रविवार, 22 जुलाई 2018

बाल विकास भविष्य के आदर्श भारत की आधारशिला है : पूर्व महाप्रबंधक भारतीय रेल सेवा डॉ आलोक दवे



          "बच्चों में सदाचार वृत्तियों का बीजारोपण करने का दायित्व माता-पिता का ही है । बदलते परिवेश में अब अधिक सजगता एवम सतर्कता की ज़रूरत है ।आज संचार माध्यमों के ज़रिए जो कुछ भी हासिल हो रहा है उससे बच्चों पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव को लेकर हर अभिभावकों में चिंता व्याप्त है । अब ज़रूरत है 5 से 10 वर्ष की आयु तक के बच्चों से सतत संवाद करते रहने की क्योंकि हर बच्चा अनमोल है" - तदाशय के विचार पूर्व महाप्रबंधक भारतीय रेल सेवा डॉ आलोक दवे ने बालभवन में आयोजित *बदलते सामाजिक परिवेश में अभिभावकों के दायित्व* विषय पर आयोजित आमंत्रित  अभिभावकों के सम्मेलन में बोल रहे थे । श्री दवे सेवा निवृत्ति के उपरांत सत्य साईं सेवा समिति में बालविकास की गतिविधियों के लिए मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ के प्रभारी भी हैं ।


सम्मेलन का शुभारंभ करते हुये संस्कार शिक्षा प्रशिक्षक (मानसेवी) डॉ. अपर्णा तिवारी, ने बालभवन में 2010 से संचालित संस्कार कक्षाओं का संक्षिप्त विवरण देते हुए सम्पूर्ण बाल विकास में बच्चों के लिए संस्कार शिक्षा की उपयोगिता एवम औचित्य पर विस्तार से विचार रखे । श्रीमती पुनीता उपाध्याय ने विजुअल माध्यम से पॉवर-प्वाइंट प्रजेंटेशन के ज़रिये बच्चों के लिए के दायित्वों का तथ्यात्मक विश्लेषण करते हुए बच्चों के प्रति जागरूक किया ।

आयोजन के दौरान प्रशिक्षण खेलों का अभ्यास भी कराया गया । इस एक दिवसीय कार्यक्रम में प्रशिक्षण सहभागिता श्रीमती सीमा इसरानी , श्रीमती ज्योति नायडू, श्रीमती भारती , श्रीमती कुंदा, विरुढ़कर सुश्री प्रियंका मौज़ूद थीं ।
अतिथियों का सम्मान डॉ शिप्रा सुल्लेरे, श्री देवेंद्र यादव, श्री सोमनाथ सोनी द्वारा तिलक लगाकर एवम श्रीफल भेंट कर किया गया । आयोजन के लिए सहायक संचालक बालभवन गिरीश बिल्लोरे द्वारा आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम के आयोजन में श्री टी आर डेहरिया एवम श्री धर्मेंद्र, श्रीमती सीता ठाकुर  का विशेष योगदान उल्लेखनीय रहा ।



शनिवार, 21 जुलाई 2018

विष का प्यासा होता गिरीश


जब जब कुमुदनी  मुस्कुराए तो याद तुम्हें  कर  लेता हूँ
आँखों से बहते धारे से- मन का मैं सिंचन  कर  लेता  हूँ ..

इस भीड़ भाड़ में क्या रक्खा, सब कुछ एकाकी की रातों में -
तब बिना भेद के इस उसके, नातों पे चिंतन कर  लेता  हूँ !!

कहतें हैं सागर मंथन से नवरत्न मिला करता ही करतें हैं...?
विष का प्यासा होता गिरीश , मन का मंथन कर लेता हूँ..!!




सोमवार, 16 जुलाई 2018

पशेमाँ हूँ तुझसे तुझको बचाना चाहता हूँ मैं ।


पशेमाँ हूँ तुझी से, तुझको बचाना चाहता हूँ   ।
बिखर के टूट के तुझको सजाना चाहता हूँ  ।।
ज़िंदगी मुझसे छीनने को बज़िद हैं बहुत से लोग
ऐसी नज़रों से तुझको, छिपाना चाहता हूँ  ।।
बला की खूबसूरत हो, नज़र में सबकी हो जानम
चीखकर लोगों की नजरें हटाना चाहता हूँ  ।।
गिन के मुझको भी मिलीं हैं, औरों की तरह -
वादे साँसों से किये सब निभाना चाहता हूँ ।।
ख़ुशी बेची खरीदी जाए मोहब्बत की तिजारत हो
अमन की बस्तियाँ ज़मी पर  बसाना चाहता हूँ  ।।
कोई मासूम हँस के भर दे  झोली मेरी ख़ज़ानो से
बस ऐसे ही ख़ज़ानों  को  पाना चाहता हूँ ।।
*ज़िन्दगी* मुश्किलों से बना ताबूत है माना  -
मौत के द्वारे तलक मुस्कुराना चाहता हूँ  ।।


