गीत प्रीत के गाने दो, प्रिय  मन  तक सुर जाने दो
तुम से मिल कर तेज हुई, धड़कन को समझाने दो
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मेरे प्रेमगीत में देखो -ताल तुम्हारी धड़कन की है
प्रीत है मुझसे कह देने में क्यों कर मन में अड़चन सी है
जो अंतस में सुलग रहा है, उसको बाहर आ जाने दो      
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किस बंधन ने बांध रखा है, प्रीत की निर्मल सी धारा को
रुका नीर सागर का भी ,नीर तो है किंतु खारा वो
मत रोको बेवज़ह नीर को, सहस-धार से बह जाने दो 
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टिप्पणियाँ

  1. basantmishra63@blogspot.com24 जुलाई 2011 को 12:03 am

    बहुत सुंदर भावना से भरी कविता बहुत दिनों कस बाद पढने मिली

    बसंत मिश्रा

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  2. मत रोको बेवज़ह नीर को, सहस-धार से बह जाने दो

    बहुत प्यारी रचना...

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  3. बारिस तेज होने वाली हे घर जल्दी जाने दो

    उत्तर देंहटाएं

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