दीप शिखा तुम मुझे बताना कहां हैं परबत किधर है समतल...........?

सुर सरिता की सहज धार सुन
तुम तो अविरल हम भी अविचल !!
॑॑॑॑॑॑॑॑॑॑॑॑॑॑॑॑
अश्व बने सुर-सातों जिसके
तुम सूरज का तेज़ संजोकर !
चिन्तन पथ से जब जब निकले
गये सदा ही मुझे भिगोकर !!
आज़ का दिन तो बीत गया यूं जाने कैसा होगा फ़िर कल !!
सुर सरिता की सहज .......!
॑॑॑॑॑॑॑॑॑॑॑॑॑॑॑॑॑॑॑॑॑॑
जीवन पथ जो पीर भरा हो
नयन नीर सावन सा झर झर !
कितने परबत पार करोगे
ये सब कुछ साहस पर निर्भर ..?
दीप शिखा तुम मुझे बताना कहां हैं परबत किधर है समतल...........?
सुर सरिता की सहज .......!

टिप्पणियाँ

  1. बहुत सुन्दर....कोई तो गाओ!!

    उत्तर देंहटाएं
  2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत दिनों बाद एक शुद्ध साहित्यिक रचना पढ़ने को मिली.. आभार..

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत बढ़िया साहित्यिक रचना!
    --
    इस शास्त्रीय रचना को पढ़वाने के लिए आभार!

    उत्तर देंहटाएं
  5. निशब्द हूँ............बिलकुल वही.........

    उत्तर देंहटाएं
  6. इस सुन्दर पोस्ट की चर्चा "चर्चा मंच" पर भी है!
    --
    http://charchamanch.blogspot.com/2010/06/193.html

    उत्तर देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

टिप्पणियाँ कीजिए शायद सटीक लिख सकूं

लोकप्रिय पोस्ट