सोमवार, 5 सितम्बर 2011

क्यों..नहीं कह पाता हूं दूर हो जाओ मुझसे..

















तुम उन सवालों का बोझ
अपने मानस पर लाद के 
कब तक कहां तक 
बस चलती रहोगी
मेरी तरह कब तक एक बार भी 
व्यक्त न कर करोगी..?
सोचता हूं..
बहुत दृढ़ हो 
पाषाण की तरह 
पर जब छूता हूं तुम्हारे मनको
तो नर्म मखमली एहसासों को 
महसूस करता हूं...
देर तक बहुत दूर तक
तुम 
वाक़ई एक 
रेशमी एहसासों की मंजूषा सी 
अक्सर रहती हो मेरे साथ..!!
अनकही अनाभिव्यक्त प्रेम कथा 
की नायिका  
 क्यों..नहीं कह पाता हूं  
दूर हो जाओ मुझसे..?



5 टिप्पणियाँ:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

शिक्षक दिवस की शुभकामनाएँ और सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन जी को नमन!

राजेश उत्‍साही ने कहा…

गिरीश जी कविता सुंदर है। पर अंत थोड़ा कठोर है। इसे नर्म तरीके से कहेंगे तो कविता बेहतर हो जाएगी।

अनुपमा त्रिपाठी... ने कहा…

सच में अनाभिव्यक्त प्रेम की पीड़ा है यह ...
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति ....

संजय भास्कर ने कहा…

अच्छी रचना...अंतिम पंक्तियाँ तो बहुत ही अच्छी लगीं.

Udan Tashtari ने कहा…

आह!! वाह!! बहुत उत्कृष्ट रचना...बधाई...

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