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गोपियों का विरह .... प्रेम का निर्विवाद मानक है मदालसा...!!

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अहसासों की भाषा तो जानता ही है . अन-तुले अन-नपे एहसासों में उलझ आभासी प्रेम को व्योम में ही नेस्तनाबूत कैसे करोगी ? जानती हो न गोपियों का विरह .... प्रेम का निर्विवाद मानक है मदालसा... !! तुम्हारे सवाल पावन प्रीत की रामायण नहीं बस तर्क बुद्धि से विन्यासित दस्तावेज़ है तुम जिसे मैं खोना नहीं चाहता.. मैं जिसे तुम खोना नहीं चाहती फ़िर सवालों की शूली पर इस शास्वत प्रीत को क्यों रखती हो मुझे तुम से कुछ नहीं कहना सिवा इसके कि मेरा प्रेम एक दिव्य आभास है.. तुम्हारे लिये मेरे लिये भी .. सच

मैं आसानी से स्वीकार कर लूं तुम्हारा निर्णय ? : सखि सिंह का रचना संसार

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तुमने कह तो दिया बड़ी ख़ामोशी से कि मुझे अपनी जिंदगी में शामिल कर लो. इसका अर्थ पता है क्या है ..अपनी जिंदगी में तुम्हारे हवाले कर दूँ. पर  क्या अपनी जिंदगी की  डोर तुम्हारे हाथो में देकर में सुकून के दो पल बिता सकूंगी  ? ऐसे कैसे मैं आसानी से स्वीकार कर लूं तुहारा निर्णय ? पर फिर तुम्हारा अडिग होकर अपने  निर्णय से बार बार मुझे अवगत करना और कहना क्यों डरती हों तुम ? मैं हू न हर हाल  में तुम्हारे साथ . तुमको कभी कोई कष्ट  न हों इस बात  का ध्यान में सदैव रखूँगा . नहीं मुझे डर लगता है ...ये प्यार व्यार कि बाते अपनी समझ से परे है ..बिना बात के अपने दिल को कष्ट दूँ मैं इतना बड़ा काम मैं नहीं कर पाऊँगी .फिर वोही मनुहार कि बात और धीरे धीरे तुम्हारे विश्वास ने मेरे अंदर अपना घर कर लिया.अब आज क्या हुआ ? कुछ समझ नही आया ...जितने भी नकारात्मक विचार थे सब मन में एक केक करके आ रहे थे और अगर नहीं कुछ आया तो वो था तुम्हारा कोई किसी भी माँध्यम से सन्देश .न फोन आया , न कोई फोन पे मेसेज और न हों यहाँ फेसबुक में कोई खबर. तुम खुद भी नहीं मिले किधर भी . जब हर और अँधेरा घिरा लगे और उम्मीद