मंगलवार, 13 फ़रवरी 2018

प्रेम के तिनकों पर लपकतीं संस्कृति की लपटें


प्रेम संसार की नींव है जिसे किसी को नकारने में शर्म नहीं आती क्योंकि उसके पीछे फ्रायड है । फ्रायड एक भयानक सोच को चाहे अनचाहे रोप गया । जबकि प्रेम ऐसा नहीं जैसा फ्रायड ने सोचा है । प्रेम के अंकुरण से विश्व में सृष्टि के सृजन की अनुभूति होती है । प्रेम पाखण्ड नहीं हैं प्रेम दुर्वाशा भी नहीं प्रेम जीवन के उदयाचल से अस्ताचल तक का स्नेह कवच है ।
प्रेम किसी को भी कभी भी कहीं भी हो सकता है फ्रायड सुनो ये विपरीत लिंगी के बीच हो ऐसा नहीं ये समलिंगिंयों यहां तक कि जड़ से भी होता है ।
बूढ़े लोग अपना शहर छोड़ने में कतरातें हैं तो आपका पालतू भी आपके बिना बेचैन रहता है ।
बहुत बरसों से  मुझे हरि न मिला ।  हरि रेलवे में गैंगमेन था शाम को आता था बालपन में हरि मुझे बहुत प्यार करता था कुछ दिनों तक न दिखा माँ बतातीं थी मुझे तेज़ बुखार आ  गया था तेज़ तीन चार दिन तक । बिना रोगाणु बुखार का अर्थ क्या था । हरि के गांव से लौटते बुखार गायब ?
प्रेम की वज़ह प्रेम है तो समाधान भी प्रेम ही है । कहाँ राम कहाँ हनुमान कोई योग नहीं एक वनचर दूजा कुलीन क्षत्री राजकुल का बेटा ? प्रेम के सूत्र में बंधे दौनों इतिहास में दर्ज हैं ।
            एक बार तीन माह ट्रेनिंग में रहने के कारण भतीजे को न मिल सका घर लौटा तो घर के दरवाजे पर भतीजा मेरी गोद में आया कुछ देर थ अपलक मुझे देख अचानक ताबड़तोड़ मुझ पर झापड़ बरसाने लगा मानो पूछ रहा हो तो कहाँ था  ।
         फिर इतना ज़ोर से सीने से चिपक गया मानों उसने दुनियाँ का सब कुछ हासिल कर लिया हो । 9 से 10 माह की उम्र में चिन्मय का प्रेम और कैसे व्यक्त हो सकता था ? आप ही सोचिये ... अगर प्रेम संसारी बुनियाद नहीं तो क्या है ।
प्रेम उन्मादी होता है तो संवादी भी क्योंकि वो उन कणों का संग्रह है जो एकीकृत होकर ऊपर से नीचे की ओर बहता है सरिता सरीखा मिलता है तो पर्वत को भी चीर देता है जैसे धुआंधार तब वो उन्मादी है पर अवसर पर रोक न हो तो कछार में सबको सुख देता है ।
प्रेम का आधार वाक्य *सर्वे जना सुखिनः भवन्तु* है । वरना सूफी इसे स्वीकार कैसे करते । प्रेम दैहिक ही है तो साधु इसका जगह जगह ज़िक्र न करते । प्रेम मेरे और ईश्वर के बीच का मार्ग है उसमें अवरोध पैदा मत करना संस्कृति के नाम पर मूर्ख हो जब तुम सारी कायनात को एक ब्रह्म की उत्पत्ति मानते हो तो संत वैलेंटाइन बुरा क्यों ?
मैं प्रेमी हूँ मैं प्रेमिका हूँ इतना सोच के ईश्वर के करीब हो जाता हूँ । तुम संस्कृति के नाम पर राक्षसों सा बर्ताव न करो मुझे प्रेम करने दो खुले आम करने दो पूजा है भाई ये प्रेम और पूजा छिप के कौन करता है भला ?
*गिरीश बिल्लोरे मुकुल*

