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नवंबर, 2010 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अंग्रेजी अनुवादक की ज़रूरत है

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                                                                        मेरे हिन्दी व्यंग्य एवम कहानियों तथा उपन्यास के अंग्रेजी अनुवाद हेतु अनुवादक की ज़रूरत है जो अनुवादक के रूप अपने आप को सक्षम महसूस करने वाले मित्र अपना बायोडाटा girishbillore@gmaail.com पर भेज सकेंगें. तथा प्रति 300 शब्द एक पेज अनुमानित हेतु दरें प्रस्तावित कर सकते हैं. चयनित अनुवादक से प्रथम अनुवाद उपन्यास अनुवाद    कराया जायेगा

रात एक चुड़ैल आती है इधर

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बैसाख-नंदन .गांव से आज ही आया था दत्ते . छोटे और मझौले किस्म के शहरों कस्बों से आये लड़के  भौंदू श्रेणी के माने जाते हैं शुरु-शुरु में दत्ते भी उसी श्रेणी में रखा गया रखा क्या गया था ही उसी श्रेणी का - चेहरा क्या एक पपीता जो सीधा बिना गरदन के सहारे सीधा शरीर के शेष भाग से संबद्ध था. कॉलेज हास्टल में एक रूम में दो लड़को की व्यवस्था थी. .व्यवस्था के मुताबिक़ क्रमश: दो-दो लड़कों को एक एक कमरे दिए गए उनके आने के हिसाब से. दत्ते को मिला रूम पार्टनर हरीप्रसाद उर्फ़ एच०पी० पांडे    कथा का सिलसिला आगे बढाते हुए आपको बता दूं कि दत्ते का नाम उसके दांत बाहर होने की वज़ह से दत्ते हुआ वरना अच्छा खासा मां-बाप का दिया हुआ नाम था देवेन्द्र कुमार द्विवेदी .पिता इंजिनियर थे खूब कमाई वाले महकमे में . गांव का छात्र  बड़े शहर के बड़े कालेज में जाता है तो उसे सब कुछ अजीबोग़रीब लगता है. बाप ने जुगाड़ों  की ऐसी रस्सी सेट की कि दत्ते को दाखिला मिल गया तो आगे का हाल ये है कि :- अल्ल सुबह बाथरूम में दीवार पर चिपकी  बिंदी     देख कर वो अचानक अजीब सी सिहरन से सराबोर हो गया. उस तरुणी का माथा याद आ गया जो उसके पड़ोस म

पामेला तुमसे मुझे पहली नज़र में इश्क़ हो गया और कह दिया मैने "आई लव यू पामेला "

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पिछले कई दिनों से सोच रहा हूं कि कहूं न कहूं पर आज़ सरे आम कहे देता हूं कि-पामेला तुमसे मुझे पहली नज़र में इश्क़ हो गया " सच कहने का हौसला जिसमें भी कह दे सच के बिना कोई भी व्यक्तित्व कैंचुए का व्यक्तित्व नज़र आता है. हम ने सच कह दिया बेधड़क कह दिया. भई हमारे इस चेहरे के पीछे छिपे धन कमाने के लोभ को देखो. हम अगर गलत हैं तो कहो. हमने अगर कुछ किया है उसे बुला के तो आपके सीने से धुंआ काहे निकला ? बताओ. पामेला बेचारी कित्ती मुसीबत में है देखो न लाखों डालर का कर्ज़ है हमने तो बस कुछ करोड़ रुपल्ली ही दिये हैं उसे. बेचारी महिला उसकी मदद हम नहीं करेंगे तो कौन करेगा.? अब  बताओ भैया ? सच्चे दिल से हमको उनसे प्यार है देखो न लोग कह रहें हैं हमारे चैनल की  टी०आर०पी० बढ़ गई झूट उससे ज़्यादा हमारे दिल की धड़कनें  ज़्यादा बढ़ी हैं. . हमारी क्या जब उसने धकधक वाला गाना गाया था तब जानतें हैं हमारी उमर से चार गुनी उमर वाले रिटायर्ड दादाजी क्लब के सारे दादाजी चश्मा पौंछ पौंछ के उसे देख रहे थे . सारा देश उस पर मोहित है तो भैया हमारा इज़हार-ए-इश्क़ क्यों गुनाह है  ? बताऒ देखिये मुझे ज़्यादा ज्ञान न बताएं  अरे जब भी को

प्रेम ही संसार की नींव है

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          प्रेम दिवस पर स्वामी शुद्धानंद नाथ के जीवन सूत्र प्रस्तुत करना चाहता हूं . जो दिव्य-प्रेम को परिभाषित करतें हैं ये सूत्र स्वामीजी ने "शारदेय-नवरात्र -वर्ष 1960" को  के दौरान अपने  शिष्यों कों साधना के साथ 1960 में दिनांक 21,22, एवम 23/09/1960 प्रदान किये थे.   21/09/1960 सूत्र::01 "प्रेम " ही संसार की नींव है. वह प्रेम आसक्तिमय हो या साहजिक होवे, प्रेम व्यवहार में सुख और शांति उत्पन्न करता है ,त्याग सेवा और दिव्यता की शिक्षा देता है            प्रापंचिक-संबंध प्रेम की रस्सी बांधी जाये तो वह प्रपंच देवताओं को भी मत्सर उत्पन्न करने वाला होता है,.    आक के प्रपंच और व्यव्हार जीवन में इसका सर्वथा अभाव है. आज़ के संबंध परस्पर हक़ के, अधिकार मांगने वाले ठेके हैं. यह टेका समाज की क्षीण रूढ़ियों से कसा है इसलिये ये संबंध तोड़ना आसान हो गया है.                              "आज प्रेम के स्थान में भिन्न-भिन्न रूप में अहंकार विराजमान है "     22/09/1960 सूत्र::02   दुर्बल व्यक्ति प्रेम नहीं कर सकता और प्रेमी दुर्बल नहीं रह सकता धैर्यवान,बलवान,श्रेष्ठ

