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असहमति या यह सिद्ध नहीं करती कि कोई आपका विरोधी ही है

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                  जी हां मैं यही सब को समझाता हूं और समझता भी हूं कि अगर कोई मुझसे सहमत है तो वह मेरा विरोधी है ऐसा सोचना गलत है । सामान्यतः ऐसा नहीं हो रहा है.... वैचारिक विपन्नता बौद्धिक दिवालियापन और आत्ममुग्धता का अतिरेक तीन ऐसे मुद्दे हैं जिनकी वजह से मानव संकीर्ण हो जाता है । इन तीनों कारणों से लोग अनुयायी और किसी के भी पिछलग्गू  बन जाते हैं । सबके पिछलग्गू बनने की जरूरत क्या है क्यों हम किसी के भी झंडे के पीछे दौड़ते हैं वास्तव में हमारे पास विचार पुंज की कमी होती है और हम विचार धारा के प्रवाह में कमजोर होने की वजह से दौड़ने लगते हैं । वैचारिक विपन्नता बौद्धिक दिवालियापन आत्ममुग्धता का अतिरेक किसी भी मनुष्य को पथभ्रष्ट करने वाली त्रिवेणी है ।     जब आप किसी चर्चित लेखक के लेखन में मैं शब्द का प्रयोग देखें तो समझ जाइए कि वह आत्ममुग्ध है आत्ममुग्धता के अतिरेक में संलिप्त है और यह संलिप्तता अधोगामी रास्ते की ओर ले जाती है । क्योंकि जैसे ही आप अपने लेखन और चिंतन में स्वयं को प्रतिष्ठित करने की जुगत भुलाएंगे तो तुरंत एक्सपोज हो जाते हैं । लघु चिंतन की परिणीति स्वरूप जब बड़े-बड़े

इंतज़ार

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इंतज़ार गूगल से साभार दरख्तों को पंछियों का पंछियों को शाम का शाम को मेरा मुझे बस तुम्हारा इंतज़ार होता है...!! तब तुम चौखट पर सर टिकाए नुक्कड़ तक देख लेती हो यकबयक फिर उदास सी पीछे वाली परछी में सुलगती अधबुझी आंच को समझा आती हो...!! तब तक आँगन वाले पेड़ पर कोटर में तोते का बच्चा तोती से चोंच लड़ा चुग्गा चुन ही लेता है कागा काँव काँव कर सेट हो जाता है मेरे आने से पहले तुम कितनी देर ताकती होगी नुक्कड़ तक आते ही बस एक सवाल आज देर हो गई जबकि जानती हो मेरे आने का यही वक्त है पर हर इंतज़ार कितना लंबा होता है ये समझाने की कोशिश वर्षों से जारी है..