पोस्ट

मार्च, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

पहली बार जुदाई सहना ज़हरीले सांपों संग रहना

इमेज
न मिलते तो प्रीत न होती प्रीत न होती  जीत न होती बाद जीत के ओझल होना पोर-पोर का घायल होना पाया है तो खोने का भय सुबक-सुबक  रो लेने का भय प्रीत के तागों ने मन बांधा तुमने प्रिय मुझको यूं साधा.. जानूं न ….धीरज न  संयम मन भावन अब ….तुम्हरा बंधन प्रीत में पहली बार जुदाई मेरी सांसों पे बन आई....! धूप तपन जाड़ा अरु बारिश  है सहना ये सब मुमकिन सा. पर प्रियतम अब तुम क्या जानो  युग सा बीता विरह का दिन था पहली बार जुदाई सहना  ज़हरीले सांपों संग रहना  . आशंकित मन,भय-मिश्रित तन तुम बिन डसता तन को गहना

न जागो और न मेरा इंतज़ार करो

इमेज
न जागो और न मेरा  इंतज़ार करो- तुम भी औरों की की तरह मुझको को बेज़ार करो... ............................न जागो और न मेरा  इंतज़ार करो ! कौन हूं मैं   किधर से आया हूं बहुत रोया हूं वहां..! मैं जिधर से आया हूं एक सेहरा हूं , उसको न गुलज़ार करो !! ............................न जागो और न मेरा  इंतज़ार करो ! मुझको इस दर्द से राहत ही मिला करती है सुकूं मिले तो वो  रात भी,  गिला करतीं है !! खुद को बेवजह जला के न उजियार भरो !! ............................न जागो और न मेरा  इंतज़ार करो !

चिंतन की सिगड़ी पे प्रीत का भगौना

इमेज
साभार:प्रतिबिम्ब ब्लाग  चिंतन की सिगड़ी पे प्रीत का भगौना रख के फ़िर  भूल गई, लेटी जा बिछौना ************ पल में घट भर जाते,  नयन नीर की गति से हारतीं  हैं  किरनें अब - आकुल मन की गति से. चुनरी को चाबता, मन बनके  मृग-छौना ? ************ बिसर  गई जाते पल, डिबिया भर  काज़ल  था सौतन के डर से मन - आज़ मोरा व्याकुल सा माथे प्रियतम के न तिल न डिठौना ?  ************  पीर हिय की- हरियाई तपती इस धूप में असुंअन जल सींचूं मैं बिरहन के रूप में..! बंद नयन देखूं,प्रिय मुख सलौना !! ************

गोरे गाल पर काले तिल वाली लड़की

इमेज
      ·         गिरीश बिल्लोरे “मुकुल”    गाल पे काला तिल था उसके। याद है सफ़ेद झक्क गोया मैदे से बनाई गयी हो . आशिकी के लिए इत्ता काफ़ी था मुहल्ले के लड़कों के लिए दिन भर घर में बैठी उस सुकन्या को मोहल्ले में आए पन्द्रह-बीस दिन ही हुए थे की सारे मुहल्ले के लोग खासकर ख़बर खोजी औरतें, ताज़ा ताज़ा मुछल्ले हुए वे लडके जो फ़र्स्ट/सेकण्ड  ईयर के आगे बस न पढ़ सके न पड़ना ही चाहते थे.क्योंकि माँ-बाप की सामर्थ्य नहीं का लेबल लगा कर स्कूल न जाना ही उनका अन्तिम लक्ष्य था...... ताकि उनकी आन बान बची रहे , सुबह सकारे उठाना उनके मासिक कार्यक्रम में था यानी महीने में एकाध बार ही अल्ल-सुबह जागते थे.वरना साढ़े नौ  से पहले उनके पिता जी भी जगा न सकते थे. यानी कुलमिला कर घर का बोझ  में  पिता पर. कुछेक के मां-बाप जानते थे कि "गली से निकलने वाली हरेक लड़की की ज़िम्मेदारी उनके नामुराद बेटों पर है " साभार:यहां से                             क्या मजाल की मुहल्ले की कोई लड़की इनके नामकरण यानी फब्तियों से बच जाए .अगर भूरी राजू से बची  तो कंजा राजू की फब्तियों का शिकार हो ही जातीं थ

आभासी अनुभूतियां

इमेज
    वो एक करिश्मा है. जो दिन रात एक बस मेरे खयालों में शामिल है. उसे देखते ही प्यार के बादलों में सावन की तरह जम जाने और फ़िर रिस रिस के उसे भिगोने को जी चाहता है. यूं तो मुझे नेट पर कई मिले हैं जो खुद ब खुद मेरे करीब आते. फ़िर थोड़ा बहुत मिल मिला कर मेरे ब्लाग की झूठी-सच्ची तारीफ़ फ़िर मिलने का बहाना न चूकते पर वो ऐसा जिसे न मै भूल पाई न ही भूलना चाहती हूं. सवाल यह भी कि वो जो मेरी सासों में शनै:शनै: घुलता जा रहा  सच है या एक आभासी व्यक्तित्व . सोचते मेरी कब आंखें लग गईं मालूम नहीं डेस्क-टाप पर स्क्रीन-सेवर की मछलियां जाने कब धींगा मस्ती करने लगीं मैं बेखबर सी उसनींदी रिवाल्विंग-कुर्सी पर निढाल थी.  मन की बेचैनी ने सांसों को भड़का दिया और सांसों ने धड़कनों को को रफ़्तार दी. मुझे प्यार की अनुभूती हो गई बार बार जाने क्यों लग रहा है यही तो सच है.       मेरे साथ किसी  का होना न होना बराबर है ये अलग बात है कि मुझे पहला प्यार इनसे ही हुआ था. है भी रहेगा भी मेरी तरफ़ से पर ये क्या मुझे जिसकी तलाश थी वो नहीं है उसमें मुझे आज़ मिल गया आभासी दुनिया में वो जिसकी तलाश थी . क्या करूं तलाशना सही थ

फ़ागुन के गुन प्रेमी जाने, बेसुध तन अरु मन बौराना

फ़ागुन के गुन प्रेमी जाने, बेसुध तन अरु मन बौराना या जोगी फ़ागुन पहचाने , हर गोपी संग दिखते कान्हा रात गये नज़दीक जुनहैया,दूर प्रिया इत मन अकुलाना सोचे जोगीरा शशिधर आए ,भक्ति की भांग पिये मस्ताना प्रेम रसीला भक्ति अमिय संग,लख टेसू न फ़ूला समाना डाल झुकीं तरुणी के तन सी, आम का बाग गया बौराना  जीवन के दो पंथ निराले,कृष्ण की भक्ति या प्रेम को पाना  दौनों ही मस्ती के पथ हैं,इनपे ही हो आना जाना--..!!

तुम और तुम्हारी आहटें,

तुम और तुम्हारी आहटें, मन के सारे दरवाजे खोल देती है और जी उठती हूँ मैं एक बार फिर , खिलखिलाकर मुस्कुरा देता है जीवन तुम्हारी आहटों को करीब पाकर . मीलों के फासलों से भी तुम्हारी खुशबू मुझको विचलित कर देती है अच्छा ,बुरा साथ और दूरी इन सब से दूर आ चुकी हूँ मैं , तुम्हारे साथ चलते चलते (पूरी कविता यहां पढिये )" अनुभूति "