ओ मेरी मुकम्मल नज़्म मैं हर रात खुद से निकलता हूं

साभार :-तात्पर्य ब्लाग
अपने टूटे हुए सपनो की चादर ओढी
कलम की कन्दील
अपने साथ लिए
रात-बे-रात निकलता हूँ....
यूँ ही सूनी सड़कों पर ..!!
सोचते होगे न ?
किसकी तलाश है मुझको...
मेरे मेहबूब वो तेरे सिवा कोई नहीं और नहीं...
ओ मेरी मुकम्मल नज़्म
मैं हर रात
खुद से निकलता हूं
जिसकी तलाश में वो तुम ही हो
ओ मेरी मुकम्मल नज़्म
तुम कब मिलोगी
रोशनाई की रोशनी में
इल्म का खुशबूदार गुलाब लिये
जाने कब से तलाश में हूं...
जो भी मिलता है उन
सबसे पूछता हूं तुम कहां हो
किसी ने कहा- तुम यहां हो !
किसी ने कहा था- न, तुम वहां हो  !!
तुम जो मुकम्मल हो
मुझे मालूम है
सड़क पर न मिलोगी
मिलोगी मुझे
व्योम के उस पार
जहां .... अंतहीन उजास है..
सच मेरे लिये वो जगह खास है
मुझे तुम तक पहुंचने के
पथ की तलाश है... !!

टिप्पणियाँ

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि का लिंक आज बुधवार (14-08-2013) को 'आज़ादी की कहानी' : चर्चा मंच १३३७....में "मयंक का कोना" पर भी है!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल गुरुवार (15-08-2013) को "ब्लॉग प्रसारण- 87-स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएँ" पर लिंक की गयी है,कृपया पधारे.वहाँ आपका स्वागत है.

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  3. आप ने लिखा... हमने पढ़ा... और भी पढ़ें... इस लिये आप की ये खूबसूरत रचना शुकरवार यानी 16-08-2013 की http://www.nayi-purani-halchal.blogspot.com पर लिंक की जा रही है... आप भी इस हलचल में शामिल होकर इस हलचल में शामिल रचनाओं पर भी अपनी टिप्पणी दें...
    और आप के अनुमोल सुझावों का स्वागत है...




    कुलदीप ठाकुर [मन का मंथन]

    कविता मंच... हम सब का मंच...

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  4. प्रेम के पथ से ही के गुज़रती है नज़्म ... लाजवाब ...

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