्रसिद्ध हुए। पूज्य श्रीचरणों को इसी सिलसिले में वाराणसी  और मध्यप्रदेश के जेलों में क्रमश: 9 और 6 महीने की सजाएं भोगनी पड़ीं। महापुरुषों के संकल्प की शक्ति से 1947 में देश आजाद हुआ। अब पूज्य श्री में तत्वज्ञान की उत्कण्ठा जगी।
भारतीय इतिहास में एकता के प्रतीक सन्त श्रीमदादिशङ्कराचार्य द्वारा स्थापित अद्वैत मत को सर्वश्रेष्ठ जानकर, आज के विखण्डित समाज में पुन: शङ्कराचार्य के विचारों के प्रसार को आवश्यक ज्ञान और तत्त्वचिन्तन के अपने संकल्प की पूर्ति हेतु सन् 1950 में ज्योतिष्पीठ के तत्कालीन शङ्कराचार्य स्वामी श्री ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज से विधिवत  दण्ड संन्यास की दीक्षा लेकर स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती नाम से प्रसिद्ध हुए। जिस भारत  की स्वतन्तत्रता के लिए आपने संग्राम किया था, उसी भारत को आजादी के बाद भी अखण्ड, शान्त और सुखी न देखकर भारत के नागरिकों को दैहिक एवं भौतिक तापों से मुक्ति दिलाने हेतु, हिन्दु कोड बिल के विरुद्ध स्वामी करपात्रीजी महाराज द्वारा  स्थापित  ‘रामराज्य परिषद्’ के अध्यक्ष पद से सम्पूर्ण भारत में रामराज्य लाने का प्रयत्न किया और हिन्दुओं को उनके राजनैतिक अस्तित्त्व का बोध कराया।
ज्योतिष्पीठ के शङ्कराचार्य स्वामी कृष्णबोधाश्रम जी महाराज के ब्रह्मलीन हो जाने पर सन् 1973 में द्वारकापीठ के तत्कालीन शङ्कराचार्य एवं स्वामी करपात्री जी महाराज सहित देश के तमाम संतों, विद्वानों द्वारा आप ज्योतिष्पीठ पर अभिषिक्त किये गये और ज्योतिष्पीठाधीश्वर शङ्कराचार्य के रूप में हिन्दुधर्म को अमूल्य संरक्षण देने लगे।
आपका संकल्प रहा है कि - विश्व का कल्याण। इसी शुभ भावना का मूर्तरूप देने के लिए आपने झारखण्ड प्रान्त के सिंहभूमि जिले में ‘विश्वकल्याण आश्रम’ की स्थापना की। जहां जंगल में रहने वाले आदिवासियों  को भोजन, औषधि एवं रोजगार देकर उनके जीवन को  उन्नत बनाने का आपने प्रयास किया। करोड़ों रुपयों की लागत से विशाल एवं आधुनिक अस्पताल वहां निर्मित हो चुका है, जिससे क्षेत्र के तमाम गरीब आदिवासी लाभान्वित हो रहे हैं।
पूज्यमहाराजश्री ने समस्त भारत की अध्यात्मिक उन्नति को ध्यान में रखकर आध्यात्मिक-उत्थान-मण्डल नामक संस्था स्थापित की थी। जिसका मुख्यालय भारत के मध्यभाग में स्थित मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर जिले में रखा। वहां पूज्य महाराज श्री ने राजराजेश्वरी त्रिपुर-सुन्दरी भगवती का विशाल मन्दिर बनाया है। सम्प्रति सारे देश में आध्यात्मिक उत्थान मण्डल की 1200 से अधिक शाखाएं लोगों में आध्यात्मिक चेतना के जागरण एवं ज्ञान तथा भक्ति के प्रचार के लिये समर्पित हैं। द्वारकाशारदापीठ के जगद्गुरु शङ्कराचार्य स्वामी श्री अभिनव सच्चिदानन्द तीर्थजी महाराज के ब्रह्मलीन होने पर उनके इच्छापत्र के अनुसार 27 मई 1982 को आप द्वारकापीठ की गद्दी पर अभिषिक्त हुए और इस प्रकार आप आदि शङ्कराचार्य द्वारा स्थापित चार पीठों में से दो पीठों पर विराजने वाले पहले शङ्कराचार्य के रूप में प्रसिद्ध हुए।
एतदितिरिक्त देशभर में आपके द्वारा अनेक संस्कृत विद्यालय, बाल विद्यालय, नेत्रालय, आयुर्वेद, औषधालय, अनुसंधानशाला, आश्रम, आदिवासीशाला, कॉलेज, संस्कृत एकेडमी, गौशाला और अन्न क्षेत्र जैसी प्रवृत्तियां संपादित हो रही हैं तथा आप स्वयं भी अनवरत भ्रमण करते हुए संस्थाओं का संचालन व धर्मप्रसार करते रहे।  भगवान् आदिशङ्कराचार्य द्वारा स्थापित पीठों में से दो पीठों (द्वारका एवं ज्योतिष्पीठ) को सुशोभित करने वाले जगद्गुरु शङ्कराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज करोड़ों सनातन  हिन्दु धर्मवलम्बियों के प्रेरणापुंज और उनकी आस्था के  ज्योति स्तम्भ रहे हैं, लेकिन इससे भी परे वे एक उदार मानवतावादी सन्त भी थे। परमवीतराग, नि:स्पृह और राष्ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत एक परमहंस साधु, जिनके मन में दलितों-शोषितों के प्रति असीम करूणा भी रही है।
         ॐ राम कृष्ण हरि:
स्वर समर्पण  बेटी उन्नति तिवारी
शब्द समर्पण श्री सच्चिदानंद शेकटकर
विनम्र श्रद्धांजलि संभागीय बाल भवन जबलपुर

