मंगलवार, 2 अगस्त 2011

प्रिया और कोयल

अल्ल सुबह की  मधुर तान
गूंजित प्रिय का तब मधुर गान
कोयल भी कूक उठी तब ही ?
मन हतप्रभ था सुन युक्त-गान..!!
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अंतस में द्वंद उठा तब फ़िर
कोयल तो झूठी होती है..
वो गीत सुनाती दुनियां को
कागी अण्डों को सेती है
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प्रिय का निर्दोष गीत सुनने
ललकारा कोयल को  ज्यों ही
प्रिय बोलीं:-"मैं पास सहज"
कोयल बैर से  क्यों की ?
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हतप्रभ हूं पर जान गया
प्रिय तुमको पहचान गया
तुम संवेदित भाव पुंज
तुम मेरा हो अभिमान प्रिया..

3 टिप्पणियाँ:

रश्मि प्रभा... ने कहा…

koyal apni madhurta ke piche chaal chalti hai ,rang ka fayda uthati hai

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

हतप्रभ हूं पर जान गया
प्रिय तुमको पहचान गया :)

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना!
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चौमासे में श्याम घटा जब आसमान पर छाती है।
आजादी के उत्सव की वो मुझको याद दिलाती है।।....

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