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सुनतें हैं कि सरकार कल शाम आएंगें- जलते हुए सवालों से जाड़ा मिटाएंगें !

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उनको यक़ीन हो कि न हो हैं हम तो बेक़रार चुभती हवा रुकेगी क्या कंबल है तारतार !! मंहगा हुआ बाज़ार औ’जाड़ा है इस क़दर- हमने किया है रात भर सूरज का इंतज़ार.!! हाक़िम ने  फ़ुटपाथ पे आ बेदख़ल किया - औरों की तरह हमने भी डेरा बदल दिया ! सुनतें हैं कि  सरकार कल शाम आएंगें- जलते हुए सवालों से जाड़ा मिटाएंगें ! हाक़िम से कह दूं सोचा कि सरकार से कहे मुद्दे हैं बहुत उनको को ही वो तापते रहें....! लकड़ी कहां है आपतो - मुद्दे जलाईये जाड़ों से मरे जिस्मों की गिनती छिपाईये..!! जी आज़ ही सूरज ने मुझको बता दिया कल धूप तेज़ होगी ये  वादा सुना दिया ! तू चाहे मान ले भगवान किसी को भी हमने तो पत्थरों में भगवान पा लिया !! कहता हूं कि मेरे नाम पे आंसू गिराना मत फ़ुटपाथ के कुत्तों से मेरा नाता छुड़ाना मत उससे ही लिपट के सच कुछ देर सोया था- ज़हर का बिस्किट उसको खिलाना मत !!

अब सच तुमको चाहने लगा हूं

तुम तुम्हारी पीर मेरी कब हो गई सच अचानक ... तुम से मिलकर बेतहाशा खुश हूं पर जानता हूं तुम उदासी को मुस्कुराहट के दुशाले में ढांक लेती किसी से कुछ भी नहीं कहती चुपचाप अपलक छत को निहारती देर रात तक जूझती हो व्योम के उस पार तक देखतीं तुम मुझे अक्सर दिख ही जाती हो जानता हूं फ़िर खुद से पूछता हूं कि क्यों रुक गया तुम्हासी रेशमी आवाज़ सुन कर तुम्हारे इर्द गिर्द एक वलय बन के क्यों घूम रहा हूं जो भी हो व्योम के पार का तुमसे मेरा भी आभासी नाता ज़रूर है क्योंकि सच अब हम अनजाने नातों में बंध गये हैं शायद

मंचीय काव्य साधना पर एक कविता

संवादों के सुर बदले अब बदली बदली काव्य चेतना मंच मंच बनी आज़ दूकानें खुद को चाहें लोग ही बेचना                खोती आज काव्य चेतना !! खुद को गीत बताया बेचा मीत यही क्या गीत बेचना सुर संधान नही है कविता त्याग मीत खद्योत चेतना                खोती आज काव्य चेतना !! तुमने कितने किये टोटके खुद ही आज स्वयं देखना मीत अगर सच्चे कवि होतो पीर के बदले गीत बेचना                तभी जगेगी राष्ट्र  चेतना !!

अपरा ताई की प्रीत

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साभार: सत्यं वद:धर्मं चर से गूगल के ज़रिये साभार: विकी-पीडिया   चालीस बरस...पुरानी बात है. एक थी अपरा ताई.  अपरा ताई बोलते थे सब उनको सो हम काहे न बोलते हम भी अपरा ताई को  प्रेम करने वाली तो थीं पर बच्चों बूढ़ों बीमारों हताश-ज़िंदगियों के लिये उनकी मोहब्बत को आदर की नज़र से देखते थे बस्ती के लोग. हम नये नये युवा हो रहे लड़कों में अपरा ताई की बड़ी दहशत थी किसी सुकन्या को निगाहें उठा के देखने के पहले मन कांप उठता था कि बात कहीं अपरा ताई के कानौं तक  में   ताई क्यों, आज़ तुमने .. अर्र ये क्या तुम लगता है पैर कटवा के ही छोड़ोगी.. बदबू भरी मज़दूरन के पैर के घाव से रिसते मवाद को देखती रह गई अभी कल की ही बात थी उसे बाक़ायदा डाक्टर बाबू से इलाज़ करवा के आई थी...अपरा ताई को एक मिनट न रहा गया झट से कांधे पे लदे बस्ते का वज़न कम करने का मौका जो मिला ताई को. बस्ती में बन रहे सरकारी स्कूल की मज़दूरिन को मुकद्दम ने चिल्लाया.. काय, मर गई का जल्दी ला तसला.. अपरा ज़ोर से चीखी .."मुक्क...द्दम.....! अपरा की आवाज़ सुन सकपकाया भागता भागता आया -क्या हुआ ताई ? अपरा-इसके पैर का घाव देखा..? "मा