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भ्रूण तक पहचानने मुझको न आना- ये परीक्षा और अब मैं न सहूंगी..!!

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तुम्हारी हर वेदना को कम करूंगी हां, तुम्हारे हौसलों में दम भरूंगी उफ़ ! परीक्षा जन्म से मेरी ही क्यों ? मैं हूं दुर्गा भय तुम्हारे मैं हरूंगी . आख़री सांसों तलक झांसी न दी बनके मीरा विष पिया फ़िर भी मैं जी. बनी सीता अग्नि से मिल आई मैं तुमने जितनी चाही परीक्षा मैने दी . भ्रूण तक पहचानने मुझको न आना- ये परीक्षा और अब मैं न सहूंगी..!!       तुम्हारी हर वेदना को कम करूंगी

मुख़्तसर सी बात है, तुम से प्यार है

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तुम  पुकार  लो, तुम्हारा  इंतज़ार  है ख्वाब  चुन  रही  हैं  रात  बेकरार  हैं होंठ  पे  लिए  हुए, दिल  की  बात  हम जागते  रहेंगे  और, कितनी  रात  हम मुख़्तसर  सी  बात  है, तुम  से  प्यार  है तुम्हारा  इंतज़ार  है  .. दिल   बहल   तो  जाएगा, इस  ख़याल  से हाल  मिल  गया  तुम्हारा, अपने  हाल  से रात  ये  करार  की  बेकरार  है तुम्हारा  इंतज़ार  है ......

क्यों..नहीं कह पाता हूं दूर हो जाओ मुझसे..

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तुम उन सवालों का बोझ अपने मानस पर लाद के  कब तक कहां तक  बस चलती रहोगी मेरी तरह कब तक एक बार भी  व्यक्त न कर करोगी..? सोचता हूं.. बहुत दृढ़ हो  पाषाण की तरह  पर जब छूता हूं तुम्हारे मनको तो नर्म मखमली एहसासों को  महसूस करता हूं... देर तक बहुत दूर तक तुम  वाक़ई एक  रेशमी एहसासों की मंजूषा सी  अक्सर रहती हो मेरे साथ..!! अनकही अनाभिव्यक्त प्रेम कथा  की नायिका    क्यों..नहीं कह पाता हूं   दूर हो जाओ मुझसे..?