गुरुवार, 16 जून 2022

दाम्पत्य जीवन में यौन संबंधों का महत्व

 


मनुष्य के जीवन में बुद्धि एक ऐसा तत्व है जो कि विश्लेषण करने में सक्षम है। बुद्धि अक्सर मानवता और व्यवस्था के विरुद्ध ही सर्वाधिक सक्रिय होती है।

       बुद्धि निष्काम और सकाम प्रेम के साथ-साथ मानवीय आवश्यक भावों पर साम्राज्य स्थापित करने की कोशिश करती है।    

भारतीय दर्शन को मुख्यतः दो भागों में महसूस किया जाता है...

1.  भारतीय जीवन दर्शन

2.  भारतीय अध्यात्मिक दर्शन

           जीवन दर्शन में आध्यात्मिकता का समावेशन तय किया जाना चाहिए . जो लोग ऐसा कर पाते हैं उनका जीवन अद्भुत एवं मणिकांचन योग का आभास देता है। इसी तरह अध्यात्मिक दर्शन में भी सर्वे जना सुखिनो भवंतु का जीवन दर्शन से उभरा तत्व महत्वपूर्ण एवं आवश्यक होता है।

      परंतु बुद्धि ऐसा करने से रोकती है। बहुत से ऐसे अवसर होते हैं जब मनुष्य प्रजाति आध्यात्मिकता और अपनी वर्तमान कुंठित जीवन परिस्थितियों को समझ ही नहीं पाती। परिणाम परिवारिक विखंडन श्रेष्ठता की दौड़ और कार्य करने का अहंकार मस्तिष्क को दूषित कर देता है।

    अर्थ धर्म काम जीवन के दर्शन को आध्यात्मिकता से जोड़कर अद्वितीय व्यक्तित्व बनाने में लोगों को मदद करते हैं। परंतु मूर्ख दंपत्ति अपने कर्म को अहंकार की विषय वस्तु बना देते हैं। वास्तविकता यह है कि व्यक्ति भावात्मक रूप से ऐसा नहीं करता बल्कि व्यक्ति अक्सर बुद्धि का प्रयोग करके वातावरण को दूषित कर देते हैं।

    हमारी शिक्षा प्रणाली में नैतिक चरित्र की प्रधानता समाप्त हो चुकी है। अगर मेरी उम्र एक दिन  से 75 वर्ष तक की है तो बेशक में इसी प्रणाली का हिस्सा हूं ।

    वर्तमान में दांपत्य केवल किसी नाटक से कम नहीं लगता। जिसे देखे वह यह कहता कहता है कि हम अपने बच्चों के विचारों को दबा नहीं सकते।ये बिंदु  परिवारिक विखंडन का मार्ग हैं।

   अधिकार अधिकारों की व्याख्या अधिकार जताना यह बुद्धि ही सिखाती है। जोकि मन ऐसा नहीं करता मन सदैव प्रेम और विश्वास के पतले पतले धागों से बना हुआ होता है। परंतु जब आप नित्य अनावश्यक आरोप मानसिक हिंसा के शिकार होते हैं और दैनिक दैहिक एवं सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए स्वयं को असफल पाते हैं तब मानस विद्रोही हो जाता है।

