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मस्तैला अलबेला कवि था

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*अटलजी को समर्पित कविता* मस्तैला अलबेला कवि था प्रखर मुखर नवयुग का रवि था ^^^^^^^^ नवचिंतन , अध्ययन के दिन थे तबसे तुमसे है मिलना जारी । मस्ताने वक्ता तबसे ही अपनी चली आ रही तुमसे यारी ।। रिश्ता जाने क्या दुनियाँ वाले इक कविता का अपने कवि का ।। ***** न देखा छूकर ही है तुमको न ही सनमुख संवाद किया है ।। जितना अब तक बोला है मैंने - तेरा सब कुछ हुआ दिया है ।। दुश्मन से भी रार न पाली असर पड़ा तुमसे प्रखर कवि का ।। ******* वर्ष सतहत्तर याद है सबको विश्व मंच पर अभिव्यक्ति का । लोहा मनवाया था तुमने तब इस भारत की शक्ति का ।। मुस्काए जब बुद्ध विश्व हतप्रभ मरुथल में हुआ उदय नए रवि का ^^^^^^ संख्याबल को सम्मानित कर तेरह दिन में दिल जीत लिए । दुश्मन के द्वारे जा पहुंचे- साथ सनेही गीत लिए ।। कुलघाती ने वार पीठ पर किया छलनी हुआ मानस कवि का ।। ******* बाँया हाथ उठाया बोले अब हार नहीं मानूँगा मैं। पथ पे छल बो दो कितने भी अब रार नहीं पालूंगा मैं ।। जिससे मेरा मन आलोकित ये प्रकाश है अटल रवि का ******* मृत्यु को औक़ात बताना जीवन का संवाद सुनाना । तुमसे बेहतर किससे