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मुन्डी भेजो मुंडी

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साभार :-भोजपुरिया सिनेमा से      एक अपहर्ता ने श्रीमति ”क” का अपहरण कर पति श्री ख को उसकी अंगुलि के एक हिस्से के साथ संदेश भेजा-”मैने तुम्हारी बीवी का अपहरण किया है बतौर प्रूफ़ अंगुली भेज रहा हूं बीवी को ज़िन्दा ज़िन्दा चाहते हो तो पचास लाख भेजो ” पति ने तुरंत उसी पते पे उत्तर भेजा :”इस सबूत से  प्रूफ़ नही होता कि वो मेरी ही पत्नी की अंगुली है कोई बड़ा प्रूफ़ भेजो भाई ..... मुन्डी भेजो मुंडी  ” _______________________________________________ इस लतीफ़े के साथ आप सबको वीक एण्ड की शुभ कामनाएं

हां सोचती तो है कभी कभार छै: बरस की थी तब वो भी तो बन गई थी दुलहनियां

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एक किताब सखी  के साथ बांचती बिटिया पीछे से दादी देखती है गौर से बिटिया को लगभग पढ़ती है टकटकी लगाये उनको देखती कभी पराई हो जाने का भाव तो कभी कन्यादान के ज़रिये पुण्य कमाने के लिये मन में उसके बड़े हो जाने का इंतज़ार भी तो कर रही है ? इसके आगे और क्या सोच सकती है मां हां सोचती तो है कभी कभार छै: बरस की थी तब वो भी तो बन गई थी दुलहनियां तेरह की थी तो गरभ में कल्लू आ गया था बाद वाली चार मरी संतानें भी गिन रही है कुल आठ औलादों की जननी पौत्रियों के बारे में खूब सोचती हैं दादियां उसकी ज़ल्द शादी के सपने पर ख़त्म हो जाती है ये सोच

मुआ दिल आया था उन पर कि आंख आ गई...!!

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जी हज़ूर , इन  आंखें  आने दिनों के  दौर में दुनियां कित्ती परेशान है आपको क्या मालूम आप को यह भी न मालूम होगा कि आज़ आपका यह ब्लागर भरी हुई आंख से पोस्ट लिख रहा है. खैर मुहल्ले के नये नये जवान हुए लड़के-लड़कियों पर ये मौसम भारी पड़ता है. आंख आ गई जबकि उम्र दिल आने की है. वैसे दिल आने के लिये उम्र की कोई बाधा क़तई नहीं होती बस इत्ता खयाल रखना चाहिये कि  कोई क़यामत शयामत न आ जाए. वर्ना बुढ़ापे में इश्क़ ....आशिक़ का  ज़नाज़ा .. आसान समीकरण होते हैं. बहरहाल दास्तान-ए-लैला मज़नूं के मज़नूं की मानिंद एक किरदार पूरे होशो-हवास में अपनी माशूक़ के दरवाज़े खड़ा खड़ा पन्नों पे लिख लिख के बारास्ता खिड़की खत भेज रिया था कि झरोखे से एक खत ठीक वैसे ही मियां मज़नूं के आगे गिरा. ज़नाब चिहुंके खत उठाया बांच ही रहे थे कि तड़ाक से एक वार तशरीफ़ पर पड़ा इकन्नी छाप मजनूं मुंह के बल औंधे जा गिरे. खत में माशूका ने लिखा था :-”बन्टी भाग आज़ पापा का हाफ़ डे है.” दर असल बन्टी मियां को आई फ़्लू था किंतु आई लव यू कहना भी उतना ही ज़रूरी था बंटी उर्फ़ इकन्नी छाप मजनूं को भाई वो इश्क ,इश्क क्या जो बैठे बिठाए जन्नत न दिखाए. ... इधर एक दफ़्तर में

अमर प्रेम कथाओं को सामाजिक स्वीकृति मिलने की वज़ह

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राधा-कृष्ण, शकुंतला-दुष्यंत, सावित्री-सत्यवान,रानी रूपमती-बाज बहादुर, सलीम-अनारकली, हीर-रांझा, लैला-मजनूं, सोहनी-महिवाल, ढोला-मारू की अमर प्रेम कहानियां समाज को सहज स्वीकार्य ही नहीं वरन इनका अनुगायन सतत जारी है एक सलीम और अनारकली को छोड़ कर. क्या खास था इन कथाओं में मुझे सच यक़ीन नहीं होता यदि इसका दुहराव अब होता है तो उसे कम से कम भारतीय समाज स्वीकार्य नहीं करता न ही उसे प्रतिष्ठा मिलती जैसा कि इन नायकों-नायिकाऒं को मिली है. क्या वज़ह है कि उनको इतना यश और प्रतिष्ठा दौनों ही हासिल हुई. है . यानी सामाजिक स्वीकारोक्ति के पीछे का रहस्य क्या था. सामान्यत: कि इसका प्रधान चरित्र या तो   राजा था या कि उसकी सामाजिक क्षमता इतनी प्रभाव शाली थी की रसूख़दार आशिक़ के किसी भी काम को नकारना किसी आम आदमी के बस की बात न थी इन प्रेम कथाओं को कवियों के सहारे जन जन तक पहुंचाई गई.  दूसरी ओर  लैला-मजनूं और हीर-रांझा के नायकों अस्तित्व बेहद-सामान्य होने के बावज़ूद उनको आज़ तक याद किया जा रहा है इसका आधार जैसा कि मुझे प्रतीत होता है - कथानक की पृष्ठभूमि पर गड़ीं लोकरंजक प्रस्तुतियां जो ततसमकालीन कवियों कथाकारों कला

ये इश्क इश्क है

एक मुक़म्मल कव्वाली जो सूफ़ी दर्शन की झलक देती है ईद कुछ यूं भी मनाई कई होगी