मटुकनाथजी को प्रेम को परिभाषित करने की चुनौती

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    जी हां आज़ मटुकनाथ जी  जो अपने आपको प्रेम का देवता माने बैठे हैं को नेट पर  प्रेम को परिभाषित करने की चुनौती  दी है. सुधिजन के कोई सुझाव/सवाल हों तो भेजिये ताकी इस नाटक के सूत्र धार का मनोवैज्ञानिक आधार सामने ला सकूं . मुझे मालूम है मटुक सिर्फ शब्दों की छाता लगाएंगे. देखूं शायद नौटंकी-सेलिब्रिटी से कुक उगलवा सकूं . मटुक नाथ जी का मेल आई डी है :- julimatuk@gmail.com  और मेरा तो आप सब जानते ही हैं वैसे इस बात का ध्यान रखिये मैं प्रेम का विरोधी कदापि नहीं. पर सदाचार तोड़ कर जिन  तर्कों से खुद को बचाता है उस बात का विरोधी अवश्य हूं. मेरा मानना है गलतीयों को स्वीकारो . हर धर्म यही कहता है हर धर्म का आधार यही है और अध्यात्म तो कभी भी प्रेम का द्रोह नहीं करता . परंतु सदाचार की व्याख्या भी तो करता है. मैं आज स्पष्ट कर दूं "मै मानता हूं कि मटुकनाथ केवल बायोलाजिकल प्रेम को ’सच्चा प्रेम’ बताते फ़िर रहे हैं. शेष आगे देखतें है क्या कहतें मटुक जी. ____________________________________ "यदि सहमति मिल गई तो सिर्फ़ मटुक जी से ही बात करूंगा मैं जूली जी से कोई बात नहीं करूंगा "   यदि ब

अंतर्वेदना का चित्र गीत : उत्तमा दीक्षित की तूलिका लता जी मदन मोहन साहब के सुर

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उत्तमा दीक्षित जी की तूलिका से उभरे चित्र को इस गीत के सन्दर्भ में देखिये माई  रे  मैं  कासे  कहूं ? फिल्म दस्तक के  इस गीत को लता  मंगेशकर  मदन  मोहन  ने गाया  है  ,  अगर वायलिन पे सुना जाए तो प्रभाकर  जोग साहब  का कमाल भी कम नहीं. आज़ जिस  भाव से इस चित्र को देखा तो तुरंत दस्तक के गीत का याद आना मेरे लिये रोमांचित करने वाला एहसास था. सुना हाँ खूब सुना . फिर क्या हुआ इस बात को आपसे शेयर न कर पाउंगा जानतें हैं क्यों ? आप को वो एहसास नहीं हो पाएगा कालजयी कला का आनंद आप भी उठाएं आपका अपना चिन्तन अपने भाव हैं  मेरा हस्तक्षेप जायज़ नहीं. उत्तमा जी के कुछ चित्र इधर भी

प्रकृति-प्रेम कथा :मल्हार ब्लाग पर है

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पा.ना. सुब्रमणियन जी के ब्लाग मल्हार ब्लाग पर मुझे जो मिला उसे देख कर मन में  प्रकृति प्रेम का नया संचार अनुभूत हुआ. उसे वर्णित करने मेरे पास अभी शब्द कम हैं. हिन्दी-अंग्रेजी में समान अधिकार विषय सामग्री भरपूर उपयोगी ही लाते हैं सुब्रमण्यम साहब. इसी पोस्ट के ज़रिये हम पहुंच गये यू-ट्यूब पर प्रस्तुत वीडियो  The Tree Hugger - MAAC 24FPS Animation Awards 2009 तक आप भी ज़रूर जाएं देखें इस अनोखी प्रेम कथा को अंग्रेजी पाठकों के लिए लिंक ये रही :- Thousand words in snap साभार : मल्हार 

अंतिम कविता 02 : तुम खूबसूरत हो

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मुझे मालूम है जाना है मुझे जीवन अब महा मिलन की ओर मुझे जाना ही होगा  पूरे उत्साह से जा रहा है. अपने अंतस में निर्वात पा रहा है.... कल जो आग के एक शरारे से तन दहक जाता था   उसी आग की  मुखाग्नि   और होगा   एक वेदना का अंत पीछे बिसुरते चेहरे शोक होगा अनंत तब जब कोई मुझे तलाशेगा कोई किताबों में कोई अंतरजाल पर कोई बच्चा जिसे चूमा था वो अपने गाल पर वो बहाने जिनने कोहनी ताख बांधी थी राखियाँ वो दोस्त जिनने खाई थी झूठी साखियाँ वो गिरगिट से रंग बदलते लोग वो पल भर में बदलते ऊपर के लोग सब यहीं मुझे खोजेंगे उनकी इस तलाश में शामिल रहूँगा अभी उनसे कुछ न कहूंगा अपने पीछे छोड़ जाउंगा बहुतेरे सवाल कुछ दर्शन का पाथेय होगें कुछ पर होंगे बवाल जी तब आभासी दुनियाँ के लोग शोक मनाएंगे जी इसी कविता को सबूत बनाएंगे और  में नि:शब्द रहूंगा तब  मेरा जीवन बोलेगा हर बात में कोई न कोई सवाल घोलेगा उसे मिल जाएगी ""पाप-पुण्य" की परिभाषा वो जिसे मैने सर दिया बैठने वो जिसके अस्तित्व को स्वीकारा वो जिसके पिता को बचाने देह से निकाला खून हाँ वही जिसने दु: