"पूनम पाण्डे" सुर्खियां में क्यों..?, जबकि ज़रूरत है "अरुणिमा-सिन्हा" पर चर्चा

                  "पूनम पाण्डे" का सच जो भी हो सुर्खियां क्यों दी जा रही हैं उसे जबकि ज़रूरत है "अरुणिमा" पर चर्चा कर उसके प्रति संवेदित रहने की. ये तो सही है कि  न तो मैने न ही किसी ने संस्कृति बचाओ अभियान का ठेका लिया है हमें क्या ? हमारी एक अलग धारा है, चिंतन की किंतु ऐसी खबरें समाज की नई पौध की गिरावट की जो सूचना दे रही है उस पर सोचना उसे रोकना ज़रूरी है.  
सद्य प्रकाशित एक गैर ज़रूरी समाचार की  कुछ लाईने देखिये 
"कानूनी विशेषज्ञों की राय में मॉडल पूनम पांडेय का भारतीय क्रिकेट टीम के वर्ल्डकप जीतने पर निर्वस्त्र होकर जश्न मनाने के लिए बीसीसीआई से अनुमति मांगना लोगों को गुमराह करने से अधिक कुछ नहीं। सार्वजनिक स्थल पर कपड़े उतारकर जश्न मनाना अश्लीलता की श्रेणी में आता है जो अपराध है और बीसीसीआई या अन्य व्यक्ति को अपराध के लिए अनुमति देने की इजाजत नहीं है।
वर्ल्डकप फाइनल से पहले पूनम ने कहा था कि वह टीम इंडिया की जीत पर कपड़े उतारकर जश्न मनाएंगी और वह अब भी इस बयान पर बरकरार हैं। यह मॉडल साथ ही कह रही है कि वह ऐसा करने के लिए बीसीसीआई से अनुमति का इंतजार कर रही है। उसका कहना है कि वह स्टेडियम, खिलाड़ियों के ड्रेसिंग रूम या अन्य किसी भी 

टर्बनेटर के नाम से मशहूर भारतीय ऑफ स्पिनर हरभजन सिंह ने राष्ट्रीय स्तर की फुटबाल और वालीबाल खिलाड़ी अरुणिमा सिन्हा को एक लाख रुपए की वित्तीय मदद की पेशकश की है।
बरेली के नजदीक लुटेरों ने अरुणिमा को चलती ट्रेन से फेंक दिया था जिसके कारण उन्होंने अपना एक पैर गंवा दिया। 28 साल बाद 
भारत के लिए वर्ल्डकप जीतने वाली टीम के सदस्य हरभजन ने अरुणिमा के साहस की भी तारीफ की।
                     जी इस आलेख का उद्देश्य किसी खबर को पूरी तरह से ग़ैर ज़रूरी अथवा दूसरी को ही ज़रूरी बताना न होकर "पाजीटिव वातावरण" बनाने वाले समाचारों को प्रमुखता दिलाना है. समाचारों से यह भी पता चलता है कि अब तक मात्र चार लाख रुपये का सहयोग जुट पाया है... अरुणिमा के लिये ! जो बहुत  कम है. लेकिन सहयोग करने वाले भज्जी और युवी का पाज़िटिव नज़रिया वाकई सराहनीय है. 
        बहरहाल  इस बात से एक बात याद आ रही है मेरे परिचित अधिवक्ता मृगेंद्र नारायण सिंह ने कहा था :- अब तो ऊब सी होने लगी वो विचार गर्भित आलेख कहां मिलते है पढ़ने ?
      सच यही है लोग क्या चाहते हैं पढ़ना देखना खैर जो भी हो शायद परम्परागत मीडिया को इस बात की खबर नही है ?       न्यू-मीडिया से कुछ उम्मीदें तो हैं पर क्या न्यू मीडिया भी कुछ विचार शीलता रखता है इस बात की पड़ताल शेष है और शेष है "पाज़िटिव-चिंतन" न कि "कुंठित-चिंता" 
चित्र : गूगल से प्राप्त हैं आपत्ति होने पर सूचित कीजिये girishbillore@gmail.com  पर

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