हां ! उस रात सितारों से तुम्हारा ज़िक्र हुआ

हां ! उस रात
देर तक सितारों से 
तुम्हारा ज़िक्र हुआ !
तुम्हारा न होना
सितारों पर भारी था
विरह में कुछ  सितारे
सिसकने लगे
कुछ जो बेहद व्यग्र थे
इधर-उधर खिसकने लगे
तभी
ज्यों ही
पूरब से
सूरज ने झांका
अदृश्य हुए बेचारे
सितारे
तुम
अपनी अंजोरीयां
मत ले जाया करो
साथ समेट के !
हां चांद सच है !
इन सितारों को
इन बेचारों को
तुम्हारे बिना
भाते नहीं कोई भी पाठ
आकाशी सलेट पे !!


 इस पोस्ट पर प्रयुक्त चित्रों के लिये अगर चित्र के सृजक/स्वामी को कोई आपत्ती हो तो मुझे सूचित कीजिये.


टिप्पणियाँ

  1. आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (26.02.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.uchcharan.com/
    चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत ही बढ़िया अभिव्यक्ति.

    हां ! उस रात
    देर तक सितारों से
    तुम्हारा ज़िक्र हुआ !
    तुम्हारा न होना
    सितारों पर भारी था
    विरह में कुछ सितारे
    सिसकने लगे
    कुछ जो बेहद व्यग्र थे
    इधर-उधर खिसकने लगे

    बहुत खूब.
    सलाम.

    उत्तर देंहटाएं
  3. तुम्हारे बिना
    भाते नहीं कोई भी पाठ
    आकाशी सलेट पे !!....

    अच्छी कविता के लिये बधाई स्वीकारें।

    उत्तर देंहटाएं

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