तुम जो देह-मंजूषा खोल जा चुके हो

तुमको निहारते नयन अब
अभ्यस्त हो चुकें हैं
तुम्हारे आने वाले पथ को
बिना तुम्हारे आने जाने वालों की
भीड़ को देखने..!
हो सकता है
भीड़ वाले किसी झुण्ड के पीछे
तुम्हारा मेरे क़रीब आता
चेहरा आए क़रीब और क़रीब
तपाक से कह दें -"सारी,..."
पर शायद अब ये न हो,
सकेगा कभी भी,
तुम जो देह-मंजूषा
खोल जा चुके हो
सुदूर पेटियां तलाशने..
इसे प्रीत कैसे कहूं..?
कब तक चुप रहूं
मैं जो संस्कारों की बेड़ियो में जकड़ी हूं
तुम्हारे बनाए नियम
काश एकाध मैं भी बना पाती ऐसा कोई एक ..!!

टिप्पणियाँ

  1. सीमा रेखा में सिमटे सकुचाते नारी मन को बखूबी महसूस कर सफल व् भावुक चित्रण .... सुन्दर !!

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  2. मैं जो संस्कारों की बेड़ियो में जकड़ी हूं
    तुम्हारे बनाए नियम
    काश एकाध मैं भी बना पाती ऐसा कोई एक ..!!
    नारी मन की पीड़ा को शब्द देती रचना... आभार

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