रविवार, 17 दिसंबर 2017

भीगा भीगा परबत

एक पल में जान निकालने वाली विरह की तपन के नज़दीक बैठे बैठे में अचानक हताशा और कसक के बीच हिचकोले लेती नाव सी सिर्फ और सिर्फ बहाव के साथ बहते हुए तुम्हारे पास आने को कसमसाती सी बेसुध हो जातीं हूँ । आज जब उसने बरसों पुरानी बात याद दिलाई तो एक एक कर मैं तब की सारी घटनाओं को सिंक्रोनाइज कर रही हूँ । आज मैंने पूछ ही लिया कि- हाँ मुझे तुमसे शिकायत है .  तब क्यों न बोले तुम जो सरिता के उसपार बैठे बैठे 30 साल बाद अपनी भूल को कबूल कर रहे हो ? 
  वो -  कैसे करता श्यामली कायर नहीं था  पर परिवार कॅरिअर सब देखना था ।  सोचा था  कुछ दिन बाद  बहनों के विदा होते ही मैं अभिव्यक्त कर दूंगा ।
  मैं - भला कोई इतना संयत कैसे हो सकता है कि अपनी बात न रखे । 
  वो- अच्छा बताओ श्यामली मेरी ज़गह तुम होतीं तब क्या करतीं ?  
  मैं- वही जो तुमने किया पर में स्त्री थी न डरती थी कि पता नहीं क्या होगा सामाजिक प्रतिबंधों का सबसे बड़ा असर लड़कियों पर ही होता था न तब !
 तुम पुरूष हो  मुझे कहते तो !
वो - हाँ कह देता , तीस साल पहले कह देना था मुझे कि मैं ....... पर तुम क्या रियेक्ट करतीं ये सोच के न किया फिर घर कॅरिअर समाज सब देखा सोचा जॉब के बाद कह दूंगा , सोचता रहा सोचते सोचते एक दिन जब तुम्हारे घर से वापस लौट आया तो वज़ह में खड़ा न था वजह थी परिस्थितियां । अच्छा चलो अगर कह देता कि श्यामली - विल यू मैरी मी ! 
    मुझे  इस सवाल से आने का एहसास पहले से ही बेचैन थी अपलक आकाश को देखती  दीर्घ अंतराल के बाद मैनें कहा -  कुछ तो कहते रुक तो जाती परिस्थितियों की अनुकूलता तक के लिए !
    वो :- श्यामली विरह की तपन से कुंदन हो गया हूँ । प्रेम मरता नहीं सदानंद है तुमसे मुझे दैहिक लगाव न था सच्चा प्यार था जो आज भी है । कसक थी तड़प थी शब्द भी थे बस परिस्थितियाँ साथ न थीं न मेरे न तुम्हारे ।
    सोचतीं हूँ तुरन्त जाकर अंकपाश में समा जाऊं समर्पित कर दूं प्रिय को पर अब मैं निमिष की तरह परिस्थितियों से बंधी हूँ न बिखरूँगी न निमिष मुझे बिखरने देगा ।
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        30 बरस 30 दिन के बाद निमिष से मिलूँगी । जाने क्या रिएक्शन होगा । शायद मुझे बांहों में भर लेगा । न वो ऐसा न करेगा वो अनुशाषित है 
सैकड़ों विचारों के आने जाने का सिलसिला कब तक जारी रहा मुझे याद कहाँ बस इतना याद है कि गरम चाय लेलो की आवाज़ ने जगा दिया बस सेवा घण्टे बाद ट्रेन निमिष तक पहुंचने वाली है । कटनी पार करते ही धड़कनैं   प्रीत के प्रथम मदालस एहसासों के कारण तेज़ होतीं चलीं गईं । और मैं बेचैन । 
    निमिष प्लेटफार्म पर न थे , बाहर कार में इंतज़ार करते उनको देख दहक उठी हूँ मैं ।
    निमिष ने मुझको  देख कैसे खुद को संयम के बंधन बांधा होगा मुझे यकीन नहीं हो पा रहा है । 
   अचानक निमिष की आंखों पर मेरी नज़र पड़ी एक भीगा पर्वत देख रोमांचित हूँ ।  

शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017

हाँ मैं कह न सका कि

उस दिन तय कर लिया था कि आज बताना है कि मैं प्यार में भीगा हूँ ।
सोचने लगा कि कह दूं घर जाकर कि -
सुनो तुमसे प्यार है , तुम इंकार न करना । तुम्हारी चपल चँचल निग़ाहों में प्रेम के पक्के वाले रंग मुझे दिखाई दे रहें हैं ।
घर से कुछ दूर खड़ा होकर घर की तरफ देखा मुड़कर छोटी बहन ने बुलाया - भैया क्या कहीं जा रहे हो ? ये बुक ले आना
ठीक है सपाट ज़वाब देकर निकला और रिक्शेवाले से कहा - यादव कॉलोनी ?
25 रुपया ....!
15 ?
नहीं 20 ?
अरे यार दादा तुम तो बाहरी सवारी समझ लिए ?
तभी दूर से समाली आता दिखा मुझे रिक्शेवाले से बात करते वो तेजी से आ गया और बोला - काय , काहे झंझट कर रहा है कहाँ जाना है साब ?
मैं :- ........ कॉलोनी
समाली :- 10 रुपे ठीक हैं जाएगा ?
रिक्शे वाला आगे बढ़ गया , समाली ने अपना रिक्शा आगे किया मुझे बैठाया और चल दिया ।
25 मिनट बाद हम ...... कॉलोनी चौक पर थे । रास्ते में एक सुंदर सा बुके लिया 15 रुपए का कवि होकर भी इज़हारे इश्क़ के इज़हार की रिवायतों से नावाकिफ .... मुझ नामाकूल को न तो पैग़ाम ए इश्क़ की रिवायत पता थी न रस्म ए मोहब्बत वो भी एक हसीन से जो श्यामली सुंदर नैन नक़्श वाली तुम थी के लिये जाने कितनी प्रेम कविताएं लिखीं थीं याद नहीं सच पता ही न था कि एक गुलाब से इज़हारे इश्क़ हो जाएगा
उस दिन तुम्हारे घर के सामने आकर मैने समाली से कहा - भाई ये वो घर नहीं जहां हमको आना था चलो दीदी के लिए बुक खरीद के वापस चलतें है लगता है मुझे पता गलत याद है ।
             ये वो दौर था इज़हार ए मोहब्बत के साधन और तरीके न के बराबर थे और तो और सुना था कि प्यार का परवाना ले जाने वाले मछरहाई के सारे कबूतर भी अपना हुनर भूल चुके थे । अगर किसी को याद भी हो तो उस कबूतर के मालिक के बारे में किससे पूंछू ?
            कभी सोचा था कि कॉफी हाउस में तुमको बुलाऊँ कह दूं कि तुम मेरे लिए हो पर पुराने वाले मुहल्ले वाले कॉफी हाउस में तुमसे बात करने के तुरंत बाद कोई भी मेरे किसी लड़की के साथ होने की बात के हर्फ़ हर्फ़ वायरल कर देता । सो मन ही मन कार्यक्रम कैंसिल करते हुए वापस सामान्य स्थिती बहाल कर ली ।
             याद हैं न आखिरी पेपर देकर जब हम लौटे थे तब तुमको बड़े बार बार देख रहा था ।
पता नहीं तुमने नोटिस किया था कि नहीं कि कौन तुम्हारी निग़ाहों का बिस्मिल है । सच कहूँ हुस्न की लापरवाही तो सबको पता है इश्क़ की कम अक़्ली के बारे में कम ही लोग जानतें हैं ।उन कम अक्ल वालों में एक हम भी तो थे ।
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           असल हुआ ये था कि मुझे ऐन तुम्हारे घर के सामने छोटी बहन की किताब की याद आ गई और दीदी का वो चेहरा भी जिसकी अगले बरस शादी होगी । कांप गया कि तुमको प्रपोज़ करूं और तुम शायद मान भी जाओ पर  ये बात सबको पता लगते ही हंगामा खड़ा होना और  बहन की शाादी में बाधक बनूं तो बाबूजी को मां को कितना दर्द होगा ? उस पर मेरी  वजह से छोटी बहन की सगाई टूटती है तो मैं खुद को माफ़ कैसे करूंगा ?
सच कहूँ बस इसी वजह से में वापस लौट आया । फिर जब मुझे पता लगा कि तुम्हारी शादी होने वाली है तुमको भूलने के लिए हर पल कोशिश की । भूला भी ताकि मेरे प्यार के पवित्र होने पर कोई अंगुली न उठाए ।
फिर दीदी की शादी का कार्ड लेकर जब तुम्हारे घर आया तो पता चला कि तुम्हारी भी सगाई होने वाली है । और फिर तुमको रूमानी एहसासों से हटाने की कवायद में मसरूफ़ हो गया ।
सब कुछ भूल के मैं श्रद्धानत बेहतर कल के लिए जुट गया । सफ़ल भी हुआ .. आज तुमको सोशल मीडिया पर न पहचानना एक संयोग है । सच कहूँ तुम्हारे प्रेम से पगा मैं अब दृढ़ हूँ पर तुम्हारा हूँ ।
ऐसे प्रेम को क्या नाम दूं प्रिये तुम ही कहो
शायद तुम और मैं इस प्रीत को कोई नाम न दे सकेंगे पर यही पावन प्रीत है ।



शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017

परदेसी पाखियों का आना जाना

अब अक्सर देर रात मिलूंगा उससे

मेया मेरे भतीजे Ankur Billore की बेटी एक हफ्ते तक हमारी आदत में शुमार थी । कुछ दिनों में अपने दादू का देश छोड़  वापस ट्रम्प दादू के देश फुर्र हो जाएगी । कब आएगी कौन जाने । थैंक्स मीडिया के नए वर्जन को जिसके के ज़रिए मिलती रहेगी । हज़ारों लाखों परिवार बच्चों को सीने पे पत्थर रख भेजते हैं । विकास के इस दौर में गोद में बिठाकर घण्टों बच्चों से गुटरगूँ करते रहने का स्वप्न केवल स्वप्न ही रह जाता है । देश के कोने कोने के चाचे मामे ताऊ माँ बाबा दादा दादी इस परदेशियों के लिए तड़पते हैं मुझे इस बात का मुझे और हम सबको अंदाज़ है ।
 पहली बार रू ब रू मिला वो मुझे पहचान गई  2 बरस का इन्वेस्टमेंट था नींद तब आती थी जब अमेया से नेट के  ज़रिए मस्ती न कर लूं । दिन भर Balbhavan के बच्चों में अमेया मिला करती है ।
प्रवास से देश का विकास ज़रूरी भी है । इस देश में यूं तो कुछ हासिल नहीं होता योग्यताएं सुबकतीं है तो तय ही है बच्चों का प्रवासी पंछी बन जाना ।
साउथ एशिया में भारत के योग्य बच्चे भले ही विदेशों में राजनीतिक रूप से महिमा मंडित किये जाते हैं किंतु किसी बड़बोले सियासी की जुबान पर ये नहीं आया कि बच्चों बाहर मत जाओ हम तुमको तुम्हारी योग्यता का यथोचित सम्मान देने का वादा करते हैं ।
हम ज़रूर ये कहतें हैं मेरा एक बेटा यहां है दूसरा वहां हैं पर हम इस नाबालिग व्यवस्था में रोज़ रात उनकी याद में आंसू से तकिया ज़रूर भिगोते हैं ।
इस दिवाली बेटी के पास चेन्नई में था बेटी की सारी मित्र सामान्य वर्ग से हैं एक मल्टीनेशनल कम्पनी में सब तेज़ दिमाग़ कर्मठ सबसे कहा तुमने अपना ब्रेन आखिर किसी की सेवा में लगाया है वो तुम्हारी वज़ह से जो कमा रहा है उसका 5% भी तुमको नहीं देता क्यों नहीं सरकारी क्षेत्र में
सब की भौंहें तन सी गईं - बेटी ने बड़े सादगीपूर्ण पूर्ण तरीके से कहा - पापा व्यवस्था में प्रतिभा का दमन तो मैंने देखा है इन सबने भी सब सरकारी कामकाज को अच्छे से समझते हैं ।
    आपको समझने की ज़रूरत है ब्रेन क्यों बह के सुदूर सात समंदर पार जा रहा है ?
    यह भी कि कहीं न कहीं प्रतिमा का दमन तो हो रहा है कभी आरक्षण के नाम पर तो कभी भाई भतीजा वाद से , भ्रष्टाचार से सब कुछ स्पष्ट है ।
    मेरे बड़े भाई साहब कहते हैं - घर तो एयर पोर्ट के नज़दीक होना चाहिए ।
मित्रो अमेया अब कब इंडिया आएगी ये मेरा सरदर्द है अब व्यवस्था के सर में दर्द उठना चाहिये कि उसके 87 साल के पितामह से अमेया दूर क्यों है ?
देखें ये टीवी चैनलों पर ध्वनि विचार  प्रदूषण फैलाने वाले इस दिशा में कितना सोचते हैं

बुधवार, 15 नवंबर 2017

गिरीश के दोहे


काजल बिंदी सूरमा, नैन सजें अरु भाल
सुन प्रिय की पदचाप को, हो गए गाल गुलाल ।।

झूठै कागा बोलते, प्रियतम पथ पै आय ।
झूठी आसा में सखि, दोगुन पाक पकाय ।।

पिया बियाही आत्मा, विरह अगन चहुँ ओर
भोर नींद गहरी लगी, कागा करते शोर ।।

कौई देह की राग संग , कैसे ताल मिलाय ।
जो कस पाए ढोलकी, वोही ताल मिलाय ।।

सुनो मुकुल खुल्ला कहे, बैर प्रीत मदपान
सीमा बंधन होय तो , सब कछु अमिय समान ।।

*गिरीश बिल्लोरे मुकुल*

मंगलवार, 5 सितंबर 2017

हिजाब मेरा अगरचे खिसका , तो तंज़ कसके मुझे रुलाया !!


