गीत प्यार का लिखते लिखते

गीत प्यार का लिखते लिखते
शब्दों से  ही  प्यार  हो  गया ,
अभी तुम्हारा रूप निहारा
और हृदय बेज़ार हो गया .!!
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सुनो रूप सी जब मन शावक
आये जो तुमरे आंगन तक..!
झूठ मूठ में प्यार जताना
प्रीतसुरों के अनुनादन तक
सुनने वाले कहेंगे वरना-
गीत तेरा बेकार हो गया .

गीत प्यार का लिखते लिखते
शब्दों से  ही  प्यार  हो  गया ,

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आंचल को समझालो अपने
अल्हड़ बचपन बीत गया है.
इधर मेरे बैरागी हिय में
प्रेम का बिरवा पीक गया है.
यही गीत का भाव-अर्थ सब
तुमसे मुझको प्यार हो गया .

गीत प्यार का लिखते लिखते
शब्दों से  ही  प्यार  हो  गया ,

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टिप्पणियाँ

  1. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (17-06-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  2. आभारी हूं शास्त्री जी शेखर सुमन.. अर्चना जी

    उत्तर देंहटाएं

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