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कपड़े चूनर धनिया मिर्ची,आती थी वो रोज़ सुखाने !

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हिन्द युग्म से साभार  मेरे मन को प्रीत सिखाने ,आना उसका मुझे रिझाने कपड़े चूनर धनिया मिर्ची,छत पे लाना रोज़ सुखाने ! *********************** दरवाज़े की ओट से कितने तीर नयन से चला चला के ! ध्यान मेरा वो खींचा करती- छम छम पायल बजा बजा के ! आया करती थी मेरे घर, मां के संग दोपहर बिताने !! *********************** हरी चूड़ियां बिंदिया टिकुली, नख से शिख तक संवर संवर के ! मुझ तक खूब संदेशे भेजे - कभी इधर से कभी उधर से ! अनुशासन के तंतु कसे हम कैसे आते उसे बताने !! *********************** उससे लागी लगन अभी तक प्रथम प्रीत का भास कराती ! प्रथम प्रीत की वो सब यादें- अक्सर मुझको याद दिलाती ! कपड़े चूनर धनिया मिर्ची,क्यों आती थी रोज़ सुखाने !

अबोले नयनों से !!

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क्वचिदन्यतोअपि..........! ब्लाग से साभार तुमने   अबोले नयनों से   जो बोला उस कहे को हमने – आज़ रात चांद को तक तक के तोला. देर तलक दूर तलक सोचता रहा शायद तुमने ये कहा ? न तुमने वो कहा ? जो भी मन कहता है – तुमने कहा था ! “मुझे, तुमसे प्यार है !” सच यही तो कहा था है न ? अबोले नयनों से   !!