कपड़े चूनर धनिया मिर्ची,आती थी वो रोज़ सुखाने !


हिन्द युग्म से साभार 

मेरे मन को प्रीत सिखाने ,आना उसका मुझे रिझाने
कपड़े चूनर धनिया मिर्ची,छत पे लाना रोज़ सुखाने !
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दरवाज़े की ओट से कितने
तीर नयन से चला चला के !
ध्यान मेरा वो खींचा करती-
छम छम पायल बजा बजा के !
आया करती थी मेरे घर, मां के संग दोपहर बिताने !!
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हरी चूड़ियां बिंदिया टिकुली,
नख से शिख तक संवर संवर के !
मुझ तक खूब संदेशे भेजे -
कभी इधर से कभी उधर से !
अनुशासन के तंतु कसे हम कैसे आते उसे बताने !!
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उससे लागी लगन अभी तक
प्रथम प्रीत का भास कराती !
प्रथम प्रीत की वो सब यादें-
अक्सर मुझको याद दिलाती !
कपड़े चूनर धनिया मिर्ची,क्यों आती थी रोज़ सुखाने !

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