भारत में कृषि एवम कृषकों की समस्याओं पर एक नज़र

भारत में कृषि एवम कृषकों की समस्याओं पर एक नज़र
            गिरीश बिल्लोरे मुकुल
भारत का कुल क्षेत्रफल 3287000 वर्ग किलोमीटर है। और इसमें सर्वाधिक हिस्सा 51% कृषि योग्य भूमि का है जबकि वन भूमि 21% चरोखर 4% और 26% ऐसी भूमि है जिस पर कोई भी उत्पादन संभव नहीं है। भारत में 2019 से 2020 तक 295.65 मिलियन मीट्रिक टन खाद्यान्न का उत्पादन किया गया जबकि विगत वर्ष दो हजार अट्ठारह उन्नीस में 285.21 मिलियन मीठी संथाल अर्थात लगभग 10.46 मिलियन मीट्रिक टन अधिक। भारत की जनसंख्या 1.35 बिलियन रही है जबकि इसी अवधि में यूनाइटेड स्टेट ऑफ अमेरिका की जनसंख्या केवल 327.2 मिलियन रही है जनसंख्या के मामले में चीन 1.39 अरब जनसंख्या के साथ सबसे आगे है . 
भारत के कुल आर्थिक विकास में  कोविड19 के पूर्व की कृषि विकास दर 18.2 % थी जो इस वर्ष 16.5% हो चुकी है।
  भारत में प्रति व्यक्ति आय ₹11254 का अनुमान भारत सरकार ने लगाया है यह आय  विगत वर्ष ₹10534 प्रति व्यक्ति आंकी गई थी । अमेरिका में प्रति व्यक्ति आय लगभग $60000 प्रति वर्ष और चीन में यही आए $10000 प्रति वर्ष आंकी की गई । अर्थात अमेरिका में ₹ 4800000  प्रति वर्ष एक व्यक्ति अर्जित कर सकता है जबकि चीन में लगभग ₹800000  एक व्यक्ति वर्ष भर में कमा लेता है। भारत में प्रत्येक व्यक्ति केवल 135000 लगभग 1 साल में कमा सकता है। ( यहां चीन का उल्लेख यूं तो आवश्यक नहीं क्योंकि कम्युनिस्ट सरकार किसी भी नागरिक की संपत्ति को व्यक्तिगत नहीं मानती । मात्र दक्षिण एशिया के देशों के संदर्भ में उदाहरण के लिए लिखा है )
अल्प आय के कारण भारतीय नागरिकों के जीवन यापन के लिए ₹10000/ ही अपर्याप्त हैं ऐसी स्थिति में पूंजी निर्माण कैसे सम्भव है ? तो कृषक भी पूँजी कैसे बना सकता है । जबकि उसे खेती को व्यवसायिक स्वरूप देने के लिए सबसे बड़ी ज़रूरत (कृषि हेतु ) पूँजी की ही है ।
      अगर देखा जावे तो कृषि कार्य में पूंजीगत निवेश में सरकार 18.6% पूंजीगत सहायता मुहैया कराती है ।  वर्तमान में निजी क्षेत्र का निवेश मात्र दशमलव 4 3% के आसपास है अर्थात लगभग 79.4 % निवेश कृषक को स्वयं करना होता है। ये आंकड़े केवल बात को समझने के लिए हैं ।
उपरोक्त आंकड़े  पेश करने का अर्थ है- वर्तमान में किसान के पास पूंजी का अभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। मूल्य के सापेक्ष बचत और बचत से पूंजी का निर्माण भारत में जिस गति से अपेक्षित है उस गति से नहीं हो पा रहा है। इसके बावजूद कृषि क्षेत्र में
भारत के उत्पादन की क्वालिटी के संदर्भ में देखा जाए तो एक ओर उत्पादन में  वृद्धि हो रही है दूसरी ओर निर्यात का प्रतिशत भी 252 हजार करोड़ रुपए का हुआ है। निर्यात में किसान की उपस्थिति प्रत्यक्ष रूप से नहीं हैं ।
अतः निर्यात कृषक के लिए लाभदायक न होकर अंतिम एक्सपोर्ट कम्पनी का ही है । जो सीधे लाभ कमाती है। निजी क्षेत्र की कम्पनीयों को वर्तमान में अधिक लाभ हो रहा है । जबकि कम्पनी को अगर स्वयम उत्पादन का काम करना है तो तय है कि ज़मीन की किराएदारी /कांट्रेक्ट फार्मिंग उसके लिए सीधे कृषि में निवेश का रास्ता खोलेगी । उदाहरण के लिए विदिशा मंडी का गेँहू विश्व बाजार में स्थान बना चुका है। बाज़ार तक पहुंचने तक गेहूँ की कीमत जिस तेजी से बढ़ती है इसका लाभ सीधे व्यापारी एवम आढ़तियों एवम अन्त में कम्पनी को मिलता है । और कृषक एक बार केवल साधारण लाभ ले पाता है । सरकार की मंशा है कि - कृषि में निजी क्षेत्र से पूँजी जुटाई जावे । मित्रो निजी क्षेत्र से केवल  .43% पूँजी कृषि के लिए उंटिया-जीरा है। अगर इस निवेश की मात्रा में वृध्दि होकर 50% हो जाए तो सोने में  सुगन्ध आना तय है।
       अब आप सोच रहे होंगे कि भारत में कृषि उत्पादन के रकबे में बढ़ोतरी हुई है ?ऐसा नहीं है ।
  सरकार की कृषि सहाय नीतियों के कारण उत्पादन के आंकड़ों का लगभग 11 मिलियन मीट्रिक टन पहुंच जाना वह भी कोविड-19 के बावजूद उत्पादन उल्लेखनीय है। भारत के नागरिक किसान बेशक बधाई के पात्र हैं।
इन सब के बावजूद एक प्रश्न शेष रहता है यह कि किसान समस्या ग्रस्त क्यों है ?
   व्यक्तिगत ओपिनियन से अगर मैं कहूं तो वास्तव में पूँजी के साथ साथ वविचारणीय मुद्दा है कि- कृषि जोत क्षेत्र के छोटे होने से उत्पादन लागत में  वृद्धि हो जाना  एक प्रारंभिक समस्या है । बड़ी जोत की रकबे में उत्पादित सामग्री का कास्ट ऑफ़ प्रोडक्शन कम करना सहज हो जाता है। जबकि छोटी जोत में के किसानों के लिए न्यूनतम लाभ की स्थिति एकमात्र विकल्प शेष रहता है।
यहां सहकारी कृषि भी संभव नहीं है जिसका मूल कारण है.... सामाजिक आपसी असहमति एवं मिस गाइड होना अथवा मिस गाइड करना।
     कृषि कार्य भावनात्मक रूप से भारतीय जनमानस में बसा हुआ है। यहां मेरा नजरिया कृषि कार्य के संदर्भ में जरा भिन्न है। कृषि कार्य में भूमि के सापेक्ष उत्पादन का अनुमान कृषक सहजता से लगा तो लेते हैं किंतु बाजार के सापेक्ष उत्पादन लागत को कम करने के हुनर से कृषक वाकिफ नहीं है।
  उनका लाभ का प्रतिशत बड़े उत्पादकों के सापेक्ष काम होता है।
मित्रों एक उदाहरण से समझिए अगर आप 10 लोगों के लिए भोजन बनाते हैं और यदि 100 लोगों के लिए भोजन तैयार करवाते हैं तो 10 लोगों के लिए तैयार भोजन की इकाई उत्पादन लागत 100 लोगों के लिए तैयार भोजन के सापेक्ष अधिक ही होगी । अधिक उत्पादन लागत होने से लाभ का प्रतिशत कम होता है। जिससे वित्तीय प्रबंधन  योग्य पूंजी का निर्माण की दर कम और कभी-कभी शून्य भी हो जाती है । अन्न प्रदाता के पास पूंजी का ना होना या पर्याप्त ना होना अन्नदाता का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है।

