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गिरीश के दोहे

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काजल बिंदी सूरमा, नैन सजें अरु भाल सुन प्रिय की पदचाप को, हो गए गाल गुलाल ।। झूठै कागा बोलते, प्रियतम पथ पै आय । झूठी आसा में सखि, दोगुन पाक पकाय ।। पिया बियाही आत्मा, विरह अगन चहुँ ओर भोर नींद गहरी लगी, कागा करते शोर ।। कौई देह की राग संग , कैसे ताल मिलाय । जो कस पाए ढोलकी, वोही ताल मिलाय ।। सुनो मुकुल खुल्ला कहे, बैर प्रीत मदपान सीमा बंधन होय तो , सब कछु अमिय समान ।। *गिरीश बिल्लोरे मुकुल*