मधुमय देश हमारा : जयशंकर प्रसाद संगीत:मौसमी नंदी स्वर: श्रद्धा बिल्लोरे

शुक्रवार, २५ दिसम्बर २००९

प्रिय बिन बैरन-सी लगे पायल की झंकार

 [Shakuntala_kalajagat.jpg]साभार:कला जगत ब्लॉग 
मंद पवन मादक मदन, प्रियतम भाव विभोर,
पायल-ध्वनि मोहक लगे, शेष सबइ कछु शोर

नयनन सोहे प्रीत रंग, प्रीत पवन चहुँ ओर
टेसू बोते वेदना, विरहन पीर अछोर

प्रिय बिन बैरन-सी लगे पायल की झंकार
हाथ निवाला ले खड़ा ओंठ करे इनकार

देह जगाए कामना, हाथ सजाते रूप
दरपन तब जाके कहे- "अब तुम प्रिय अनुरूप''

मादक माधव माह यो, जोग-बिजोग दिखाए
प्रिय से दूर तनिक रहो, प्रीत दुगुन हुई जाए

तापस का प्रिय राम है, ज्यों बनिकों को दाम
प्रेम-रीति के दास हम, मुख वामा को नाम




वेब दुनिया पर इश्क प्रीत love की चर्चा

रवीन्द्र व्यास जी का आभार जिन्हौने मेरे ब्लॉग   इश्क प्रीत love की चर्चा कुछ इस तरह की
                                             "इश्क, प्रीत, लव। यह एक ब्लॉग का नाम है। कहने की जरूरत नहीं कि इस ब्लॉग की साज-सज्जा से लेकर पोस्टें और फोटो इन्हीं भावों के ईर्दगिर्द हैं। यहाँ इश्क, प्रीत, लव की बातें हैं लेकिन इसकी खूबी यह है कि यहाँ किसी भी तरह की दार्शनिकता से परहेज किया गया है और इश्क के भावों को, उसकी आत्मा को और उसकी महक को बहुत सादगी के साथ पेश किया गया है। और तो और यहाँ कविताएँ हैं, गीत हैं और फिल्मों की नायिकाओं के सुंदर फोटो भी हैं।"

इसे ज़्यादा पढ़ है तो एक क्लिक "यहाँ"  लगाइए 
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      हार्दिक आभार रवीन्द्र व्यास जी 
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मंगलवार, १५ दिसम्बर २००९

तापसी-उर्मिला

सुभगे उर्मिला
तुमने मेरे दिए हुए
अश्रु सजा लिए अपनीं पलकों पर
निस्तब्ध/नि:शब्द
ताकती आकाश को
कदाचित मेरे दिए गए अश्रु-उपहार/मेरी अमानत के
बिखर जाने के भय से
 तुम जो निस्तब्ध/नि:शब्द/स्थिर हो
सच उर्मिले
मन प्राण से तुम्हारा लक्ष्मण आज प्रतिज्ञा और संकल्प का
निबाहने तुम से दूर है
यहीं से
तुम्हारी तापस देह को
देख रहा हूँ.......
सुभगे
राम के साथ मैं सा-शरीर हूँ किन्तु
तुम चौदह बरस तक यूं ही
पथराई-प्रतीक्षिता
किसी युग में ऐसी सहचरी किसी को भी न मिलेगी यह तय है
प्रिये
तुम्हारी पावन प्रीत के आगे मैं नत मस्तक हूँ
तुम्हारा अपराधी हूँ
तुम जो साक्षात "प्रेम-देवी हो"
तुम्हें नमन सदैव

 

मंगलवार, ८ दिसम्बर २००९

तुम्हारी सादगी ही उनके

http://www.lehigh.edu/~amsp/vidya%20balan.jpg
  

प्रीत दिल में और मधुर सी   मुस्कान लब पे
मेरी दीवानगी की बस इतनी ही वज़ह है. 
तुम्हारी  सादगी  से  रूपसी हूरें सुलगती हैं 
तुम्हारी सादगी ही उनके   सुलगने की वज़ह है

 

रविवार, ६ दिसम्बर २००९

तुम यौवन की राजकुमारी में पीड़ा शहजादा हूँ


मन प्रियतम का प्रेम पिपासु  अपलक  तुम्हें निहारूं प्रियतम
सभागार में बोलूँ कैसे ? नयनन शब्द उचारूं  प्रियतम..!

