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फूल, किताबें और एक तस्वीर...: फ़िरदौस ख़ान

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     हमारे कमरे में क़दम रखते ही सबसे पहले नज़र पड़ती है...फ़र्श पर बिछी चांदनी पर...गहरे हरे रंग की ज़मीन पर हल्के बादामी रंग के बड़े-बड़े फूल बहुत ही ख़ूबसूरत लगते हैं... कमरे में सफ़ेद और सुर्ख़ रंग के फूलों की बहार है...मुझे सफ़ेद फूल पसंद हैं तो उन्हें सुर्ख़ फूल...इसलिए कमरे में दोनों ही तरह के फूल अपनी मौजूदगी का ख़ुशनुमा अहसास कराते हैं... इसके बाद बारी आती है किताबों की...हमारे पास बहुत सी किताबें हैं...घर पर तो अच्छी ख़ासी लाइब्रेरी है...सबसे ज़्यादा उर्दू की किताबें हैं...दूसरे तीसरे और चौथे दर्जे पर बारी आती है पंजाबी, हिन्दी और अंग्रेजी की किताबों की...हिन्दी में रूसी साहित्य की किताबों का अच्छा ख़ासा ज़खीरा है... अम्मी को उर्दू और अरबी की किताबें पसंद हैं. भाई को पत्रकारिता, पशु-पक्षियों और बाग़वनी की... यहां यानी दिल्ली में भी हमारे पास किताबों का ज़खीरा है...हम अकसर किताबें ख़रीदते रहते हैं...इसके अलावा समीक्षा के लिए प्रकाशक भी ढेरों किताबें भेजते रहते हैं... किताबों की अपनी ही एक दुनिया है. कहते हैं किताबों से अच्छा कोई दोस्त नहीं होता. कॉलेज के वक़्त हर महीने आठ स

जाग विरहनी प्रियतम आए !!

देह राग नवताल सुहानी ! मानस चिंतन औघड़ धानी !! भ्रम इतना मन समझ न पाए ! अन्तस-जोगी टेर लगाए जाग विरहनी प्रियतम आए !! मन आगत की करे प्रतीक्षा ! तन आहत क्यों करे समीक्षा !! उलझे तन्तु सुलझ न पाए ! मन का पाखी नीर बहाए !! जाग विरहनी प्रियतम आए !! इक मन मोहे ज़मीं के तारे छब तोरे नूर की एक निहारे  ! प्रियतम पथ की बावरी मैं तो भोर - निशा कछु समझ न आए  !! जाग विरहनी प्रियतम आए  !!