रिस रिस के छाजल रीत गई

तुम बात करो मैं गीत लिखूं
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कुछ अपनी कहो कुछ मेरी सुनो
कुछ ताने बाने अब तो बुनो
जो बीत गया वो सपना था-
जो आज़ सहज वो अपना है
तुम अलख निरंजित हो मुझमें
मन चाहे मैं तुम को भी दिखूं
            तुम बात करो मैं गीत लिखूं
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तुम गहराई  सागर सी
भर दो प्रिय मेरी गागर भी
रिस रिस के छाजल रीत गई
संग साथ चलो दो जीत नई
इसके आगे कुछ कह न सकूं
         तुम बात करो मैं गीत लिखूं
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तुमको को होगा इंतज़ार
मन भीगे आऎ कब फ़ुहार..?
न मिल मिल पाए तो मत रोना
ये नेह रहेगा फ़िर उधार..!
मैं नेह मंत्र की माल जपूं
         तुम बात करो मैं गीत लिखूं
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टिप्पणियाँ

  1. वाह,,,सुन्दर गीत...आप तो इसे अपनी आवाज में गाकर प्रस्तुत करें.

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  2. तुम बात करो मैं गीत लिखूं

    तुम्हारी बातों में मेरा गीत कल से नहीं लिखा गया।
    गीत सटक गया और रात भर जागता रहा। आज देखेते हैं :)

    उत्तर देंहटाएं

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