सोमवार, 13 अप्रैल 2020

प्रणय पिपासा प्रेम नहीं प्रिय

*सुप्रभात शब्द साधक-साधिकाओं को*
*यह रचना भोर काल के सात्विक चिंतन की परिणीति है..! आप इसे किस दृष्टिकोण से स्वीकारेंगे यह आपकी टिप्पणियों से संसूचित होगा*
🙏🏻🙏🏻🙏🏻

प्रणय पिपासा प्रेम नहीं प्रिय
प्रेम को अब विस्तार तो दे दो ।

प्रेम के पथ के पथचारी को
भय कैसा कैसी अभिलाषा ।
न तो पाने की लालच ही 
खोने की जाने परिभाषा ।।
साहस कर आया है जो द्वारे -
प्रीत-दृष्टि एक बार तो दे दो ।।

गीत लिखो या ग्रंथ लिखो
सबके सब ही अर्थहीन से ।
मादक रूप चपल यौवन के
सन्मुख तुम क्यों दीनहीन से।।
प्रीत पराजित-रुदन कहां है-
मुखर निमंत्रण इस बार तो दे दो ।।

जो दुर्बल हो वह प्रेमी कैसा 
जो प्रेमी वो ही बलशाली ।
प्रेम वाटिका तक जाके देखो
मन-मानस है जिसका माली ।।
अमरबेल से शोषित तरुओं को
कर संरक्षित अरु प्यार भी दे दो ।।
*गिरीश बिल्लोरे मुकुल*

5 टिप्‍पणियां:

  1. प्रेम पर इतनी सरलता से इतनी सुंदर पंक्तियां लिख ना कोई आप से ही सीख सकता है गिरीश भाई बहुत ही सुंदर सरल और प्रभावित करने वाली रचना इसे साझा करने के लिए आपको बहुत साधुवाद

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  2. प्रेम का सुन्दर अवलोकन

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  3. जो दुर्बल हो वह प्रेमी कैसा
    जो प्रेमी वो ही बलशाली ।
    प्रेम वाटिका तक जाके देखो
    मन-मानस है जिसका माली ।।
    अमरबेल से शोषित तरुओं को
    कर संरक्षित अरु प्यार भी दे दो
    बहुत ही सुंदर ,रहिमन रहिमन ये प्रीत रे ,जानू न जग की रीत रे ,
    बधाई हो

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