अणु-अणु सँवर-सँवर तिल-तिल मिट-मिट पूरा करार करतीं हूँ

उमर-खैयाम की रूबाइयों के अनुवादक पंडित केशव पाठक के बारे में जितना लिखा जाए अंतर जाल के लिए कम ही है मुझे विस्तार से जानकारी न होने के कारण जो भी लिख रहा हूँ श्रुति के आधार पर फिर भी कुछ जानकारीयां  उपलब्ध किताब में मिलते ही लोभ संवरण न कर सका जाने क्यों मुझे लग रहा है कि अगर संस्कारधानी के इस सुकवि को अभी न उकेरा गया अंतरजाल पर तो शायद फिर कौन कब करेगा यह काम जो ज़रूरी है ...........?
अस्तु ! आपका परिचय स्वर्गीय केशव पाठक से करा दूं उनके इस प्रेम गीत के ज़रिये
सखी,मैं उसे प्यार करतीं हूँ :
दिनमणि से ले किरण कान्ति की
मधुऋतु से यौवन की काया
कुसुम-सुरभि से मृदुल प्राण ले
सुरधनु से सतरंगी माया
निशि-तम में अभिसार,दिवस-आभा में मिल विहार करतीं हूँ .
 सखी,मैं उसे प्यार करतीं हूँ
आमन्त्रं बंधन को दे
बंदी-जीवन स्वीकार किया है
बन कर मिटने का केवल
मैनें उअसे अधिकार लिया है..
अणु-अणु सँवर-सँवर  तिल-तिल मिट-मिट पूरा करार करतीं हूँ
सखी,मैं उसे प्यार करतीं हूँ 
उसके रंग महल में मेरी
स्नेहमयी यह जीवन बाती,
उसकी ही इच्छा से जलती
उसके इंगित पर बुझ जाती
दृग-युग से जल बुझ उसकी क्रीडा ही का प्रसार करतीं हूँ 
सखी,मैं उसे प्यार करतीं हूँ 
अली,बावला ज्ञान, छायामय
जीवन मेरा व्यर्थ बखाने ,
मैंने तो चिर सहचरी छाया
बन कर अपने प्रिय पहचाने
अपने पन की नहीं आज मैं छाया की पुकार करतीं हूँ
सखी,मैं उसे प्यार करतीं हूँ 
http://kakesh.com/wp-content/uploads/2007/10/rubaiyat.jpg


सुकवि ने उमर-खैयाम की रुबाइयात का हिंदी तर्जुमा जिस सहजता से किया वो समझने काबिल है
            अंग्रेजी : AWAKE ! for Morning in the bowl of night
                          Has flung the stone that puts the starts to flight
                          And lo ! the Hunter of the East  has caught
                          The Sultan's Turret in a Noose of ligth .
             * हिंदी   : जाग ! प्रात ने फैंका निशि के पेय पात्र में अरुण उपल
                         नभ मंडल में मची खलबली,हरिन हो गया तारक दल
                         ले ! पूरवी शिकारी ने अपना किरनीला फंदा फैंक   
                         सुल्तानी गुम्बज़ ली बाँध,देख,उठ कर तू भी तो देख
 

टिप्पणियाँ

  1. लाजवाब रचना के लिये धन्यवाद। स्व. केशव पाठक जी को विनम्र शरद्धाँजली।

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  2. बहुत बढ़िया रचना प्रस्तुति . केशव पाठक जी को श्रद्धासुमन अर्पित करता हूँ ...

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  3. मुकुल भाई।
    केशव पाठक जी की इतनी शानदार रचना पढ़वाने के लिए बहुत बहुत आभार आपका। तर्जुमा भी अगर मौलिक लगे तो समझिए श्रम सार्थक हुआ।

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