कंगना रनौत के साथ ऋतिक रौशन की नाइंसाफी से मुतासिर ये ग़ज़ल शायद किसी के लिए एक सीख बने  ........ औरत के खिलाफ सोच को बदलने के लिए और कंगना की बहादुरी के लिए ... सैल्यूट के साथ ... 
यूँ हज़ारों औरतें इसी तरह की नाइंसाफी की शिकार हैं ......... वज़ह है उनकी  चुप्पी .. चुप्पी तोड़नी होगी कंगना की तरह  

जो  तोड़ी  चुप्पी तो सलवटों ने,
किसी  के  माथे पे घर बनाया
किसी ने अपना छिपाया चेहरा ,
किसी का रुतबा है तमतमाया, !
रिवायतें जो  बदलते देखीं
सनम को अपने  वो लेके आया ..
जहां कहीं भी उठी जो अंगुली,
तुम्हीं ने है आ मुझे जलाया  !!
न तोडूं चुप्पी तो सलवटें भी ,
किसी के माथे पे न बसेंगी –
है इश्क में गर ये सारे बंधन , 
तो ऐसा सौदा मुझे न भाया !!
ग़ज़ल कहा था तुम्हीं मुझको,
मुझे ही सबसे कहा हंसीं था-
हिजाब मेरा अगरचे खिसका ,
तो तंज़ कसके मुझे रुलाया !!

    


बुधवार, 5 जुलाई 2017

देर रात तलक न दिमाग सोता है न कलम

रख देता हूँ रहन
अपने चंचल सपन
तुम्हारे चंचल मन के पास 
और फिर सोने की कवायद में 
करवटें बदलता हूँ 
देर रात तलक
न दिमाग सोता है
न कलम
दिलो दिमाग पर
विषय ऊगते हैं ...
कुछ पूछते हैं
कुछेक जूझते हैं मुझसे
लिखता हूँ
मुक्कमल हो जाता हूँ..
फिर झपकतीं हैं पलकें
तुम वापस भेज देतीं हो
नींद जो रख देता हूँ रोज़  रहन
तुम्हारे पास
फिर होती है
भोर तो मेरी रोजिन्ना
देर से होती है !
तब जब  पेप्पोर रद्दी वाला चीखता है
हाँ तभी 
जब भोर हो जाती है 

रविवार, 9 अप्रैल 2017

love for old aged Mother in law in Sort Film : Zayaka

Think about old aged mother father .... Emotional short film on old aged life. one old aged mother wants to eat some jaykedar food but she can't get it due to her old age  helth situation but   her daughter in law positively committed for her Emotions as wel as  feelings    changed  her husband's opinion about old aged mother 
please must watch this short film on Indie Routes Films
https://youtu.be/E4QkhaqbpY4

Short film by Harshita Shreyas Joshi
Artist : 
Son :- Ravindra Joshi
Sons wife :- Abha Joshi
Mother :- #Smt_Pusha_Joshi
Directed by :- Harshita Shreyah Joshi
Script :- #Ravindra_Joshi
Editor & Music : #Shreyas_Joshi

Please bless Harshita 

शुक्रवार, 31 मार्च 2017

"दुर्बल व्यक्ति प्रेम नहीं कर सकता प्रेमी दुर्बल नहीं हों सकता "