तब फिर क्या करें कि भारतीय किसान को पूंजीगत सहायता  उपलब्ध हो..?
    भारतीय किसान को पूंजी गत सहायता उपलब्ध कराने के लिए कृषि उत्पादन कार्य में  निजी क्षेत्र का सीधे ले आना चाहिए एवम कृषि उद्योग के रूप में  स्थापित  करने की जरूरत है । उद्योग की श्रेणी में आ जाने के बाद कृषि में गुणवत्ता और पूंजी की उपलब्धता के संबंध में विशेष चिंतन संभव होगा। यहां कृषि कार्य को उद्योग की तरह दर्जा देने की बात नहीं है बल्कि कृषि कार्य को करने के लिए औद्योगिक नजरिया किसान जो अपने उत्पादक खेत को एक इंडस्ट्री के तौर पर मान्यता दी और एक सीईओ की तरह काम करें।
  भारत में कृषि उत्पादन को प्रबंधित करने वाले किसान को प्राकृतिक आपदाओं से अप्रभावित रखने के लिए लगभग न्यूनतम लागत के लिए पूंजी सुरक्षित रखना आवश्यक है। वर्तमान में कृषि बीमा द्वारा क्षति पूर्ति संभव है परंतु बाढ़ प्राकृतिक आपदा के रूप में जो बाधाएं कृषि के लिए उत्पन्न होती हैं, के लिए लगभग 100% पूंजी सुरक्षित रखनी ही होगी। साथ ही साथ रवि और खरीफ की फसलों के लिए लगभग उतनी ही पूंजी सुरक्षित होनी चाहिए।
क्योंकि कृषि उत्पादन कर्ता किसान विभिन्न करों से मुक्त होता है ऐसी पूंजी का निर्माण किया जा सकता है। किंतु आवश्यक खर्चों को निकालने के बाद छोटे कृषक सामान्यतः पूंजी निर्माण नहीं कर पाते हैं।
  पूंजी निर्माण प्रबंधन सामूहिक कृषि सहकार आधारित कृषि और अंत में निजी क्षेत्र के कॉर्पोरेट एवं मल्टी नैशनल्स कम्पनियों  द्वारा कृषि कार्य में प्रवेश करना किसी भी दृष्टि से गलत नहीं है।
    मैं यहां कृषि कानूनों की संदर्भ में वर्तमान में इसलिए अत्यधिक कुछ अभिव्यक्त नहीं कर रहा हूं क्योंकि , वर्तमान  परिपेक्ष्य में लोग तीनों कानूनों को समझने में केबल स्थापित किये जा रहे नैरेटिव को स्वीकृति दे रहे हैं । जो लोग क़ानून समझ सकते हैं वे समझ चुके हैं कि ये क़ानून न केवल उपयुक्त है बल्कि आश्चर्यजनक परिवर्तन कारी साबित होंगे ।
[  ] जहां तक MSP का सवाल है तो एक तथ्य महत्वपूर्ण है कि MSP एवम सब्सिडी पर भारत के विरूद्ध  कैनेडियन प्रधान मंत्री स्वयम WTO के समक्ष भारत की शिकायत दर्ज की गई है ।
 

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