    ऐसी घटनाएं अक्सर घटा करती हैं। अब तो पति पत्नी का एक साथ रहना भी केवल दिखावे सोशल इवेंट बन चुका है। यह सब बुद्धि के अत्यधिक प्रयोग से होता है। एक विरक्ति भाव मनुष्य के मस्तिष्क में चलने लगता है। बुद्धि अक्सर तुलना करती है और बुद्धि साबित कर देती है कि आपने जो आज तक किया है वह त्याग की पराकाष्ठा है।

    यही भ्रम जीवन को दुर्भाग्य की ओर ले जाता है।हम अक्सर सुनते रहते हैं... "मैंने आपके लिए यह किया... मैंने आपके लिए वो किया..!" ऐसा कहने वाला कोई भी हो सकता है पत्नी पति भाई-बहन मित्र सहयोगी कोई भी यह वास्तव में वह नहीं कह रहा होता है बल्कि उसकी बुद्धि के विश्लेषण का परिणाम है।

  इस विश्लेषण के फलस्वरुप परिवार और संबंधों में धीरे-धीरे दूरियां पनपने लगती है। यही होता है जीवन का वह समय जिसे आप कह सकते हैं- "यही है अहंकार की अग्नि में जलता हुआ समय..!"

    भारत के मध्य एवं उच्च वर्गीय परिवारों में नारी स्वातंत्र्य एक महत्वपूर्ण घटक बन चुका है। मेरे एक मित्र कहते हैं वास्तव में अब विवाह संस्था 6 माह तक भी चल जाए तो बड़ी बात है। बेशक ऐसा दौर बहुत नजदीक नजर आता है। कारण जो भी हो.... नारी स्वातंत्र्य की उत्कंठा समाज को अब एकल परिवारों से भी वंचित करने में मैं पीछे नहीं रहेगी। नारी की मुक्ति गाथा और मुक्ति गीत अब सर्वोपरि है। नारी स्वातंत्र्य और नारी सशक्तिकरण में जमीन आसमान का फर्क है।

     मेरे मित्र ने बताया कि वह बेहद परेशान है। क्योंकि उसकी पत्नी जब मन चाहता है तभी यौन संबंध स्थापित करती है, अन्यथा कोई ना कोई बहाना बनाकर उसे उपेक्षित करती है।विवाह संस्था में यौन संबंध अत्यावश्यक घटक होते हैं. इसके अलावा सामान्यत: परिवार में ऐसा कुछ नहीं होता जो विखंडन के का कारण बने।दाम्पत्य जीवन में यौन संबंधों का महत्व भी अनदेखा नहीं किया जा सकता . भारतीय जीवन दर्शन के सन्दर्भ में देखा जावे तो यद्यपि आदर्श रूप से परस्पर यौन-सम्बन्ध अति महत्वपूर्ण नहीं पर व्यवहारिक रूप में इसे महत्व मिलता है. वर्तमान महानगरीय जीवन शैली को देखा जावे तो यौन-आकांक्षाएं अब टेबू न होकर बहुत विस्तारित हो चुकीं हैं . अब यौन सुख के लिए नित नए प्रयोग सामने आ रहे हैं. विवाह की आयु का निर्धारण तो कानूनी रूप से सुनिश्चित होना अपनी ज़गह है, पर यौन संबंधों की उम्र का निर्धारण असंभव सा है .         

   यहां पति एक दिन इस तरह की स्थिति की कैफियत मांगता है। परंतु वह महिला बुद्धि का प्रयोग करते हुए अपने आप को कभी अत्यधिक काम के दबाव या कभी अस्वस्थता का हवाला देकर सहयोग नहीं करती। मेरा मित्र इस तकलीफ को अलग तरीके से परिभाषित करता है मित्र के मन में विभिन्न प्रकार के विचार उत्पन्न होते हैं जैसे यह की पत्नी उसे अब तक पूर्ण तरह स्वीकार नहीं कर पाई होगी उसने कोई बहुत बड़ा अपराध किया है अन्य किसी प्रकार की युक्तियों का सहारा लेकर जीवन यापन कर रही है।

         बात 30 वर्ष के विवाहित जीवन के विघटन तक की स्थिति पर पहुंच गई।यह सब स्वाभाविक है ऐसे विचार आना अवश्यंभावी है। मित्र को समझाया गया परंतु यह बात तय हो गई कि मित्र मानसिक रूप से आप दांपत्य के प्रति उपेक्षा का व्यवहार रखने लगा। यह घटना लगभग 15 वर्ष पूर्व की है। विरक्त भाव से वह केवल एक यंत्र की तरह कार्य करता है। घर की जरूरतों को सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए केवल पुरुषार्थ के बल पर निभाता है परंतु प्रतिदिन वही जली कटी बातें ऐसा नहीं तो क्या है? ऐसा हिंसक दांपत्य कभी ना कभी विरक्ति और उपेक्षा में बदल जाता है।

