रविवार, 15 जनवरी 2012

सुनतें हैं कि सरकार कल शाम आएंगें- जलते हुए सवालों से जाड़ा मिटाएंगें !


उनको यक़ीन हो कि न हो हैं हम तो बेक़रार
चुभती हवा रुकेगी क्या कंबल है तारतार !!
मंहगा हुआ बाज़ार औ’जाड़ा है इस क़दर-
हमने किया है रात भर सूरज का इंतज़ार.!!

हाक़िम ने  फ़ुटपाथ पे आ बेदख़ल किया -
औरों की तरह हमने भी डेरा बदल दिया !
सुनतें हैं कि  सरकार कल शाम आएंगें-
जलते हुए सवालों से जाड़ा मिटाएंगें !

हाक़िम से कह दूं सोचा कि सरकार से कहे
मुद्दे हैं बहुत उनको को ही वो तापते रहें....!
लकड़ी कहां है आपतो - मुद्दे जलाईये
जाड़ों से मरे जिस्मों की गिनती छिपाईये..!!

जी आज़ ही सूरज ने मुझको बता दिया
कल धूप तेज़ होगी ये  वादा सुना दिया !
तू चाहे मान ले भगवान किसी को भी
हमने तो पत्थरों में भगवान पा लिया !!

कहता हूं कि मेरे नाम पे आंसू गिराना मत
फ़ुटपाथ के कुत्तों से मेरा नाता छुड़ाना मत
उससे ही लिपट के सच कुछ देर सोया था-
ज़हर का बिस्किट उसको खिलाना मत !!

मंगलवार, 10 जनवरी 2012

अब सच तुमको चाहने लगा हूं

तुम तुम्हारी पीर
मेरी कब हो गई सच
अचानक ...
तुम से मिलकर बेतहाशा खुश हूं पर
जानता हूं
तुम उदासी को मुस्कुराहट
के दुशाले में ढांक लेती
किसी से कुछ भी नहीं कहती
चुपचाप
अपलक छत को निहारती देर रात तक
जूझती हो
व्योम के उस पार
तक देखतीं तुम मुझे अक्सर
दिख ही जाती हो
जानता हूं
फ़िर खुद से पूछता हूं कि
क्यों रुक गया तुम्हासी रेशमी आवाज़ सुन कर
तुम्हारे इर्द गिर्द
एक
वलय बन के क्यों घूम रहा हूं
जो भी हो व्योम के पार का तुमसे मेरा भी आभासी नाता ज़रूर है
क्योंकि
सच अब हम अनजाने नातों में बंध गये हैं
शायद