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प्रणय पिपासा प्रेम नहीं प्रिय

*सुप्रभात शब्द साधक-साधिकाओं को* *यह रचना भोर काल के सात्विक चिंतन की परिणीति है..! आप इसे किस दृष्टिकोण से स्वीकारेंगे यह आपकी टिप्पणियों से संसूचित होगा* 🙏🏻🙏🏻🙏🏻 प्रणय पिपासा प्रेम नहीं प्रिय प्रेम को अब विस्तार तो दे दो । प्रेम के पथ के पथचारी को भय कैसा कैसी अभिलाषा । न तो पाने की लालच ही  खोने की जाने परिभाषा ।। साहस कर आया है जो द्वारे - प्रीत-दृष्टि एक बार तो दे दो ।। गीत लिखो या ग्रंथ लिखो सबके सब ही अर्थहीन से । मादक रूप चपल यौवन के सन्मुख तुम क्यों दीनहीन से।। प्रीत पराजित-रुदन कहां है- मुखर निमंत्रण इस बार तो दे दो ।। जो दुर्बल हो वह प्रेमी कैसा  जो प्रेमी वो ही बलशाली । प्रेम वाटिका तक जाके देखो मन-मानस है जिसका माली ।। अमरबेल से शोषित तरुओं को कर संरक्षित अरु प्यार भी दे दो ।। *गिरीश बिल्लोरे मुकुल*

प्रिया, तुम तो हो रँगरेजन

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छाया :- मुकुल यादव मन में आकर तुम ने मेरे पीर भरा जोड़ा क्यों नाता . अपनी अनुबंधित शामों से क्यों कर तोड़ा तुमने नाता …………………………………..!!  मैं न जानूं रीत प्रीत की,   तुम ने लजा लजा सिखाई..  इक अनबोली कहन कही   राह प्रीत की मुझे दिखाई  इक तो मन मेरा मस्ताना-  यूँ मंद मंद तेरा मुस्काना ..  भले दूर हो फ़िर तुमसे..   बहुत गहन है मेरा नाता..!! मन में आकर तुम …………………………………..!!  मन आंगन में स्वप्न सलोने,   खेलें जैसे भोला बचपन ।  कैसे करूँ अभिव्यक्त स्वयं को  मन का भी तो है अनुशासन . .. प्रिया हो तुम तो रंगरेजन . तुमको पत्थर रंगना  है आता !!  मन में आकर तुम ……………………………..!!   छायाचित्र :- Mukul Yadav   शब्द संयो.:- Girish Billore Mukul