आँगन के कचनार







मेरे प्रथम गीत में मधुता
मेरी प्रथम गीत का कारन
तुमको भूल न पाऊँ मुग्धा
तुम नित बसतीं मन के आँगन

प्रथम गीत अरु प्रथम प्रीत को
कौन भुला पाया है अब तक!
नेह निमंत्रण प्रियतम तुम्हरा
गूँज रहा कानों में अब तक!!
हँसीं तुम्हारी ऐसी जैसे वीना के तारों का वादन!!

याद करो वो प्रेम संदेसा
लिख के तुमने मुझे था भेजा!
प्रतिबंधों के उस युग मे प्रिय
रखा गया न मुझसे सहेजा!!
मन पे संयम का पहरा था,जिसे हटाया तुम्हारे कारन!!

आँगन के कचनार की हमने
जीभर सेवा की थी मिल कर!
अब वो मुझसे पूछ रहा है
"क्यों तुम बिखर रहे तिल-तिल कर"
कहता वो तुलसी-चौरे से दौनों घर के सूने आँगन!!   

            

टिप्पणियाँ

  1. बढ़िया रचना आभार प्रस्तुति के लिए

    उत्तर देंहटाएं
  2. प्रेम के इस प्रथम गीत ने झंकृत कर दिया ...अति सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं
  3. kya baat hai.....jitni behtar rachna hai apki...utna hi sunder saja bhi rakha hai blog ko.
    mere blog pe aane ke liye shukriya.

    उत्तर देंहटाएं
  4. "प्रथम गीत अरु प्रथम प्रीत को
    कौन भुला पाया है अब तक!"

    आपने बिल्कुल ठीक कहा है , प्रथम गीत और प्रथम प्रीत को भुलाना नामुमकिन है !

    उत्तर देंहटाएं
  5. मेरी प्रथम अनुभूति के स्वागत के लिए कृतग्य हूँ

    उत्तर देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

टिप्पणियाँ कीजिए शायद सटीक लिख सकूं

लोकप्रिय पोस्ट