शुक्रवार, 11 दिसंबर 2020

"जिसने श्रीकृष्ण को जिया, चखा,और पिया - वह ओशो थे" - डॉ आनंद राणा

"जिसने श्रीकृष्ण को जिया, चखा,और पिया - वह ओशो थे" "ओशो का न कभी जन्म हुआ न मृत्यु। वे केवल इस वसुंधरा पर 11 दिसंबर 1931 से 19 जनवरी 1990 तक भ्रमण करने आये थे"..अवतरण दिवस की अनंत कोटि शुभकामनायें..त्वदीय पाद पंकजम् नमामि देवी नर्मदे.. माँ नर्मदा के पवित्र जल और संस्कारधानी की पवित्र मिट्टी से..धर्म +अध्यात्म +दर्शन सहित विविध विधाओं के दुर्लभ रंग बिरंगे खूबसूरत और सुगंधित अमर पुष्प 🌸 विकसित हुए..कभी महर्षि गौतम के रूप में,कभी जाबालि ऋषि के रुप में ,तो कभी भृगु मुनि के रूप में,कभी महर्षि महेश योगी के रूप में, तो कभी आचार्य रजनीश के रूप में.. इनमें ओशो पारिजात (हरसिंगार) पुष्प 🌸हैं.. यह निर्विवाद सत्य है कि संसार के रंगमंच पर समय समय पर महान आत्माएं अवतरित होती हैं, जो अपनी दिव्य छवि का प्रकाश बिखेर कर अपने चरण चिन्ह, आने वाली पीढ़ियों के लिए छोड़ जाती हैं, जिससे भविष्य में भी उनका मार्गदर्शन होता रहे.. ऐंसी युगांतकारी आत्माओं में आचार्य रजनीश का नाम सदैव अमर रहेगा...संस्कारधानी में 21 वर्ष बीते और यहीं मौलश्री वृक्ष 🌳 के नीचे दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ.. ओशो के आकार का आकलन करना अत्यंत दुष्कर कार्य है क्योंकि व्यक्तिव बहुआयामी हैं और उसकी सीमायें अनंत.. पर इतना सहज और सरल भी है कि "जीवन एक बार मिलता है जी भर के जियो आनंद से जियो" 😀आनंद का दूसरा नाम ओशो है - कहना अतिशयोक्ति न होगा🙏ओशो के इस आनंद के आदर्श हैं - श्रीकृष्ण.. वो कहते हैं कि "श्री कृष्ण जैंसा बहुआयामी व्यक्तित्व इस पृथ्वी पर नहीं हुआ.. जीसस +महावीर स्वामी +बुद्ध से पृथक हैं श्रीकृष्ण.. जीवन की उदासी से दूर सब कुछ जानते हुए भी श्रीकृष्ण जीवन में आनंद का संदेश देते हैं..वो नाचते हैं गाते हैं..श्रीकृष्ण को अतीत में ठीक ठीक नहीं समझा जा सका परंतु वो तो भविष्य के लिए हैं उनमें ही जीवन का भविष्य है ".. कृष्ण ही परमात्मा हैं.. श्रीकृष्ण के कर्म(साधारण मनुष्य)-कर्म करना ही कर्म नहीं जब तक मैं कर्ता हूँ का भाव न हो.... अकर्म(सन्यासी) - ऐंसा कर्म जिसमें कर्ता का भाव न हो अर्थात मैं का भाव न हो +विकर्म (परमात्मा) - श्वांस के लेना, खून की गति, भोजन का पचना.. की व्याख्या से प्रभावित हैं..कृष्ण का जन्म अंधेरे (अमावस) में हुआ..सभी का जन्म अंधेरे में ही होता है.. क्योंकि जन्म की प्रक्रिया ही रहस्यमय है.. बीज अंधेरे में फूटता है उजाले में नहीं.. कविता का भी सृजन अनकांशस डार्कनेस से होता है.. चित्र का जन्म मन की अतल गहराईयों के अंधकार में होता है.. समाधि का जन्म, ध्यान का जन्म भी अंधकार में होता है.. यहाँ गहन अंधकार का अर्थ है जहाँ बुद्धि का प्रकाश ☀ जरा भी नहीं पहुँचता..(वैंसे रजनीश का शाब्दिक अर्थ भी है - अंधेरे का ईश्वर)... कृष्ण - आकर्षण का केंद्र है, कशिश का केंद्र (सेंटर आॅव ग्रेविटेशन).. वही केंद्र आत्मा है.. एक प्रकार से हर व्यक्ति का जन्म कृष्ण का ही जन्म है, यह बोध कि शरीर ही नहीं हूँ आत्मा हूँ इसलिए श्रीकृष्ण अद्भुत अद्वैत हैं .......... ओशो कबीर की भाँति धर्मनिरपेक्ष हैं.. एक विश्व शासन से वसुधैव कुटुम्बकम् के आदर्श को पल्लवित और पुष्पित करते हैं.. नव सन्यास - अद्वितीय विचार है जिसमें गृह त्याग नहीं करना है.. जोरबा टु बौद्ध - जोरबा भोग विलास से डूबा व्यक्ति (29 वर्ष की अवस्था तक बुद्ध जोरबा ही थे) और वही बुद्धा के रुप में निर्वाण पाया हुआ..अब अंत में "संभोग से समाधि" की ओर.. संभोग के बारे में ओशो ने कहा कि था कि "जिस प्रक्रिया से हमारा जन्म होता है वह अपवित्र कैंसे हो सकती है"?संभोग का इतना आकर्षण क्षणिक समाधि के लिए है, संभोग से आप उस दिन मुक्त होंगे, जिस दिन आपको समाधि, बिना संभोग के हासिल होगी.. संभोग का आदर्श तो यही है कि" पति अपनी पत्नी के पास ऐंसे जाये जैंसे कोई मंदिर में जाता है , पत्नी अपने पति के पास ऐंसे जाये, जैसे कोई परमात्मा के पास जाता है-क्योंकि जब दो प्रेमी संभोग करते हैं तो वे वास्तव में परमात्मा के मंदिर से गुजरते हैं "🙏🙏🙏जय श्री कृष्ण 🙏 🙏और फिर ये भी कि" जाकी रही भावना जैंसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैंसी "🙏 🙏" मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना, कुंडे कुंडे नवं पय:"😀(उधर एथेंस वासी सुकरात को हीमलकाॅक(जहर) देते हैं इधर अमेरिका के लोग ओशो को "थेलियम".. पर ये दोनों नहीं जानते थे कि दोनों अमर हैं)
🙏 🙏 🙏 डॉ. आनंद सिंह राणा, इतिहास संकलन समिति महाकोशल प्रांत 💐 💐 💐

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