प्राण प्रिये


वेदना संवेदना निश्चल कपट
को त्याग बढ़ चली हूँ मैं
हर तिमिर की आहटों का पथ
बदल अब ना रुकी हूँ मैं
साथ दो न प्राण लो अब
चलने दो मुझे ओ प्राण प्रिये ।

निश्चल हृदय की वेदना को
छुपते हुए क्यों ले चली मैं
प्राण ये चंचल अलौकिक
सोचते तुझको प्रतिदिन
आह विरह का त्यजन कर
चलने दो मुझे ओ प्राण प्रिये ।

अपरिमित अजेय का पल
मृदुल मन में ले चली मैं
तुम हो दीपक जलो प्रतिपल
प्रकाश सौरभ बन चलो अब
चलने दो मुझे ओ प्राण प्रिये ।

मौन कर हर विपट पनघट
साथ नौका की धार ले चली मैं
मृत्यु की परछाई में सुने हर
पथ की आस ले चली मैं
दूर से ही साथ दो अब
चलने दो मुझे ओ प्राण प्रिये ।
--- दीप्ति शर्मा 

टिप्पणियाँ

  1. अपरिमित अजेय का पल
    मृदुल मन में ले चली मैं
    तुम हो दीपक जलो प्रतिपल
    प्रकाश सौरभ बन चलो अब
    चलने दो मुझे ओ प्राण प्रिये ।
    बहुत सुन्दर भाव, सुन्दर प्रस्तुति...

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  2. शनिवार 07/07/2012 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. आपके सुझावों का स्वागत है . धन्यवाद!

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  3. अपरिमित अजेय का पल
    मृदुल मन में ले चली मैं
    तुम हो दीपक जलो प्रतिपल
    प्रकाश सौरभ बन चलो अब
    चलने दो मुझे ओ प्राण प्रिये ।
    बहुत सुंदर... भाव भी और अभिव्यक्ति भी ...
    शुभकामनायें

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  4. तुम हो दीपक जलो प्रतिपल
    प्रकाश सौरभ बन चलो अब ...

    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ... भावमय रचना है ...

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