बुधवार, 5 जुलाई 2017

देर रात तलक न दिमाग सोता है न कलम

रख देता हूँ रहन
अपने चंचल सपन
तुम्हारे चंचल मन के पास 
और फिर सोने की कवायद में 
करवटें बदलता हूँ 
देर रात तलक
न दिमाग सोता है
न कलम
दिलो दिमाग पर
विषय ऊगते हैं ...
कुछ पूछते हैं
कुछेक जूझते हैं मुझसे
लिखता हूँ
मुक्कमल हो जाता हूँ..
फिर झपकतीं हैं पलकें
तुम वापस भेज देतीं हो
नींद जो रख देता हूँ रोज़  रहन
तुम्हारे पास
फिर होती है
भोर तो मेरी रोजिन्ना
देर से होती है !
तब जब  पेप्पोर रद्दी वाला चीखता है
हाँ तभी 
जब भोर हो जाती है 

रविवार, 9 अप्रैल 2017

love for old aged Mother in law in Sort Film : Zayaka

Think about old aged mother father .... Emotional short film on old aged life. one old aged mother wants to eat some jaykedar food but she can't get it due to her old age  helth situation but   her daughter in law positively committed for her Emotions as wel as  feelings    changed  her husband's opinion about old aged mother 
please must watch this short film on Indie Routes Films
https://youtu.be/E4QkhaqbpY4

Short film by Harshita Shreyas Joshi
Artist : 
Son :- Ravindra Joshi
Sons wife :- Abha Joshi
Mother :- #Smt_Pusha_Joshi
Directed by :- Harshita Shreyah Joshi
Script :- #Ravindra_Joshi
Editor & Music : #Shreyas_Joshi

Please bless Harshita 

शुक्रवार, 31 मार्च 2017

"दुर्बल व्यक्ति प्रेम नहीं कर सकता प्रेमी दुर्बल नहीं हों सकता "


शुक्र और चांद अचानक नहीं इनका मिलाना तयशुदा था। उस दिन जब चंद्रमा और शुक्र का मिलन तय था और मेरे शहर का आकाश अगरचे बादलों भरा न होया तो इस पल को सब निहारते। कईयों ने तो इसे निहारा भी होगा .....उनके आकाश में बादल जो नहीं हैं ।
प्रेम की परिभाषा भी यहीं कहीं मिलती है ....!
"प्रेम"एक ऐसा भाव है जिसको स्वर,रंग ,शब्द , संकेत, यहाँ तक कि पत्थरों ने भी अभिव्यक्त करने में कोई कसर नहीं छोड़ी ...... खजुराहो से ताजमहल तक उर्वशी से मोनालिसा तक ,जाने कितनी बातें हैं जो प्रेम के इर्दगिर्द घूमतीं हैं ....!
"सच प्रेम ही संसार कि नींव है "......आसक्ति प्रेम है ही नहीं ! प्रेम तो अहो ! अमृत है ! प्रेम न तो पीड़ा देता है न ही वो रुलाता। आशा और विश्वास का अमिय है ..प्रेम सोंदर्य का मोहताज कभी नहीं हो सकता ...परंतु जब यह अभिव्यक्त होता है तो जन्म लेतें कुमारसंभव जैसे महाकाव्य !! किसी ने क्या ख़ूब कहा -"जिस्म कि बात नहीं ये "
सच !यदि दिल तक जाने कि बात हो तो ....आहिस्ता आहिस्ता जो भाव जन्मता है वोही है प्रेम।
अगर आप सच्चा प्रेम देखना चाहतें हैं ..... एक ऐसी मजदूर माँ को देखिए जो मौका मिलते ही अपने शिशु को अमिय पान करा रही है...क्या आप देख नहीं पा रहे हैं अरे ! इसके लिए आपमें वो भाव होना ज़रूरी जो स्तनपान करते शिशु में है।
अगर इसे आप प्रेम का उदाहरण नहीं माने तो फिर आप को एक बार फिर जन्म लेना ही होगा !
शिवाजी ने सिपाही द्वारा लायी गयी विजित राज्य की महिला को "माँ" कहा तो भारत को एक नयी परिभाषा मिल ही गयी प्रेम की।
मैंने प्रेम को लेकर कहां:-
"इश्क कीजे सरेआम खुलकर कीजे .... भला पूजा भी कोई छिप-छिप के किया करता है "
इसके कितने अर्थ निकालिए निकलते रहेंगे लगातार गुरु देव शुद्धानन्द नाथ ने आपने सूत्र में कहा :-"दुर्बल व्यक्ति प्रेम नहीं कर सकता प्रेमी दुर्बल नहीं हों सकता "

यदि मैं कहूं कि " मुझे कई स्त्रियों से प्रेम है , मुझे कई पुरुषों से प्रेम है तो इसे फ्रायड के नज़रिये से मत देखो भाई। प्रेम के अध्यात्मिक अर्थ की खोज करते-कराते जाने कितने योगी भारत ही नहीं विश्व के कोने कोने में भटकते रहे.......!ग्रंथ लिखे गए "हेरी मैं तो प्रेम दीवानी" गाया गया .... ये इश्क-इश्क है दुहराया गया.... आज रंग है तो मस्त कर देता है फिर भी हम केवल फ्रायड की नज़र से इश्क को जांचते हैं....? ऐसा क्यों है
क्या हम देह से हट के कभी मानस पर मीरा खुसरो को बैठा कर अपने माशूक या माशूका को निहारिए
यही है तत्व ज्ञान है...!

