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ख्वाहिशें पाल मत यारां , कोई ग़ालिब नहीं है तू – हज़ारों ख्वाहिशें हों और, हर ख्वाहिश पे दम निकले ?

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गिरह खोली गिने हमने ,  हमारे गम भी कम निकले नमी क्यों आपकी आँखों में मेरे गम,  तो सनम निकले .     रोज़ बातें अंधेरों की ,   फसानों के बड़े किस्से - खौफ़ खाके जो तुम निकले ,  उसी दहशत में हम निकले . किसी शफ्फाक गुंचे पे ,  यकीं बेहद नहीं करना  – सिपाही कह रहे थे – “गुंचों में कई बार बम निकले ..!!” लूट लाए थे मुफलिस, दुकानें आज कपड़ों की    – बाँट पाए न आपस में ,  सभी के सब कफ़न निकले !! ख्वाहिशें पाल मत यारां , कोई  ग़ालिब नहीं है तू  – हज़ारों ख्वाहिशें हों और,  हर ख्वाहिश पे दम निकले  ?                          * गिरीश बिल्लोरे  “ मुकुल ”*