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मार्च, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

"दुर्बल व्यक्ति प्रेम नहीं कर सकता प्रेमी दुर्बल नहीं हों सकता "

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शुक्र और चांद अचानक नहीं इनका मिलाना तयशुदा था। उस दिन जब चंद्रमा और शुक्र का मिलन तय था और मेरे शहर का आकाश अगरचे बादलों भरा न होया तो इस पल को सब निहारते। कईयों ने तो इसे निहारा भी होगा .....उनके आकाश में बादल जो नहीं हैं । प्रेम की परिभाषा भी यहीं कहीं मिलती है ....! "प्रेम"एक ऐसा भाव है जिसको स्वर,रंग ,शब्द , संकेत, यहाँ तक कि पत्थरों ने भी अभिव्यक्त करने में कोई कसर नहीं छोड़ी ...... खजुराहो से ताजमहल तक उर्वशी से मोनालिसा तक ,जाने कितनी बातें हैं जो प्रेम के इर्दगिर्द घूमतीं हैं ....! "सच प्रेम ही संसार कि नींव है "......आसक्ति प्रेम है ही नहीं ! प्रेम तो अहो ! अमृत है ! प्रेम न तो पीड़ा देता है न ही वो रुलाता। आशा और विश्वास का अमिय है ..प्रेम सोंदर्य का मोहताज कभी नहीं हो सकता ...परंतु जब यह अभिव्यक्त होता है तो जन्म लेतें कुमारसंभव जैसे महाकाव्य !! किसी ने क्या ख़ूब कहा -"जिस्म कि बात नहीं ये " सच !यदि दिल तक जाने कि बात हो तो ....आहिस्ता आहिस्ता जो भाव जन्मता है वोही है प्रेम। अगर आप सच्चा प्रेम देखना चाहतें हैं ..... एक ऐसी मजदूर माँ को देखिए

“प्रेम ही संसार की नींव है...!”

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संत वैलेंटाइन के लिए प्रेम का सन्देश देने वाले दिन में बुराई क्या..? इस सवाल पर घच्च से अपने राम पर पक्ष द्रोही होने का आरोप तय कर दिया जावेगा कोई डंडा लेकर मारने भी आ जावे इसका मुझे पूरा पूरा अंदाज़ है. देर रात तलक नेट पर  निर्वसना रतियों को निहारते लोग या फिर रूमानी चैट सेवाओं का लाभ उठाते लोग ही  सर्वाधिक शक्ति के साथ इस दिवस पर सक्रीय नज़र आते हैं . जबकि परिवारों में बालिकाओं और  महिलाओं के साथ दुराचारों पर इनकी निगाह कभी कभार ही  ही पड़ती होगी. घरेलू शोषण पर आक्रामक क्यों नहीं होते ये लोग. वास्तव में यह सब एक पूर्वाग्रही मिशन के हिस्से होते हैं. जो बिना समझ के विरोध का परचम लेकर आगे बढ़ते हैं. वास्तव में होना ये चाहिए कि घरेलू सद संस्कारों को सुधारने के संकल्प लेकर विदेशी संस्कृति के पार्कों कहवाघरों में होने वाले विकृत अनुप्रयोग को रोकने की कोशिश सतत जारी रखनी चाहिए. आपने शायद ही इन संस्कृति के स्वयंभू रक्षक-सेनानियों को पोर्न साइट्स पर प्रतिबन्ध, अत्यधिक उत्तेजक चित्र छापने वाले अखबारों के संपादकों से ऐसा न करने का अनुरोध करते देखा हो ... मेरी नज़र से कभी भी  ऐसा कोई सं

डाल झुकीं तरुणी के तन सी

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फ़ागुन के गुन प्रेमी जाने , बेसुध तन अरु मन बौराना या जोगी   पहचाने   फ़ागुन   , हर गोपी संग दिखते कान्हा रात गये नज़दीक जुनहैया , दूर प्रिया इत मन अकुलाना सोचे जोगीरा शशिधर आए , भक्ति - भांग पिये मस्ताना प्रेम रसीला, भक्ति अमिय सी , लख टेसू न फ़ूला समाना डाल झुकीं तरुणी के तन सी , आम का बाग गया बौराना   जीवन के दो पंथ निराले , कृष्ण की भक्ति अरु प्रिय को पाना   दौनों ही मस्ती के  पथ हैं   , नित होवे है आना जाना--..!! चैत की लम्बी दोपहरिया में– जीवन भी पलपल अनुमाना छोर मिले न ओर मिले, चिंतित मन किस पथ पे जाना ?                                     गिरीश बिल्लोरे “मुकुल”

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युद्ध के समय ... औरत युद्ध कहाँ लड़ती है... ?

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युद्धकाल में औरत   युद्ध नहीं लड़ती .. पल पल  जीने के लिए लड़ती  रातों को अपलक  अचानक जाग  बेटे बेटियों के चेहरे निहारती  अखबार  में छपी खबरों से  नज़र चुराती  प्रार्थनारत... करबद्ध  मन ही मन मनौती मनाती  युद्ध के अवसान के लिए खुद पर व्रत-वरतूले लादती  बूढ़ी माँ को बताती - माँ वो ठीक हैं..  तुम चिंता न करो ........  और खुद चिंता के  रथ पर सवार जाने कहाँ कहाँ घूमती है.. युद्ध के समय ... औरत युद्ध कहाँ लड़ती है... ? सुना है अब औरत लड़ती हैं सीरिया में तो अब जंग सीख गईं हैं  काश 71 के पहले   बांग्ला देश में  औरतें  जंग सीख  जातीं तो तय था  हौसला न बढ़ता  उनका  जो खुदा के लिए जंग लड़ते हैं... सर्वशक्तिमान के लिए कौन लड़ता है..? कम से कम मैं नहीं ये औरतें भी नहीं  सर्वशक्तिमान सदा  सर्वशक्तिमान था है और रहेगा  ये सनातन सत्य  था है और रहेगा... इस लिए  औरतें युद्ध कहाँ लड़ती है... ? बस प्यार करतीं हैं... अछोर प्यार