अंजोरी सी प्रीत-रश्मियां कब बिखरी मन की चादर पर
कैसे और कहां से लाईं भाव-अमिय, तुम भी गागर -भर
कैसे जागी आस मिलन की कब तुम पर विश्वास हुआ ?जब जब दूरी तुमसे चाही मन तब तब कुछ पास हुआ
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कल जब शशि था पूर्ण कलामय मन एकाकी होता कैसे?
तुम बिन मैं क्या कुछ रच पाता भाव शब्द में बोता कैसे ?
कण कण व्यापी चंद्र-रश्मियां हमने भी कुछ याद किया
एक बार फ़िर प्रियतम का नज़दीकी एहसास हुआ..!!
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तुम अनुपम कृति तन से मन से मैं चातक सा दीवाना
तुम्हैं प्रीत मुझसे हो न हो मैं इस बात से अनजाना !!
व्यक्त करो या मन में रक्खो पर ये सच अब स्वीकार ही लो
जब जब हम तुम मौन रहे हैं तब सच्चा संवाद हुआ !!
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5 टिप्पणियाँ:
waah...
बहुत खूब ! चित्र भी...
अच्छी प्रस्तुति!
शुक्रिया तस्वीर भी अच्छी है
Kya Baat Hai Girish ji... :)
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