संदेश

दिसंबर, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

और पता है मुझे ज़िन्दगी हूँ तुम्हारी

तुम हो …… … हाँ , यहीं मेरे आस पास  खामोश से अपने सफ़र मे गुम  मेरे अक्स को सीने मे छुपाये  मगर फिर भी ना जाने  कौन सी खलिश रोकती है पुकारने से  देखो जो तुम कह नही रहे न वो भी सुन रही हूँ  और जो तुम महसूस कर रहे हो न  वो स्पर्श भी मुझ तक पहुँच रहा है  यूँ तो कोई ज़िन्दगी से रुख नही मोडा करता  और पता है मुझे ज़िन्दगी हूँ तुम्हारी  यूँ ही नही कहा करते तुम मुझे ………जानाँ ..........है ना

एक अकेला कँवल ताल में..!!

चित्र
एक अकेला कँवल ताल में संबंधों की रास खोजता ! आज त्राण फैलाके अपने , तिनके-तिनके पास रोकता !! बहता दरिया चुहलबाज़ ... है तिनका तिनका छिना कँवल से ! दौड़ लगा देता है पागल कभी त्राण-मृणाल मसल के ! सबका यूं वो प्रिय सरोज है , उसे दर्द क्या ? कौन सोचता !!