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मार्च, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

जबलपुर के काफ़ी-घर बदल गये हैं

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अब नहीं लिखी जातीं  यहां बदलाव की तहरीरें.. पेंच लड़ाती कमसिन जोड़ियां आतीं हैं जातीं हैं..  मर्दाने-जनाने परफ़्यूम की खुशबू छोड़ जातीं हैं.. सुबह दोपहर शाम बस  एक ही तरह के लोग आते हैं..  उनके आने जाने में अदा होती है कभी कभार आते हैं कुछ कामरेड गोया आते नहीं लाए जाते हैं.  एक जरजर  फ़र्नीचर की मानिंद  अखबारों रिसाले वाले भी आते हैं कभी कभार  पर उनसे मेहनत से चुहचुहाए पसीने के साथ  मिली छापाखाने की कागज़-स्याही की गंध का एहसास नहीं होता.. कुछेक आते हैं नये लड़के अखबारों से महंगे सेलफ़ोन सर्र सर्र एनरायड नस्ल वाले साथ लेकर बाहर बाईक खड़ी करते हैं जहां शायद कभी पुराने खद्दरपोश कलमकारों की खड़खड़िया सायकलें खड़ी होती  थीं.. जब तुम सब बदल गये हो  तो मैं क्यूं न बदलूं खुद को.. मैं भी तुम्हारे शहर का  सबसे पुराने काफ़ी घरों का नुमाईंदा हूं मुझे भी बदल जाने का हक़ है..!! ********गिरीश"मुकुल

कनिष्क कश्यप की कविता : रंज और दर्द की बस्ती का मैं बाशिन्दा हूँ

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Kanishka Kashyap प्यार मुझसे जो किया तुमने तो क्या पाओगी मेरे हालत की आंधी में बिखर जओगी प्यार मुझसे जो किया तुमने तो क्या पाओगी रंज और दर्द की बस्ती का मैं बाशिन्दा हूँ ये तो बस मैं हूँ के इस हाल में भी ज़िन्दा हूँ ख्वाब क्यूं देखूँ वो कल जिसपे मैं शर्मिन्दा हूँ मैं जो शर्मिन्दा हुआ तुम भी तो शरमाओगी प्यार मुझसे जो किया ... क्यूं मेरे साथ कोइ और परेशान रहे मेरी दुनिया है जो वीरान तो वीरान रहे ज़िन्दगी का ये सफ़र तुमको तो आसान रहे हमसफ़र मुझको बनओगी तो पछताओगी प्यार मुझसे जो किया ... एक मैं क्या अभी आयेंगे दीवाने कितने अभी गूंजेगे मुहब्बत के तराने कितने ज़िन्दगी तुमको सुनायेगी फ़साने कितने क्यूं समझती हो मुझे भूल नही पाओगी प्यार मुझसे जो किया .

एक गुलाबी सुबह... फ़ेसबुक पर चंडीदत्त शुक्ला

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हर भोर, मेरे उदास मुंह से पहली आवाज़ तुम्हारी निकलती है. हां, नाम तुम्हारा ही तो! आंखें, पहली सूरत देखती हैं तुम्हारे नाम की, रास्ते उसी तरफ मुड़ते हैं, जहां रुककर हमने बुना था एक सुबह कविता का अंकुर, जो झुलस गया वक्त की चपेट में. हर दिन तो वापस लौटती है मेरे-तुम्हारे साथ की खुशबू. धूप बेरहम कितनी भी हो क्यों न, एक दरख्त यकीन का अब भी बुलंद है. दो घड़ी उसके तले रुककर देखो, इतने बुरे भी नहीं हैं हमारे दुःस्वप्न, उनके टूटने और नींद से बाहर आने के बाद मिलेगी, एक गुलाबी सुबह... Chandi Dutt Shukla

प्रीत को रंग लगै हूं प्रिय को, लाख जतन से छूट न पाए !!

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फ़ागुन में सब भूल गई री, जो गुन तैने मोहे  सिखाए ! जो देखी  छब   प्रिय की मैने , रीझो तन अरु मन अकुलाए !! रंग गुलाबी, पीरो नीरो, लाल, हरो मोहे अब न भाए- प्रीत को रंग लगै हूं प्रिय को, लाख जतन से छूट न पाए !! प्रीत की विजया ऐसी नशीली, मद जाको  तन से न जाए - तन से जाए जो मद ऐसो, मन में जाके आग लगाए !! **********************