   उपरोक्त संपूर्ण परिस्थिति का कारण केवल और केवल बुद्धि का नकारात्मक विश्लेषक के रूप में उभरना है। मन पर जितना नियंत्रण जरूरी है उससे ज्यादा जरूरी है बुद्धि पर सदैव सत्य के अंकुश को साध कर रखना। और यह कोई भी व्यक्ति कर सकता है। ऐसी स्थिति को देखकर मुझे तो लगता है कि वह महिला, महिला होने का प्रिविलेज चाहती है।

   हाल ही में एक प्रतिष्ठित गायक के साथ यही घटनाक्रम हुआ। एक क्रिकेट प्लेयर भी इस समस्या से जूझ रहा है।

   आलेख का आशय यह नहीं कि केवल महिला ही दोषी है बल्कि यह बताना है कि बुद्धि के अतिशय प्रयोग एवं स्वतंत्रता की अनंत अभिलाषा भारतीय पारिवारिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर रही है चाहे विक्टिम पति हो अथवा पत्नी । अधिकांश मामलों में दोष प्रमुखता से महिलाओं का ही सामने आया है जो दांपत्य जीवन के महत्वपूर्ण बिंदु यौन संबंध के प्रति विरक्त होती है अथवा परिस्थिति वश अन्यत्र संलग्न होती हैं। यहां यह भी आरोप नहीं है कि केवल यही कारण हो बल्कि यह भी खुले तौर पर स्वीकार लिया जाना चाहिए कि बेमेल विवाह बहुत दूर तक नहीं चलते हैं। अगर चलते भी हैं तो एक आर्टिफिशियल स्थिति के साथ।

   

सोमवार, 6 जून 2022

विधवा नारी के सांस्कृतिक सामाजिक अधिकारों के हनन पर मार्मिक कथा -"हरे मंडप की तपन"


 

