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प्रेम के तिनकों पर लपकतीं संस्कृति की लपटें

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प्रेम संसार की नींव है जिसे किसी को नकारने में शर्म नहीं आती क्योंकि उसके पीछे फ्रायड है । फ्रायड एक भयानक सोच को चाहे अनचाहे रोप गया । जबकि प्रेम ऐसा नहीं जैसा फ्रायड ने सोचा है । प्रेम के अंकुरण से विश्व में सृष्टि के सृजन की अनुभूति होती है । प्रेम पाखण्ड नहीं हैं प्रेम दुर्वाशा भी नहीं प्रेम जीवन के उदयाचल से अस्ताचल तक का स्नेह कवच है । प्रेम किसी को भी कभी भी कहीं भी हो सकता है फ्रायड सुनो ये विपरीत लिंगी के बीच हो ऐसा नहीं ये समलिंगिंयों यहां तक कि जड़ से भी होता है । बूढ़े लोग अपना शहर छोड़ने में कतरातें हैं तो आपका पालतू भी आपके बिना बेचैन रहता है । बहुत बरसों से  मुझे हरि न मिला ।  हरि रेलवे में गैंगमेन था शाम को आता था बालपन में हरि मुझे बहुत प्यार करता था कुछ दिनों तक न दिखा माँ बतातीं थी मुझे तेज़ बुखार आ  गया था तेज़ तीन चार दिन तक । बिना रोगाणु बुखार का अर्थ क्या था । हरि के गांव से लौटते बुखार गायब ? प्रेम की वज़ह प्रेम है तो समाधान भी प्रेम ही है । कहाँ राम कहाँ हनुमान कोई योग नहीं एक वनचर दूजा कुलीन क्षत्री राजकुल का बेटा ? प्रेम के सूत्र में बंधे दौनों इतिहास में द