शुक्र और चांद अचानक नहीं इनका मिलाना तयशुदा था। उस दिन जब चंद्रमा और शुक्र का मिलन तय था और मेरे शहर का आकाश अगरचे बादलों भरा न होया तो इस पल को सब निहारते। कईयों ने तो इसे निहारा भी होगा .....उनके आकाश में बादल जो नहीं हैं ।
प्रेम की परिभाषा भी यहीं कहीं मिलती है ....!
"प्रेम"एक ऐसा भाव है जिसको स्वर,रंग ,शब्द , संकेत, यहाँ तक कि पत्थरों ने भी अभिव्यक्त करने में कोई कसर नहीं छोड़ी ...... खजुराहो से ताजमहल तक उर्वशी से मोनालिसा तक ,जाने कितनी बातें हैं जो प्रेम के इर्दगिर्द घूमतीं हैं ....!
"सच प्रेम ही संसार कि नींव है "......आसक्ति प्रेम है ही नहीं ! प्रेम तो अहो ! अमृत है ! प्रेम न तो पीड़ा देता है न ही वो रुलाता। आशा और विश्वास का अमिय है ..प्रेम सोंदर्य का मोहताज कभी नहीं हो सकता ...परंतु जब यह अभिव्यक्त होता है तो जन्म लेतें कुमारसंभव जैसे महाकाव्य !! किसी ने क्या ख़ूब कहा -"जिस्म कि बात नहीं ये "
सच !यदि दिल तक जाने कि बात हो तो ....आहिस्ता आहिस्ता जो भाव जन्मता है वोही है प्रेम।
अगर आप सच्चा प्रेम देखना चाहतें हैं ..... एक ऐसी मजदूर माँ को देखिए जो मौका मिलते ही अपने शिशु को अमिय पान करा रही है...क्या आप देख नहीं पा रहे हैं अरे ! इसके लिए आपमें वो भाव होना ज़रूरी जो स्तनपान करते शिशु में है।
अगर इसे आप प्रेम का उदाहरण नहीं माने तो फिर आप को एक बार फिर जन्म लेना ही होगा !
शिवाजी ने सिपाही द्वारा लायी गयी विजित राज्य की महिला को "माँ" कहा तो भारत को एक नयी परिभाषा मिल ही गयी प्रेम की।
मैंने प्रेम को लेकर कहां:-
"इश्क कीजे सरेआम खुलकर कीजे .... भला पूजा भी कोई छिप-छिप के किया करता है "
इसके कितने अर्थ निकालिए निकलते रहेंगे लगातार गुरु देव शुद्धानन्द नाथ ने आपने सूत्र में कहा :-"दुर्बल व्यक्ति प्रेम नहीं कर सकता प्रेमी दुर्बल नहीं हों सकता "

यदि मैं कहूं कि " मुझे कई स्त्रियों से प्रेम है , मुझे कई पुरुषों से प्रेम है तो इसे फ्रायड के नज़रिये से मत देखो भाई। प्रेम के अध्यात्मिक अर्थ की खोज करते-कराते जाने कितने योगी भारत ही नहीं विश्व के कोने कोने में भटकते रहे.......!ग्रंथ लिखे गए "हेरी मैं तो प्रेम दीवानी" गाया गया .... ये इश्क-इश्क है दुहराया गया.... आज रंग है तो मस्त कर देता है फिर भी हम केवल फ्रायड की नज़र से इश्क को जांचते हैं....? ऐसा क्यों है
क्या हम देह से हट के कभी मानस पर मीरा खुसरो को बैठा कर अपने माशूक या माशूका को निहारिए
यही है तत्व ज्ञान है...!

“प्रेम ही संसार की नींव है...!”


संत वैलेंटाइन के लिए प्रेम का सन्देश देने वाले दिन में बुराई क्या..? इस सवाल पर घच्च से अपने राम पर पक्ष द्रोही होने का आरोप तय कर दिया जावेगा कोई डंडा लेकर मारने भी आ जावे इसका मुझे पूरा पूरा अंदाज़ है. देर रात तलक नेट पर  निर्वसना रतियों को निहारते लोग या फिर रूमानी चैट सेवाओं का लाभ उठाते लोग ही  सर्वाधिक शक्ति के साथ इस दिवस पर सक्रीय नज़र आते हैं . जबकि परिवारों में बालिकाओं और  महिलाओं के साथ दुराचारों पर इनकी निगाह कभी कभार ही  ही पड़ती होगी.