चपल अधिक हिरनी से भी  तुम, मैं मर्यादा से  तागा हूँ

  भयवश दूर  न हो जाओ मुझसे   कैसे कहो  पुकारूं प्रियतम !
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जो कहना है  साफ़ कहो प्रिय चुप रहने से न बेहतर है
मुझे प्रीत दो अथवा पीड़ा, सब कुछ तुम पर ही निरभर है
चलो पीर ही दे दो मुझको अपने गीत निखारूँ प्रियतम !
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शुक्रवार, ४ दिसम्बर २००९

हम ठहरे पलटवारी



इस  तस्वीर को गौर से देखिये जाडे में कभी कभार आपकी हालत यूँ हो जाती है बीमार हों और शरीके हयात अचानक आपकी तस्वीर उतार लें . तब जब आप उसनीदे से चाय की तलब में हों कुछ झुंझलाए से भी ..............! आप को कैसा लगेगा अपनी तस्वीर देखकर , झुंझला तो आप तब और जाएंगे जब शरीके हयात आपको देख कर मुंह दबा के हँस रहीं हों .
आज अपने साथ भी यही कुछ हुआ हम ठहरे पलटवारी पुटिया के अपने हाथ ले लिया कैमरा और हम पर हंसने वाली श्रीमती जी का चित्र भी कैद कर लिया इस चुहल से नाराज़ श्रीमती जी ने देर तक बात की नहीं चाय का प्याला तो लाँई किन्तु जैसे ही फोटो हमने दिखाया तो फिर वही उन्मुक्त हंसीं माहौल ही बदल गया किन्तु एक उपनाम दे दिया हमको  "पलटवारी" हम भी कम नहीं बोल पड़े :-"हमारी आजा को   में इलाके के पटवारी खिताब मिला था रदीफ़ मिल गया पलटवारी"


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फिर क्या था एक बीमार दिन की खुशगवार होती सांझ और हम आ गए आपकी सेवा में निहायत पर्सनल बात को ब्लॉग पर छापने. इस बात का से सच साबित हुई वो बात जो एक दिन माँ ने हम दौनों से कही थी: "बेटा हमारा ज़माना और था अब सह अस्तित्व ही ज़रूरी है...." पत्नी के समर्पण की कीमत इस युग ने आंकी है तुम उसका पालन करना . और मेरी पत्नी से कहा :हाँ सुलभा मुदित होने के लिए कोई समय निर्धारित नहीं सदा मुस्कुराते रहो दुनियाँ में बेवज़ह रोने के विषयों की भरमार है.  
सव्यसाची माँ आज तुम खूब याद आ रहीं हों इस लिए कि मुदिता को  अर्थ दे दिया हमने  सुखद दाम्पत्य का यही सच है कि हम तनाव मुक्त रहें . हँसे / गुस्से और झुंझलाहट का इलाज़ करें हल्की-फुल्की चुहलों से यही है प्रेम का सार तत्व
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बुधवार, २ दिसम्बर २००९

आँगन के कचनार







मेरे प्रथम गीत में मधुता
मेरी प्रथम गीत का कारन
तुमको भूल न पाऊँ मुग्धा
तुम नित बसतीं मन के आँगन

प्रथम गीत अरु प्रथम प्रीत को
कौन भुला पाया है अब तक!
नेह निमंत्रण प्रियतम तुम्हरा
गूँज रहा कानों में अब तक!!
हँसीं तुम्हारी ऐसी जैसे वीना के तारों का वादन!!

याद करो वो प्रेम संदेसा
लिख के तुमने मुझे था भेजा!
प्रतिबंधों के उस युग मे प्रिय
रखा गया न मुझसे सहेजा!!
मन पे संयम का पहरा था,जिसे हटाया तुम्हारे कारन!!

आँगन के कचनार की हमने
जीभर सेवा की थी मिल कर!
अब वो मुझसे पूछ रहा है
"क्यों तुम बिखर रहे तिल-तिल कर"
कहता वो तुलसी-चौरे से दौनों घर के सूने आँगन!!