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मुंशिया के पापा -डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी

दो औरतें आपस में अपने घर के सामने खड़ी होकर बतिया रही थीं। शाम को धुंधलका था- शक्ल तो नहीं देख सका अलबत्ता उनके मुख उच्चारण उपरान्त निकले शब्दों का श्रवण स्वान सदृश तीव्र कर्णों से किया था। बड़ा आनन्द आया। मुझे लगा कि इनसे बड़ा कोई आलोचक नहीं हो सकता। वह क्या कह रही थी जब आप पढ़ेंगे तो आप को भी आनन्द की अनुभूति होगी। वह जो आदमी जा रहा है, उसे मैं अपने मोहल्ले में पिछले 40 सालों से देख रही हूँ। इस मोहल्ले में यह ऐसा आदमी है जिसने हमारी बहू-बेटियों की तरफ मुँह करके नहीं देखा है। आजकल अपने घर में कैद होकर रह गया है। इसका घर भी जैसा पहले था- उसी तरह अब भी है, रंग-रोगन कभी हुआ हो यह हमने तो नहीं देखा। नाम तो नहीं मालूम लेकिन इसके घर के अन्य लोगों से यह जाना जाता है। वह बुरा है या भला यह भी नहीं मालूम परन्तु हमारे घरों में इसके बारे में जब भी चर्चा होती है तो इसे अच्छे लोगों में कहा जाता है।  आजकल इसके घर में काफी हलचल और जोर-जोर की आवाजें सुनाई पड़ती हैं। ताज्जुब होता है कि इस अनबोलता के यहाँ ऐसा माहौल क्यो.....? तभी तीसरी महिला आ जाती है वह बोल उठती है- दीदी अब इस व्यक्ति के घर में परिवार बढ़ ग