घरेलू शोषण पर आक्रामक क्यों नहीं होते ये लोग. वास्तव में यह सब एक पूर्वाग्रही मिशन के हिस्से होते हैं. जो बिना समझ के विरोध का परचम लेकर आगे बढ़ते हैं. वास्तव में होना ये चाहिए कि घरेलू सद संस्कारों को सुधारने के संकल्प लेकर विदेशी संस्कृति के पार्कों कहवाघरों में होने वाले विकृत अनुप्रयोग को रोकने की कोशिश सतत जारी रखनी चाहिए.
आपने शायद ही इन संस्कृति के स्वयंभू रक्षक-सेनानियों को पोर्न साइट्स पर प्रतिबन्ध, अत्यधिक उत्तेजक चित्र छापने वाले अखबारों के संपादकों से ऐसा न करने का अनुरोध करते देखा हो ... मेरी नज़र से कभी भी  ऐसा कोई संस्कृति रक्षक नहीं गुज़रा जो ऐसा करता हो.
मुद्दा देश में संस्कृति की रक्षा का कम आत्म-प्रदर्शन का अधिक नज़र आता है. इस युग की  ये सबसे बड़ी समस्या है कि लोग समाज और सांस्कृतिक विरासतों और मूल्यों को लेकर  चिंता-ग्रस्त हैं और इसी चिंता में हिंसक हो जाते हैं. फिर संवैधानिक व्यवस्था को नकारते हुए किसी प्रेमी-युगल को बेईज्ज़त कर अपना तालिबानी अंदाज़ सामने लाते हैं.
भारत के योग, दर्शन को पाश्चात्य देशों में बड़े आदर से स्वीकारा जाता है. तो अगर प्रेम के सन्देश देने वाले संत को हम भी सकारात्मक रूप से आदर दें तो बुराई क्या है....? हमारे ऋषियों मुनियों ने कभी भी वैदेशिक संस्कारों को रोकने का प्रयास नहीं किया बल्कि अपने संस्कारों को मज़बूत बनाने के लिए प्रभावी कदम उठाए. सनातन व्यवस्था को कभी भी किसी के खतरे का भय नहीं रहा . बल्कि इस देश से लोगों ने सीखा ही है. अब अगर संत वैलेंटाईन  के स्मृति दिवस को प्रेम का इज़हार कर  मना रहें हैं तो सनातनी व्यवस्था पर किस प्रकार खतरा होगा...? कर्मयोगी कृष्ण ने भी तो प्रेम का सन्देश दिया था.  फिर हो सकता है कि संत वैलेंटाइन कृष्ण से प्रभावित हो प्रेम के  सन्देश को विस्तार देना चाहा हो. तब क्या आप विरोध करेंगें  मेरी समझ से परे है...!
समझ से परे तो यह भी है कि जो लोग प्रेम को यौन संबंधों का पर्याय मानते हैं उनके मानस में शुकदेव मुनि का स्मरण क्यों नहीं रहता.
एक बार खुद से पूछा - एक पुरुष हूँ महिलाओं से मिलकर सामान्य क्यों रहता हूँ ? उसे भोग्या , कमजोर , और विलास की वास्तु क्यों नहीं मानता ?
फिर चिंतन करता हूँ तो उत्तर भी  पाता हूँ कि  मुझमें मौजूद  महिलाओं और पुरुषों के प्रति एक सम व्यवहार के  पुख्ता आचरण की वज़ह से  मुझे कभी भी किसी महिला के लिए  भोग्या और कमजोर समझाने के  भाव नहीं आते और न फिर असहज होता हूँ ?
इस बार मैंने अपनी समाज से आह्वान किया कि समाज की मुखिया का पद महिला के हाथ सौंपें ? मुझे मालूम था कि न तो महिलाएं ही मेरी राय से सहमत होंगीं और पुरुष वर्ग के उपहास का पात्र बनाना तय है हुआ भी ठीक वैसा ही. मेरी सफलता इतनी मात्र थी कि समाज के सामने एक अनोखा विषय विचार मंथन के लिए आया उद्देश्य इतना ही था.. क्योंकि रूढ़ियाँ अचानक नहीं टूटतीं इसे तोड़ने के संकल्प कुछ लोग ही ले पाते हैं शेष कुंठा और  भय की पल्ली ओढ़ अनजान बन जाना चाहते हैं . उनमें  कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो आक्रामक हो जाते हैं.
वास्तव में यह प्रेम नहीं है न तो ये कृष्ण से ही हम सीख पाए और न ही संत वैलेंटाइन से . हमने प्रेम को शारीरिक बना लिया है जबकी सदगुरु शुद्धानंद नाथ के सूत्रानुसार –“प्रेम ही संसारकी नींव है”...
जब हम नारियों के अधीन नहीं रहना चाहते तो यही तय हुआ न कि हम केवल उसे दुर्बल देखना चाहते हैं. सामान्यतया  कोई भी दुर्बलता से प्रेम नहीं करता सिर्फ प्रेम जताता है.  प्रेम करना और प्रेम जताना दो प्रथक भाव हैं. प्रेम प्रेमी करता है जबकि शासक प्रेम जताता है... और जिसमें शासक का भाव है वो किसी से भी प्रेम कर ही नहीं सकता ! न नारी से न बच्चों से न ईश्वर से ही .
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गिरीश बिल्लोरे “मुकुल”