“प्रेम ही संसार की नींव है...!”


संत वैलेंटाइन के लिए प्रेम का सन्देश देने वाले दिन में बुराई क्या..? इस सवाल पर घच्च से अपने राम पर पक्ष द्रोही होने का आरोप तय कर दिया जावेगा कोई डंडा लेकर मारने भी आ जावे इसका मुझे पूरा पूरा अंदाज़ है. देर रात तलक नेट पर  निर्वसना रतियों को निहारते लोग या फिर रूमानी चैट सेवाओं का लाभ उठाते लोग ही  सर्वाधिक शक्ति के साथ इस दिवस पर सक्रीय नज़र आते हैं . जबकि परिवारों में बालिकाओं और  महिलाओं के साथ दुराचारों पर इनकी निगाह कभी कभार ही  ही पड़ती होगी.

घरेलू शोषण पर आक्रामक क्यों नहीं होते ये लोग. वास्तव में यह सब एक पूर्वाग्रही मिशन के हिस्से होते हैं. जो बिना समझ के विरोध का परचम लेकर आगे बढ़ते हैं. वास्तव में होना ये चाहिए कि घरेलू सद संस्कारों को सुधारने के संकल्प लेकर विदेशी संस्कृति के पार्कों कहवाघरों में होने वाले विकृत अनुप्रयोग को रोकने की कोशिश सतत जारी रखनी चाहिए.
आपने शायद ही इन संस्कृति के स्वयंभू रक्षक-सेनानियों को पोर्न साइट्स पर प्रतिबन्ध, अत्यधिक उत्तेजक चित्र छापने वाले अखबारों के संपादकों से ऐसा न करने का अनुरोध करते देखा हो ... मेरी नज़र से कभी भी  ऐसा कोई संस्कृति रक्षक नहीं गुज़रा जो ऐसा करता हो.
मुद्दा देश में संस्कृति की रक्षा का कम आत्म-प्रदर्शन का अधिक नज़र आता है. इस युग की  ये सबसे बड़ी समस्या है कि लोग समाज और सांस्कृतिक विरासतों और मूल्यों को लेकर  चिंता-ग्रस्त हैं और इसी चिंता में हिंसक हो जाते हैं. फिर संवैधानिक व्यवस्था को नकारते हुए किसी प्रेमी-युगल को बेईज्ज़त कर अपना तालिबानी अंदाज़ सामने लाते हैं.
भारत के योग, दर्शन को पाश्चात्य देशों में बड़े आदर से स्वीकारा जाता है. तो अगर प्रेम के सन्देश देने वाले संत को हम भी सकारात्मक रूप से आदर दें तो बुराई क्या है....? हमारे ऋषियों मुनियों ने कभी भी वैदेशिक संस्कारों को रोकने का प्रयास नहीं किया बल्कि अपने संस्कारों को मज़बूत बनाने के लिए प्रभावी कदम उठाए. सनातन व्यवस्था को कभी भी किसी के खतरे का भय नहीं रहा . बल्कि इस देश से लोगों ने सीखा ही है. अब अगर संत वैलेंटाईन  के स्मृति दिवस को प्रेम का इज़हार कर  मना रहें हैं तो सनातनी व्यवस्था पर किस प्रकार खतरा होगा...? कर्मयोगी कृष्ण ने भी तो प्रेम का सन्देश दिया था.  फिर हो सकता है कि संत वैलेंटाइन कृष्ण से प्रभावित हो प्रेम के  सन्देश को विस्तार देना चाहा हो. तब क्या आप विरोध करेंगें  मेरी समझ से परे है...!
समझ से परे तो यह भी है कि जो लोग प्रेम को यौन संबंधों का पर्याय मानते हैं उनके मानस में शुकदेव मुनि का स्मरण क्यों नहीं रहता.
एक बार खुद से पूछा - एक पुरुष हूँ महिलाओं से मिलकर सामान्य क्यों रहता हूँ ? उसे भोग्या , कमजोर , और विलास की वास्तु क्यों नहीं मानता ?
फिर चिंतन करता हूँ तो उत्तर भी  पाता हूँ कि  मुझमें मौजूद  महिलाओं और पुरुषों के प्रति एक सम व्यवहार के  पुख्ता आचरण की वज़ह से  मुझे कभी भी किसी महिला के लिए  भोग्या और कमजोर समझाने के  भाव नहीं आते और न फिर असहज होता हूँ ?
इस बार मैंने अपनी समाज से आह्वान किया कि समाज की मुखिया का पद महिला के हाथ सौंपें ? मुझे मालूम था कि न तो महिलाएं ही मेरी राय से सहमत होंगीं और पुरुष वर्ग के उपहास का पात्र बनाना तय है हुआ भी ठीक वैसा ही. मेरी सफलता इतनी मात्र थी कि समाज के सामने एक अनोखा विषय विचार मंथन के लिए आया उद्देश्य इतना ही था.. क्योंकि रूढ़ियाँ अचानक नहीं टूटतीं इसे तोड़ने के संकल्प कुछ लोग ही ले पाते हैं शेष कुंठा और  भय की पल्ली ओढ़ अनजान बन जाना चाहते हैं . उनमें  कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो आक्रामक हो जाते हैं.
वास्तव में यह प्रेम नहीं है न तो ये कृष्ण से ही हम सीख पाए और न ही संत वैलेंटाइन से . हमने प्रेम को शारीरिक बना लिया है जबकी सदगुरु शुद्धानंद नाथ के सूत्रानुसार –“प्रेम ही संसारकी नींव है”...
जब हम नारियों के अधीन नहीं रहना चाहते तो यही तय हुआ न कि हम केवल उसे दुर्बल देखना चाहते हैं. सामान्यतया  कोई भी दुर्बलता से प्रेम नहीं करता सिर्फ प्रेम जताता है.  प्रेम करना और प्रेम जताना दो प्रथक भाव हैं. प्रेम प्रेमी करता है जबकि शासक प्रेम जताता है... और जिसमें शासक का भाव है वो किसी से भी प्रेम कर ही नहीं सकता ! न नारी से न बच्चों से न ईश्वर से ही .
( नोट : सभी फोटो गूगल से साभार ली गईं हैं  आपत्ति होने पर अवगत करावें )
गिरीश बिल्लोरे “मुकुल”



