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ये इश्क पारस से कम कहां है

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तुम्हारे जैसी ग़ज़ल मिले तो,  मैं दिल में उसको उतार लूंगा अभी तलक हूँ मैं बिखरा बिखरा ..  मिलो जो खुद को संवार लूंगा !! गलत कहाँ है जहाँ में बोलो इज़हार करना मोहब्बतों का । ये इश्क पारस से कम कहां है करूंगा जिसको निखार दूंगा ।। तुम्हारे हाथों में जाने कितनी मेरे लिए हैं दुआ ख़ुदा से- क़ुबूल अगरचे हुई ज़रा भी तो उम्र पूरी गुज़ार लूंगा ।। ये तख़्ते-ताउस ये ताज़पोशी ये हाकिमों की बड़ी क़तारें । नज़र मिली ग़र नाज़नीं से- वक़ार अपना उभार दूंगा ।। *गिरीश बिल्लोरे मुकुल*