    वैभव की देह देहरी पे लाकर रखी गई फिर उठाकर ले गए आमतौर पर ऐसा ही तो होता है. चौखट के भीतर सामाजिक नियंत्रण रेखा के बीच एक नारी रह जाती है . जो अबला बेचारी विधवा, जिसके अधिकार तय हो जाते. उसे कैसे अपने आचरण से कौटोम्बिक यश को बरकरार रखना हैं सब कुछ ठूंस ठूंस के सिखाया जाता है . चार लोगों का भय दिखाकर .
    चेतना दर्द और स्तब्धता के सैलाब से अपेक्षाकृत कम समय में उबर गई . भूलना बायोलाजिकल प्रक्रिया है . न भूलना एक बीमारी कही जा सकती है . चेतना पच्चीस बरस पहले की नारी अब एक परिपक्व प्रौढावस्था को जी रही है . खुद के जॉब के साथ साथ संयम को संयुक्ता को पढ़ाना लिखाना उसके लिए प्रारम्भ में ज़रा कठिन था . कहते हैं न संघर्ष से आत्मविश्वास की सृजन होता है . वही कुछ हुआ चेतना में . एक सुदृढ़ नारी बन पडी थी . चेतना ने आत्मबल बढाने के हर प्रयोग किये किस दबंगियत से लम्पट जीवों से मुकाबला करना है बेहतर तरीके से सीख चुकी थी .
बच्चों का इंतज़ार करते करते बालकनी में बैठी आकाश पर निहारती चेतना ने एक पल अपने फ्लेट को निहारा फिर सोचने लगी 15 साल तक ब्याज और किश्तें चुका कर अपना हुआ फ़्लैट एक संघर्ष की कहानी है वैभव के साथ खुद की कमाई के आशियाने की कसम खाई थी पर वैभव के जाने के बाद कसम को पूरा करना कितना मुश्किल सा था. किराए के मकान में रहना उसे अक्सर भारी पड़ता था . इस फ़्लैट का डाउनपेमेंट के इंतज़ाम की गरज से भावुकता और विश्वास के साथ भाई के घर गई थी भाई ने कहा – चेतना देखो दस-बीस हज़ार उधार दिला सकता हूँ पर एक लाख मेरे लिए मुश्किल है . बहन बुरा मत मानना मेरी भी ज़िम्मेदारियाँ हैं भाई की बात सुन कर चेतना को याद आ रहा था पिता जी के नि:धन पर वैभव के साथ वो पहुंची थी तीसरे ही दिन अस्थि संचय के बाद भैया ने बड़े शातिराना तरीके से मकान जमीन के लिए किसी पेपर पर दस्तखत कराए थे तब भैया ने कहा था – “बहन , तेरा भाई हर पल तेरे लिए बाबूजी की तरह मुस्तैद है .” सभी जानते हैं बाबूजी के श्राद्ध को फिजूल खर्ची बताकर लेशमात्र खर्च न किया. पारिवारिक अर्थशास्त्र तो दस्तखत वाले दिन ही समझ चुकी थी . परन्तु वादा-खिलाफी का परीक्षण भी हो गया . खैर युक्तियों से मुक्तिमार्ग खोजती चेतना ने वैभव के साथ ली कसम को पूरा किया.
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संयुक्ता के जॉब में आने के बाद संयुक्ता की पसंद के लडके से शादी की रस्म पूरी होनी है . दो दिन बाद बरात आएगी आज खल-माटी की रस्म है . भाभी ने कहा- बहन आप न जा पाओगी ...... मंगल कार्य में सधवा जातीं हैं . ..!
चेतना :- और, बाक़ी रस्मों को कौन कराएगा ?
भाभी :- मैं हूँ न , आप चिंता मत करो,
चेतना :- पर क्यूं..?
भाभी :- सामाजिक रीत के मुताबिक़ विधवाएं हरे मंडप में भी नहीं आतीं थीं वो तो अब बदलाव का दौर है .
चेतना की आत्मा चीखने को बेताब थी पर बेटी की माँ वो भी वैभव सदेह साथ नहीं . जाने क्या सोच चुप रही.
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चेतना :- भैया पंडित का इंतज़ाम हो गया है न
भाई :- हाँ, बिहारी लाल जी के पुत्र हैं ... बताया था न कि अभिमन्यु शुकुल की पत्नी नहीं रहीं ......
चेतना :- अच्छा, तो ये विधुर हैं ..
भाई :- हाँ, बहन, बहुत बुरा हुआ इनके साथ
चेतना ( भाभी की तरफ देखकर ) :- विधवा को हरे मंडप में जाने का अधिकार नहीं और पंडित विधुर चलेगा क्यों भाभी ....... ?
सम्पूर्ण वातावरण में एक सन्नाटा पसर गया . भाई-भावज अवाक चेतना को निहारते चुपचाप अपराधी से नज़र आ रहे थे. और अचानक एक ताज़ा हवा बालकनी में लगे हरे मंडप की तपन को दूर करती हुई कमरे में आती है
फिर क्या था ........ हर रस्म में चेतना थी हर चेतना में उत्सवी रस्में .. ये अलग बात है कि चेतना अपनी आँखें भीगते ही पौंछ लेती इसके पहले कि कोई देखे.
कोई कला हो सकती है
Yogeshwe Yogi

शनिवार, 23 अप्रैल 2022

गर्मी वाली यादों का गीत

        फोटो मुकुल यादव

भूले नहीं भूलता कोई

कच्ची कैरी वाला गांव

एसी कूलर पंखे से शीतल

मिट्टी के घर वाला गांव।।

 

टप टप गिरतीं पकी निंबोली

पके बेल की मदिर सुगंध .

दरभजिया में कच्ची कैरी-

खाते सब रोटी के संग ..

गर्म दुपहरी अमराई में....

किस्सागोई वाला गांव ।।

 

यहां पड़ोसी अनजाने से

वहां सभी थे पहचाने से।

हर घर से, हरेक का नाता  

यहां के नाते मुस्काने के ।।

याद बहुत आता है मुझको

सबको गुथने वाला गांव ।।

 

चिलम तंबाकू चौपतिये अरु

चोपड़ ताश की बाज़ी सजती  ।

खबरें सुनते ट्रांज़िस्टर  पर-

कहीं रामधुन, ढोलक बजती।।

रात नौ तक सब सो जाते-

जल्दी उठने वाला गांव ।।

 

*गीतकार:गिरीश बिल्लोरे मुकुल*

आने भी दो देख लेंगें, फसले-बहार को.

  * ग़ज़ल * * आने भी दो देख लेंगें, फसले-बहार को. * * क्योंकर कहो यूं, आप भी बेक़रार हो..! * * आया जो यहाँ हमसे वो लेके ही गया, * * रुसवाई ही ...