मंगलवार, 14 मार्च 2017

डाल झुकीं तरुणी के तन सी

फ़ागुन के गुन प्रेमी जाने, बेसुध तन अरु मन बौराना
या जोगी पहचाने फ़ागुन  , हर गोपी संग दिखते कान्हा
रात गये नज़दीक जुनहैया,दूर प्रिया इत मन अकुलाना
सोचे जोगीरा शशिधर आए ,भक्ति - भांग पिये मस्ताना
प्रेम रसीला, भक्ति अमिय सी,लख टेसू न फ़ूला समाना
डाल झुकीं तरुणी के तन सी, आम का बाग गया बौराना 
जीवन के दो पंथ निराले,कृष्ण की भक्ति अरु प्रिय को पाना 
दौनों ही मस्ती के  पथ हैं  , नित होवे है आना जाना--..!!
चैत की लम्बी दोपहरिया में– जीवन भी पलपल अनुमाना
छोर मिले न ओर मिले, चिंतित मन किस पथ पे जाना ?

                                    गिरीश बिल्लोरे “मुकुल”









बुधवार, 8 मार्च 2017

युद्ध के समय ... औरत युद्ध कहाँ लड़ती है... ?


युद्धकाल में औरत  
युद्ध नहीं लड़ती ..
पल पल 
जीने के लिए लड़ती 
रातों को अपलक 
अचानक जाग 
बेटे बेटियों के चेहरे निहारती 
अखबार  में छपी खबरों से 
नज़र चुराती 
प्रार्थनारत... करबद्ध 
मन ही मन मनौती मनाती 
युद्ध के अवसान के लिए
खुद पर व्रत-वरतूले लादती 
बूढ़ी माँ को बताती - माँ वो ठीक हैं.. 
तुम चिंता न करो ........ 
और खुद चिंता के 
रथ पर सवार जाने कहाँ कहाँ घूमती है..
युद्ध के समय ...
औरत युद्ध कहाँ लड़ती है... ?
सुना है अब औरत लड़ती हैं
सीरिया में तो अब जंग सीख गईं हैं 
काश 71 के पहले  बांग्ला देश में औरतें 
जंग सीख जातीं तो तय था 
हौसला न बढ़ता 
उनका 
जो खुदा के लिए जंग लड़ते हैं...
सर्वशक्तिमान के लिए कौन लड़ता है..?
कम से कम मैं नहीं ये औरतें भी नहीं 
सर्वशक्तिमान सदा सर्वशक्तिमान था है और रहेगा 
ये सनातन सत्य था है और रहेगा...
इस लिए औरतें युद्ध कहाँ लड़ती है... ?
बस प्यार करतीं हैं... अछोर प्यार