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ठहरा हुआ इंतज़ार ………एक प्रेम कथा

कल की सी बात लगती है याद है तुम्हें प्रिये तेरा आना जीवन में मेरे ज्यों बहारों ने डेरा डाला हुआ हो छुप -छुपकर कनखियों से खिड़की के झरोखों से वो तकना मुझे चांदनी रात में घंटों इंतज़ार करना सिर्फ़ एक बार देखने की चाहत में वो पल पल का हिसाब रखना तेरा यादों के तारों को झंझोड़ जाता है कभी प्रेम का इजहार किया नही फिर भी प्रेम के हर रंग को जिया अंखियों के मौन निमंत्रण को मौन में ही संजो लिया तन की प्यास कभी जगी ही नही मन के प्यासे प्रेमी हम प्रेम - वंदन में पगे रहे ख्वाबों की चादर बुनते रहे प्यार के मोती टांकते रहे मेरे जिस्म , मेरे अधरों , मेरे गेसुओं पर कोई कविता कभी लिखी ही नही मगर फिर भी बिना कहे प्रेम के हर अहसास से गुजरते रहे इन्द्रधनुषी रंगों से प्रेम रंग में रंगते रहे कल की सी बात लगती है याद है तुम्हें प्रिये फिर एक दिन तुम मेरे प्रणय - निवेदन को भुला मातृभूमि की पुकार पर अपने विजय-रथ पर सवार हो अपने हर ख्वाब को ,उस पर टंगे मोतियों को चांदनी रात की परछाइयों को यादों के दामन में संजो कर देशभक्ति का कफ़न उढाकर चले गए और मैं .............................. तेरे विरह की अग्नि में जलती रह

सच हम अपने सपनों को अतीत के धवल-पन्नों

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चित्र साभार: हिंदी-साहित्य तुमसे अक्सर बातौं-बातौं में पूछता हूं- " क्या तुम्हैं मुझसे प्यार है..? तुम नि:शब्द हो जाती अतीत के धवल पन्नों को  देखती हो और मैं फ़िर एक बार उस अतीत में पहुंच खुद को खड़ा करने की असफ़ल कोशिश करता हूं उत्तर की प्रतीक्षा में अपने कल के लिये एक धवल अतीत बनाता हूं मैं और तुम कहती हो अचानक अब जाना होगा सच हम अपने सपनों को अतीत के धवल-पन्नों उकेरें तो बताओ..? कैसा होगा ..?       

ज्ञानदर्पण से साभार :- प्रेम कहानी "ढोला-मारू"

भाई रतन सिंह जी शेखावत जी के ब्लाग ज्ञानदर्पण  पर राजस्थानी प्रेम कथाऒं का प्रकाशन किया गया है. मुझे राजस्थान की प्रेमकथाओं में  "ढोला-मारू" बेहद पसंद है शेखावत जी को बस मैंने सूचित किया टिप्पणी के ज़रिये आलेख का अंश उनकी आंशिक अनुमति से   पुन:प्रकाशित कर रहा हूं  राजस्थान की लोक कथाओं में बहुत सी प्रेम कथाएँ प्रचलित है पर इन सबमे ढोला मारू प्रेम गाथा विशेष लोकप्रिय रही है इस गाथा की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आठवीं सदी की इस घटना का नायक ढोला राजस्थान में आज भी एक-प्रेमी नायक के रूप में स्मरण किया जाता है और प्रत्येक पति-पत्नी की सुन्दर जोड़ी को ढोला-मारू की उपमा दी जाती है | यही नहीं आज भी लोक गीतों में स्त्रियाँ अपने प्रियतम को ढोला के नाम से ही संबोधित करती है,ढोला शब्द पति शब्द का प्रयायवाची ही बन चूका है |राजस्थान की ग्रामीण स्त्रियाँ आज भी विभिन्न मौकों पर ढोला-मारू के गीत बड़े चाव से गाती है | इस प्रेमाख्यान का नायक ढोला नरवर के राजा नल का पुत्र था जिसे इतिहास में ढोला व साल्हकुमार के नाम से जाना जाता है, ढोला का विवाह बालपने में जांगलू देश